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ग्वालियर में 500 बच्चों को पढ़ा रहे रिटायर्ड बैंक मैनेजर:पत्नी के निधन के बाद गरीब बच्चों को पढ़ाना ही बना लिया जिंदगी का उद्देश्य

रिटायरमेंट के बाद जहां ज्यादातर लोग परिवार के साथ समय बिताते हैं, वहीं रिटायर्ड बैंक मैनेजर एमएल अहिरवार ने पत्नी के निधन के बाद अपना जीवन जरूरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए समर्पित कर दिया। कोरोना की दूसरी लहर में पत्नी को खोने के बाद वे अकेलेपन और दुख में डूबने के बजाय बच्चों को पढ़ाने से जुड़ गए। करीब छह साल में उनकी पहल झुग्गी-बस्तियों और जरूरतमंद परिवारों के 400 से 500 बच्चों तक पहुंच चुकी है। 12-13 बच्चों से शुरू हुआ सफर अहिरवार बताते हैं कि पत्नी का निधन करीब 2 मई 2021 को कोरोना की दूसरी लहर के दौरान हुआ था। इसके बाद जीवन में गहरा खालीपन आ गया। इसी दौरान उनकी मुलाकात शिक्षा विभाग से सेवानिवृत्त ओपी दीक्षित से हुई, जो झुग्गी-बस्तियों के बच्चों को पढ़ाते थे। पत्नी के निधन के करीब चार-पांच महीने बाद वे भी उनके साथ जुड़ गए। शुरुआत में करीब 12-13 बच्चे पढ़ने आते थे। धीरे-धीरे संख्या बढ़ती गई और अब 400 से 500 बच्चे इस पहल से जुड़े हैं। मजदूर परिवारों के बच्चों पर फोकस अहिरवार ऐसे बच्चों को पढ़ाते हैं, जिनके माता-पिता मजदूरी या दूसरे कामों में व्यस्त रहने के कारण उनकी पढ़ाई पर पर्याप्त ध्यान नहीं दे पाते। उनका कहना है कि ऐसे बच्चे कई बार दिनभर इधर-उधर घूमते रहते हैं और गलत संगत में पड़ने का खतरा रहता है। टीकमगढ़, छतरपुर और आसपास के इलाकों से काम के लिए आने वाले प्रवासी मजदूरों के बच्चे भी उनके पास पढ़ते हैं। परिवार के लगातार स्थान बदलने से इन बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है। उनका प्रयास इन्हें शिक्षा से जोड़े रखना है। फीस और स्टेशनरी में भी मदद बच्चों को पढ़ाने के साथ अहिरवार उन्हें स्टेशनरी और अन्य पठन-पाठन सामग्री उपलब्ध कराते हैं। जरूरत पड़ने पर स्कूल फीस में भी अपनी क्षमता के अनुसार मदद करते हैं। कई बार समाजसेवी और संगठन भी इसमें सहयोग करते हैं। कुछ बच्चों का स्कूल में दाखिला भी कराया गया है, ताकि उनकी पढ़ाई जारी रह सके। परिवार भी अब साथ शुरुआत में परिवार के लोगों को उनके बच्चों के बीच अधिक समय बिताने को लेकर चिंता थी, लेकिन काम का असर देखने के बाद परिवार ने पूरा सहयोग किया। उनके बच्चे भी इस पहल में उनका समर्थन करते हैं। अहिरवार कहते हैं कि किसी बच्चे की पढ़ाई जारी रहने और उसके आगे बढ़ने से सबसे ज्यादा संतुष्टि मिलती है। उनका मानना है कि धन का दान जरूरी है, लेकिन विद्या का दान किसी का पूरा जीवन बदल सकता है।

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