भोपाल के नायब शहर काजी मौलाना अली कदर ने आयातुल्लाह खामेनेई की मौत पर कहा कि शहादत है मकसूद-ए-मोमिन, न माल-ए-गनीमत, न किश्वर कुशाई। यानी तारीख गवाही देती है कि शहादतें मज़ाहमत की क्यारी में खाद का काम करती हैं। मौलाना ने कहा- इतिहास इस बात का गवाह है कि कुर्बानियां तहरीकों को जिंदा रखती हैं। बहुत से लोगों के नजरियात और अकीदे मुख्तलिफ हो सकते हैं, लेकिन जब कोई अपनी तहरीक और मंजिल के लिए जान का नजराना पेश करता है तो उसे मंजिल भी हासिल होती है और उसका नजरिया भी फलता-फूलता है। भगत सिंह व टीपू सुल्तान का दिया उदाहरण उन्होंने कहा- चाहे भगत सिंह हों या टीपू सुल्तान, जिन्होंने अपने सिद्धांतों के लिए जान दी, वे आज भी इतिहास में जिंदा हैं। मौलाना ने महात्मा गांधी के उस कथन का भी जिक्र किया जिसमें 72 साथियों की मिसाल दी गई थी। मौलाना अली कदर ने कहा- मेरे नजरियात से अहले सुन्नत को इख्तिलाफ हो सकता है, इसमें कोई शक नहीं, लेकिन जिस शेर जैसी जिंदगी को जिया और जिस शेर जैसी मौत को गले लगाया, वह काबिल-ए-रश्क और काबिल-ए-मुबारकबाद है। एक बुजुर्ग और सियासी शख्सियत शहादत का जाम पीकर दुनिया से रुख्सत हुई है। महात्मा गांधी का संदर्भ और कर्बला की विरासत मौलाना ने महात्मा गांधी के उस कथन का हवाला दिया जिसमें 72 साथियों की मिसाल दी जाती है। उन्होंने कहा कि कर्बला से लेकर आज तक शहादतों ने समाज को संघर्ष की राह दिखाई है।
