भोपाल की 19 वर्षीय ज्योति (बदला हुआ नाम) रोजाना लॉन टेनिस की प्रैक्टिस करती थी। फिटनेस अच्छी थी, लेकिन पढ़ाई और मोबाइल के कारण वह लंबे समय तक झुककर बैठती थी। धीरे-धीरे उसे कमर में हल्का दर्द और पैरों में झुनझुनी महसूस होने लगी। शुरुआत में उसने इसे नजरअंदाज किया, लेकिन कुछ ही महीनों में हालत बिगड़ गई। जांच कराने पर पता चला कि उसे एडवांस स्टेज का स्लिप डिस्क है, जिसमें नसों पर दबाव बन रहा था। डॉक्टरों के मुताबिक, समय रहते इलाज नहीं होता तो यह केस पैरालिसिस तक जा सकता था। यह तो सिर्फ एक केस है। देश में तेजी से बदलती लाइफ स्टाइल अब युवाओं के शरीर पर भारी पड़ने लगी है। जिस स्लिप डिस्क और पैरालिसिस (लकवा) को कभी बढ़ती उम्र की बीमारी माना जाता था, वह अब 25 से 35 साल के युवाओं में तेजी से फैल रही है। हालत यह है कि रोजाना राजधानी के अस्पतालों में ऐसे केस आ रहे हैं, जहां युवा मरीज चलने-फिरने की क्षमता खोने की कगार पर हैं। ऑर्थो स्पाइन और स्पोर्ट्स इंजरी विशेषज्ञ डॉ. प्रज्ञेश सक्सेना के अनुसार, पिछले तीन साल में इस बीमारी का पैटर्न पूरी तरह बदल गया है और यह बदलाव सीधे तौर पर कॉर्पोरेट कल्चर और डिजिटल लाइफस्टाइल से जुड़ा हुआ है। 8 घंटे की जॉब ने पैरालिसिस की स्थिति में पहुंचाया 26 वर्षीय कॉर्पोरेट प्रोफेशनल विजय मिश्रा जो कि जेल रोड पर रहते हैं और वर्क फ्रॉम होम के दौरान रोजाना 8-10 घंटे लैपटॉप पर बैठकर काम करते थे। उनकी लाइफस्टाइल पूरी तरह सिडेंट्री हो चुकी थी न वॉक, न एक्सरसाइज। कुछ समय बाद उन्हें पैरों में कमजोरी और सुन्नपन महसूस होने लगा। उन्होंने इसे थकान समझकर नजरअंदाज किया, लेकिन एक दिन अचानक खड़े होने में भी दिक्कत होने लगी। एमआरआई में सामने आया कि स्लिप डिस्क के कारण नसें बुरी तरह दब चुकी हैं और वे पैरालिसिस की स्थिति में पहुंच चुके थे। 45+ से खिसककर 25+ तक पहुंची बीमारी डॉ. प्रज्ञेश सक्सेना सक्सेना बताते हैं कि कुछ साल पहले तक उनके पास आने वाले मरीजों की तस्वीर बिल्कुल अलग थी। पहले 100 मरीजों में से करीब 80% मरीज 45 साल से ऊपर के होते थे। यानी यह बीमारी उम्र से जुड़ी मानी जाती थी। अब स्थिति पूरी तरह उलट चुकी है। अब हर दिन करीब 150 मरीज क्लिनिक पर पहुंच रहे हैं, जिनमें से 70 से 80 प्रतिशत मरीज 25 से 35 साल की उम्र के हैं। यानी आधे से ज्यादा मरीज अब युवा हैं, जो करियर की शुरुआत या पीक फेज में होते हैं। हर दिन 4-5 मरीज पैरालिसिस के कगार पर स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि रोजाना आने वाले 60-70 स्लिप डिस्क मरीजों में से 4-5 मरीज ऐसे होते हैं, जिनकी एमआरआई रिपोर्ट में पैरालिसिस या तो हो चुका होता है या जल्द होने की स्थिति बन चुकी होती है। डॉ. सक्सेना कहते हैं कि यह पहले बहुत रेयर माना जाता था, लेकिन अब यह रोज की स्थिति बन गई है। कई ऐसे मरीज आते हैं जिन्हें खुद अंदाजा भी नहीं होता कि उनकी हालत इतनी गंभीर हो चुकी है। टीनएज तक पहुंच गया खतरा इस बीमारी का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि यह अब टीनएज और शुरुआती युवावस्था तक पहुंच चुकी है। डॉ. सक्सेना ने 19 साल की एक लॉन टेनिस खिलाड़ी में भी स्लिप डिस्क का गंभीर केस देखा है। इसके अलावा 23, 24, 26 साल के कॉर्पोरेट प्रोफेशनल्स बड़ी संख्या में सामने आ रहे हैं। कैसे स्लिप डिस्क बनता है पैरालिसिस का कारण? रीढ़ की हड्डियों के बीच मौजूद डिस्क एक कुशन की तरह काम करती है, जो हड्डियों के बीच संतुलन बनाए रखती है। जब व्यक्ति लंबे समय तक झुककर बैठता है, तो यह डिस्क दबने लगती है और धीरे-धीरे बाहर की ओर खिसक जाती है। यह बाहर निकली डिस्क आसपास की नसों पर दबाव डालती है। ये नसें शरीर को मूवमेंट (चलना-फिरना) देने का काम करती हैं। डॉक्टर बताते हैं कि कई बार दर्द बहुत देर से आता है, इसलिए मरीज को पता ही नहीं चलता कि अंदर गंभीर समस्या बढ़ रही है। जब जांच होती है, तब तक स्लिप डिस्क एडवांस स्टेज (ग्रेड 4) तक पहुंच चुकी होती है। मोबाइल और लैपटॉप ने बिगाड़ा पोश्चर डॉ. सक्सेना बताते हैं आज की लाइफस्टाइल में लगभग 90% गतिविधियां झुककर करने वाली हो गई हैं मोबाइल देखना, लैपटॉप पर काम करना, यहां तक कि आराम करते समय भी शरीर झुका रहता है। इससे रीढ़ पर आगे की तरफ लगातार दबाव पड़ता है और नसों पर असर शुरू हो जाता है। सीधी रीढ़, सुरक्षित शरीर डॉ. सक्सेना के अनुसार, हमारी रीढ़ जितनी सीधी रहती है, उतनी ही उसकी वजन सहने की क्षमता बढ़ती है। लेकिन जैसे-जैसे हम झुकते हैं, वैसे-वैसे उस पर दबाव बढ़ता जाता है और यही दबाव आगे चलकर बड़ी बीमारी बन जाता है। ये खबर भी पढ़ें… कैंसर से टूटी रीढ़, 30 मिनट के ऑपरेशन से जोड़ी डॉक्टरों ने कैंसर से जूझ रहे एक मरीज के जीवन में उम्मीद की रोशनी जगा दी। जिस मरीज की रीढ़ की हड्डी कैंसर की वजह से दबकर लगभग टूट गई थी और तेज दर्द के कारण वह बिस्तर से उठ भी नहीं पा रहा था, उसी मरीज पर एम्स के डॉक्टरों ने एक आधुनिक तकनीक काइफोप्लास्टी का सफल ऑपरेशन किया। खास बात यह कि यह प्रक्रिया केवल 30 मिनट में पूरी हुई और मरीज ऑपरेशन के तुरंत बाद चलने-फिरने लगा।पूरी खबर पढ़ें
