खंडवा जिला मुख्यालय से 25 किलोमीटर दूर छिरवेल गांव की पहचान अब अच्छी क्वालिटी के सीताफल और प्राचीन किस्म वाले सोना-मोती गेहूं के साथ ही जैविक हल्दी से हो रही है। चार साल पहले यहां के उन्नत किसान लोकेश पालीवाल ने जैविक खेती शुरू की। उन्होंने बेहतर उत्पादन के लिए सेवफल और कद्दू से जैविक रसायन बनाया। खेत में ही केंचुआ को गोबर खाद में डालकर वर्मी कंपोस्ट तैयार किया। केंचुए से वर्मीवाश बनाकर फसलों में स्प्रे कर जमीन में भी पानी के साथ वर्मीवाश चलाया। इसके लिए गौशाला बनाई और गौमूत्र से अर्क बनाकर खेती में उपयोग किया। इससे वे फसलों का बेहतर उत्पादन ले रहे हैं। इसी कारण आस-पास के गांवों से भी किसान उनके द्वारा खेती में किए जा रहे नवाचार देखने आ रहे हैं। किसान ने बताया कि मैंने चार साल पहले जैविक खेती की शुरुआत की थी। 15 एकड़ में सीताफल का बगीचा लगाया। अच्छा उत्पादन होने लगा तो तीन साल पहले 18 एकड़ में गेंहू की प्राचीन किस्म सोना-मोती लगाई। साथ ही 6 एकड़ में चना भी लगाया। इस साल प्रयोग के तौर पर एक एकड़ में जैविक हल्दी भी लगाई है। कुल 40 एकड़ जमीन पर पूरी तरह जैविक खेती की जा रही है। सेवफल और कद्दू से बनाया जैविक रसायन किसान लोकेश पालीवाल के अनुसार सेवफल और कद्दू से जैविक रसायन बनाने की विधि एक समान है। इसके लिए एक ड्रम में 50 किलो सेवफल काटकर डाले जाते हैं। इसमें 16 किलो गुड़ मिलाकर पानी से ड्रम भरकर तीन माह के लिए बंद कर देते हैं। इसके बाद इसे 10 से 20 लीटर प्रति एकड़ उपयोग किया जाता है। इससे जो बैक्टेरिया बनते हैं, वह जमीन में सुधार करते हैं। इसी तरह 50 किलो कद्दू में 16 किलो गुड़ और पानी मिलाकर जैविक रसायन बनाया जाता है। आश्वन विधि से बना रहे गौ अर्क किसान ने बताया पौधों को प्रोटीन-विटामिन देने के लिए खेत में ही आश्वन विधि से गौ अर्क तैयार किया जा रहा है। इसके लिए गौमूत्र एकत्र करते हैं। उसे मटके में भरकर धीमी आंच पर गर्म करते हैं। उपरी हिस्से में लगे ढक्कन में पाइप लगाकर वाष्प को एकत्र करते हैं। यही वाष्प गौ अर्क कहलाती है। 40 लीटर गौमूत्र में 3 से 5 लीटर अर्क निकलता है। प्रति 16 लीटर में 200 से 250 एमएल तक गौमूत्र का उपयोग किया जाता हैं। इससे नाइट्रोजन की पूर्ति होती है। एक फसल में एक बार जब नाइट्रोजन की जरुरत होती है तक छिड़काव करते हैं। चावल और गुड़ से तैयार कर रहे माइकोराइजा किसान ने बताया पौधों को प्रोटीन-विटामिन देने के लिए चावल और गुड़ से माइकोराइजा भी तैयार कर रहे हैं। इसके लिए चावल को उबालकर उसमें गुड़ मिलाते हैं। एक मटके में दो किलो चावल और 1 किलो गुड़ मिलाकर 8 से 10 मटके तैयार करके उन्हें पेड़ के नीचे गाड़ते हैं। ऊपर कपड़े से मुंह बांध देते हैं। 8 दिन बाद निकालकर एक मटके का माल 200 लीटर के ड्रम में डालते हैं। ड्रम में 2 किलो गुड़ डालकर पानी से भर देते हैं। 15 दिन बाद प्रति एकड़ चलाते हैं 200 लीटर छिड़काव करते हैं। इससे गेहूं, चना, की जड़ों की बढ़ोतरी होती है। पौधे को प्रोटीन विटामिन मिलता है।
