धनतेरस पर नई गाड़ी खरीदने की तैयारी है, तो सिर्फ पसंदीदा मॉडल और रंग चुनना काफी नहीं है। शोरूम में गाड़ी की चाबी मिलने से पहले एक जरूरी जांच करनी होती है, जिसे PDI कहते हैं। इसमें जरा-सी चूक बाद में परेशानी बन सकती है। गाड़ी की डिलीवरी लेते समय किन चीजों को खुद जांचना चाहिए? पसंद का VIP नंबर कैसे मिलेगा और रजिस्ट्रेशन से पहले कौन-से दस्तावेज लेना जरूरी है? समझते हैं आज के मध्य प्रदेश एक्सप्लेनर में। सवाल 1: नई कार या बाइक लेते समय डिलीवरी से पहले क्या जांचें, और PDI क्यों जरूरी है? जवाब- पहले यह पक्का करें कि गाड़ी वही है, जिसकी आपने बुकिंग की थी। उसके बाद उसकी हालत देखें। इसी जांच को PDI यानी प्री-डिलीवरी इंस्पेक्शन कहते हैं। ऑटोमोबाइल विशेषज्ञ अमित शर्मा कहते हैं, ‘त्योहार पर डिलीवरी बहुत ज्यादा होती है। ग्राहक को जल्दबाजी में गाड़ी घर ले जाने की बजाय पहले उसकी पूरी जांच करनी चाहिए।’ इन जांचों के पीछे की वजह भी समझ लीजिए… अमित शर्मा कहते हैं, ‘बिना जांच के डिलीवरी स्वीकार न करें। गाड़ी खरीदने में सिर्फ कीमत और ऑफर नहीं, उसकी असली हालत भी उतनी ही जरूरी है।’ सवाल 2: टेम्परेरी नंबर और रजिस्ट्रेशन में क्या अंतर है, और मनपसंद फैंसी नंबर कैसे मिलेगा? जवाब- टेम्परेरी नंबर कुछ दिन गाड़ी चलाने की अनुमति है, जबकि परमानेंट रजिस्ट्रेशन गाड़ी की स्थायी पहचान। फैंसी नंबर चाहिए? तो पहले टाइमिंग समझिए… डीलर जैसे ही सिस्टम में गाड़ी का रजिस्ट्रेशन करता है, कंप्यूटर सीरीज का अगला खाली नंबर अपने आप दे देता है। इसलिए मनपसंद नंबर चाहिए, तो बुकिंग के वक्त ही डीलर को बता दें, और रजिस्ट्रेशन से पहले नंबर की प्रक्रिया पूरी कर लें। MP में फैंसी नंबर लेने के तीन रास्ते हैं 1. ई-नीलामी (0001, 0007, 9999 जैसे खास नंबर): 2. पहले आओ, पहले पाओ: जिस नंबर पर एक से ज्यादा दावेदार नहीं, वह तय फीस देकर सीधे मिल जाता है। 3. सबसे सस्ता रास्ता, ‘स्पेशल चॉइस नंबर’ (7,000 रुपए): MP परिवहन विभाग की अधिसूचना के मुताबिक, नई सीरीज शुरू होने के एक साल के अंदर जो फैंसी नंबर 10 बार नीलामी में रखे जाने के बाद भी नहीं बिकते, वे ‘स्पेशल चॉइस नंबर’ की सूची में चले जाते हैं। यह सूची परिवहन विभाग के पोर्टल पर दिखती है। इनमें से कोई भी नंबर डीलर के यहां रजिस्ट्रेशन के वक्त 7,000 रुपए ऑनलाइन जमा करके, पहले आओ-पहले पाओ के आधार पर लिया जा सकता है। सवाल 3: इंश्योरेंस कब से लागू होता है, और थर्ड पार्टी कवर कितने साल का होना चाहिए? जवाब- पॉलिसी में लिखी तारीख और समय से, बिल की तारीख से नहीं। अगर पॉलिसी शाम 6 बजे से शुरू है और गाड़ी दोपहर 3 बजे शोरूम से निकली, तो बीच के तीन घंटे गाड़ी बिना बीमे के रहेगी। 3 और 5 साल का थर्ड पार्टी बीमा 1 सितंबर 2018 से सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अनिवार्य हुआ है। ध्यान रखें, गाड़ी चोरी होने पर क्लेम सिर्फ ओन डैमेज या कॉम्प्रिहेंसिव पॉलिसी में मिलता है। अकेले थर्ड पार्टी बीमे में यह कवर नहीं होता। डीलर से ही लेना जरूरी नहीं: बीमा नियामक IRDAI के नियमों के तहत डीलर आपको अपनी बताई कंपनी से ही बीमा लेने के लिए मजबूर नहीं कर सकता। आप कहीं से भी पॉलिसी लें, बस उसमें गाड़ी की सही जानकारी हो। कई कंपनियों के रेट मिलाकर लेने में अक्सर अच्छी बचत होती है। पॉलिसी में क्या देखें: राजेश वर्मा कहते हैं, ‘सिर्फ पॉलिसी की कॉपी ले लेना काफी नहीं है। उसमें चेसिस नंबर, इंजन नंबर और मालिक का नाम सही होना चाहिए। बिना वैध थर्ड पार्टी बीमे के सड़क पर गाड़ी चलाना कानूनन गलत है।’ बिना बीमे के पकड़े गए तो: मोटर वाहन अधिनियम की धारा 196 के तहत पहली बार 2,000 रुपए और दोबारा 4,000 रुपए जुर्माना, या तीन महीने तक की जेल हो सकती है। सवाल 4: शोरूम से गाड़ी लेते समय कौन-से दस्तावेज मिलने चाहिए? जवाब- डिलीवरी के दिन ही ये सारे कागज ले लें। बाद में मांगने पर डीलर अक्सर टालता है। इन कागजों में ये बातें खास तौर पर देखें… सवाल 5: नई गाड़ी में डिलीवरी के बाद खराबी निकले तो शिकायत कहां करें? जवाब- शिकायत में तीन कदम हैं, और हर कदम का लिखित रिकॉर्ड रखें… शिकायत किसके खिलाफ करें… मध्य प्रदेश एक्सप्लेनर की ये कड़ी भी पढ़ें… भोपाल के एक कार शोरूम में ₹23 लाख की वर्टस GT डिलीवरी का इंतजार कर रही थी। ग्राहक के नाम पर बुक यह कार एक रात शोरूम से गायब हो गई। कार ले जाने वाला बाहर का चोर नहीं, शोरूम का सेल्समैन गजेंद्र था। …पूरा एक्सप्लेनर पढ़िए।
