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निजी मंदिरों में सरकार की भूमिका नहीं है:MP हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव को दिए आदेश, सभी कलेक्टरों को जारी करें निर्देश

किसी भी निजी मंदिरों में सरकार की भूमिका नहीं है। मंदिर से जुड़ी भूमि के राजस्व रिकार्ड में कलेक्टर या पुजारी का ना प्रबंधक या ट्रस्टी के रूप में दर्ज किए जाने की भी आवश्यकता नहीं है। ऐसी संपत्ति देवता के नाम दर्ज होनी चाहिए। यह आहम आदेश मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने दिया है। एक पुजारी की याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा कि सरकार किसी निजी मंदिर के प्रबंधन में हस्तक्षेप नहीं कर सकती। जस्टिस दीपक खोत की बेंच ने राज्य के सभी कलेक्टरों को निर्देश दिए हैं कि किसी भी मंदिर में प्रबंधन योजना लागू करने से पहले यह तय किया जाए कि वह मंदिर सार्वजनिक है या निजी। दरअसल डूंडा सिवनी गांव स्थित एक शिव मंदिर के सर्वराकर (मंदिर,मठ या धार्मिक संपत्ति के प्रबंधक,संरक्षक) की याचिका पर कोर्ट ने यह आदेश दिया है। याचिका में लोक न्यास रजिस्ट्रार द्वारा मंदिर के प्रबंधन के लिए पांच सदस्यीय समिति गठित करने के आदेश को भी चुनौती दी गई है। चार पीढ़ियों से मंदिर की देखरेख कर रहा परिवार सोमवार को हुई याचिका में पुजारी ने कोर्ट को बताया कि पिछले चार पीढ़ियों से उनका परिवार मंदिर की देखरेख कर रहा है। मंदिर का निर्माण वर्ष 1913 में स्वर्गीय भवानी पटेल ने कराया था और उसके रखरखाव व पुजारी के खर्च के लिए लगभग 14 एकड़ भूमि छोड़ी गई। बाद में 1962-63 में सर्वराकर के रूप में सुमरन का नाम अधिकार अभिलेख में दर्ज किया गया। हालांकि, गांव के कुछ लोगों की शिकायत के बाद लोक न्यास रजिस्ट्रार ने मंदिर प्रबंधन के लिए पांच सदस्यीय समिति गठित की। याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि समिति में शामिल दो सदस्य सरकारी कर्मचारी हैं, जो धार्मिक गतिविधियों में भाग नहीं ले सकते। साथ ही बिना यह जांच किए कि मंदिर निजी है या सार्वजनिक, सरकार ने अपनी प्रबंधन योजना थोपने का प्रयास किया। राज्य की ओर से कहा गया कि जांच में मंदिर लगभग 200 वर्ष पुराना पाया गया और उसे मरम्मत की आवश्यकता है। अदालत ने कहा कि मंदिर से जुड़ी भूमि देवता के नाम पर दर्ज होती है, और कानून के अनुसार देवता को एक विधिक इकाई माना जाता है, जिसकी ओर से ‘नेक्स्ट फ्रेंड’ कार्य करता है। जस्टिस दीपक खोत की कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले स्टेट ऑफ मध्य प्रदेश बनाम पुजारी उत्थान एवं कल्याण समिति का हवाला देते हुए कहा कि मंदिर में स्थापित देवता ही संपत्ति के वास्तविक स्वामी होते हैं, और पुजारी केवल पूजा-अर्चना तथा संपत्ति की देखरेख के लिए होता है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कलेक्टर को सभी मंदिरों का प्रबंधक नहीं माना जा सकता, जब तक कि वह मंदिर सरकारी नियंत्रण में न हो। अदालत ने कहा कि यदि किसी निजी मकान या निजी संपत्ति में देवता स्थापित हैं, तो उस मंदिर की देखभाल करने वाले व्यक्ति को प्रबंधन में प्राथमिकता दी जानी चाहिए। मामले का निपटारा करते हुए हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव को निर्देश दिया कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुरूप सभी जिला कलेक्टरों को दिशा-निर्देश जारी किए जाएं। साथ ही सभी कलेक्टरों को विवाद की स्थिति में मंदिर की प्रकृति सार्वजनिक या निजी की विधिसम्मत जांच करने को कहा गया। अदालत ने संबंधित प्राधिकारी को यह भी निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता द्वारा उठाए गए विवाद की जांच कर तीन महीने के भीतर यह तय किया जाए कि संबंधित मंदिर निजी है या नहीं।

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