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नौकरी छिनी तो शादी टूटी, किस मुंह से घर जाएं:बेरोजगार युवतियां बोलीं- नौकरी नहीं हमारा मान-सम्मान भी छीना, गेहूं बेचकर भोपाल आंदोलन करने आईं

सरकार के लिए नौकरी देना और खत्म करना भले एक सरकारी आदेश भर हो, लेकिन भोपाल के आंबेडकर मैदान में 24 अगस्त से धरने पर बैठी महिलाओं के लिए इसका मतलब कहीं बड़ा था। पेसा मोबिलाइजर्स के तौर पर 4 हजार रुपए की नौकरी इन युवतियों के लिए उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी उम्मीद थी।
वनवासी गांवों के अभावों के बीच पढ़ी-लिखीं इन युवतियों को लगा था कि नौकरी छोटी है, लेकिन अपने समाज के बीच काम करने का मौका बड़ा है। अब उनका कहना है कि सरकार ने सिर्फ नौकरी नहीं छीनी, बल्कि परिवार और समाज में उनका मान-सम्मान भी छीन लिया।
क्या है इन महिलाओं की पूरी कहानी विस्तार से पढ़िए… प्रदेश के 20 आदिवासी जिलों के 89 ब्लॉक की करीब 5200 पंचायतों में काम करने वाले 5200 से ज्यादा पेसा मोबिलाइजर्स भोपाल में धरने पर हैं। इनमें बड़ी संख्या आदिवासी महिलाओं की है। किसी ने नौकरी जाने के बाद गेहूं बेचकर भोपाल आने का खर्च जुटाया, तो किसी की शादी का रिश्ता टूट गया। कोई अब तक परिवार को नौकरी जाने की बात नहीं बता पाई है, तो किसी को गांव लौटकर लोगों के सवालों और तानों का डर सता रहा है। पेसा मोबिलाइजर्स का कहना है कि उन्होंने गांवों में सरकारी योजनाओं की जानकारी देने, लोगों को उनके अधिकार समझाने और पेसा कानून को जमीन पर लागू कराने के लिए काम किया। उनका दावा है कि जब गांवों में लोग अपने अधिकारों और योजनाओं को लेकर जागरूक होने लगे, तभी उनकी सेवाएं खत्म कर दी गईं। मध्य प्रदेश को पेसा कानून के क्रियान्वयन में देश में दूसरा स्थान दिलाने वाले मोबिलाइजर्स का कहना है कि सरकार ने उनके काम की उपलब्धियों को प्रचारित किया। यहां तक कि 4 हजार रुपए के मानदेय को बढ़ाकर 8 हजार रुपए करने की घोषणा भी की गई, लेकिन बढ़ा हुआ मानदेय मिलने से पहले ही सेवाएं समाप्त कर दी गईं। 4 केस से समझिए इनकी आपबीती केस 1:
‘नौकरी गई तो रिश्ता भी चला गया’ आलीराजपुर की कलावती बामनिया के परिवार और रिश्तेदारों को भरोसा था कि बेटी अपने पैरों पर खड़ी है। इसी भरोसे पर उनका रिश्ता तय हुआ था। लेकिन सेवा समाप्ति का आदेश आने के बाद लड़के वालों ने शादी से इनकार कर दिया। कलावती ने एमएसडब्ल्यू किया है और उनकी उम्र 38 साल है। वह कहती हैं, “नौकरी गई तो रिश्ता भी टूट गया। अब न पढ़ाई कर पा रही हूं, न शादी के बारे में सोच पा रही हूं।” 23 अगस्त को वह घर से भोपाल के लिए निकलीं। किराए के पैसे नहीं थे, इसलिए गेहूं बेचकर भोपाल पहुंचीं। वह बताती हैं, “मैं यहां एक टाइम खाना खाती हूं। मां बीमार हैं। लेकिन उन्हें बताती हूं कि तीनों टाइम खाना मिल रहा है, ताकि उन्हें दु:ख न हो।” कलावती के लिए नौकरी सिर्फ आमदनी का जरिया नहीं थी। नौकरी खत्म होने के बाद उन्हें परिवार के सामने लौटना भी मुश्किल लग रहा है। केस 2:
18 हजार की नौकरी छोड़ी, गांव लौटीं बालाघाट के बैहर की झीरी पंचायत की आशा कोलिहा केमिस्ट्री की लेक्चरर थीं। अतिथि शिक्षक के तौर पर उन्हें करीब 18 हजार रुपए महीने मिलते थे। उन्होंने यह नौकरी छोड़कर पेसा मोबिलाइजर का काम चुना। वजह ज्यादा पैसा कमाना नहीं, बल्कि माता-पिता के साथ रहकर अपने समाज के लिए काम करना था। आशा कहती हैं, “पेसा मोबिलाइजर में सिर्फ 4 हजार रुपए मिलते थे, लेकिन मैं अपने परिवार के साथ रह रही थी और अपने समाज के लिए कुछ कर रही थी। मुझे लगा कि यही ज्यादा जरूरी है।” उनका गांव ऐसा है, जहां मोबाइल नेटवर्क और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाएं भी आसानी से उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे इलाके में लोगों को सरकारी योजनाओं और उनके अधिकारों की जानकारी देना चुनौतीपूर्ण था। केस 3:
‘सेवा समाप्त हुई तो मान-सम्मान भी चला गया’ बैतूल से आईं बबली नागवंशी पहले 12 पंचायतों में ऑडिट का काम करती थीं। उनका कहना है कि सेवा समाप्त होने के बाद असर सिर्फ आमदनी पर नहीं पड़ा, बल्कि गांव में बनी पहचान भी खत्म हो गई। वह कहती हैं, “सेवा समाप्त होने के बाद हमारा मान-सम्मान चला गया। गांव के लोग ताने मारते हैं। गांव लौटने पर हमें लोगों के सवालों और तानों का डर लगता है।” बबली के लिए यह काम सिर्फ मानदेय का जरिया नहीं था। पंचायतों में काम करने के दौरान गांव के लोगों के बीच उनकी एक पहचान बनी थी। अब वो सम्मान भी छिन गया है। केस 4:
25 हजार की नौकरी छोड़ी, परिवार से क्या कहें? पेसा मोबिलाइजर्स में पुरुष भी शामिल हैं। राजाराम साहू भोपाल में करीब 25 हजार रुपए महीने की नौकरी करते थे। उन्होंने यह नौकरी इसलिए छोड़ी क्योंकि उन्हें लगा कि गांव में काम करने का मौका मिलेगा और परिवार के साथ रह सकेंगे। राजाराम कहते हैं, “मैंने सोचा था कि गांव में नौकरी मिल जाएगी। पांच साल काम किया। 18 मई को सेवा समाप्ति का आदेश आया, उस दिन समझ नहीं आया कि परिवार को क्या बताऊं।” गांवों में पेसा कानून की आवाज थे ये युवा
पेसा मोबिलाइजर्स का काम सिर्फ पंचायत या दफ्तर तक सीमित नहीं था। वे गांवों में जाकर लोगों को पेसा कानून, ग्रामसभा की भूमिका, सरकारी योजनाओं और उनके अधिकारों की जानकारी देते थे। पेसा मोबिलाइजर्स के अध्यक्ष उपेंद्र कुमार कोढ़ापे कहते हैं कि इन युवाओं ने बेहद कठिन परिस्थितियों में काम किया। उनके मुताबिक, “ये कोई साधारण लोग नहीं हैं। अभावों में पल-बढ़कर पढ़ाई की और फिर अपने ही गांवों में लोगों को जागरूक करने का काम किया। पेसा कानून को मजबूत करने में इनकी बड़ी भूमिका रही।” 2022 में नियुक्ति, 2026 में सेवा समाप्त मध्यप्रदेश के 20 आदिवासी जिलों के 89 ब्लॉक की करीब 5200 पंचायतों में पेसा कानून के क्रियान्वयन के लिए 5200 पेसा मोबिलाइजर्स को 1 अप्रैल 2022 को नियुक्ति दी गई थी। अब राज्य सरकार के पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग ने सभी जिला पंचायत सीईओ को इन्हें सेवा मुक्त करने के लिए पत्र लिखा। सरकार के आदेश के मुताबिक पेसा मोबिलाइजर्स की योजना 31 मार्च 2026 को पूरी हो चुकी थी। इसके बाद मई में इन्हें सेवा मुक्त करने के आदेश जारी किए गए। हालांकि पेसा मोबिलाइजर्स का कहना है कि नियुक्ति के समय उन्हें यह नहीं बताया गया था कि वर्ष 2026 में उनकी सेवा समाप्त कर दी जाएगी। उनका कहना है कि उन्होंने इसे स्थायी नौकरी की तरह नहीं, लेकिन लंबे समय तक चलने वाले काम और अपने समाज के बीच जिम्मेदारी के रूप में देखा था। अब यही अनिश्चितता उनके लिए सबसे बड़ी परेशानी बन गई है। जिन युवाओं ने बेहतर विकल्प छोड़कर गांव और समाज के बीच काम करने का फैसला किया, वे अचानक बेरोजगार हो गए हैं। कई महिलाओं के सामने आर्थिक संकट के साथ परिवार और समाज के सवालों का सामना करने की चुनौती भी खड़ी हो गई है।

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