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कहीं सती के दांत गिरने, कहीं कंधा गिरने की मान्यता:52 शक्तिपीठों में प्रमुख छत्तीसगढ़ में; विदेशी भक्त भी जलवाएंगे ज्योति, डोंगरगढ़ में रुकेंगी 10 ट्रेनें

इस बार 11 अक्टूबर से शारदीय नवरात्र की शुरुआत हो रही है। छत्तीसगढ़ के बस्तर स्थित मां दंतेश्वरी मंदिर, डोंगरगढ़ के मां बम्लेश्वरी मंदिर, बिलासपुर के महामाया मंदिर और रायपुर के महामाया मंदिर समेत कई मंदिरों में तैयारियां लगभग पूरी हो गई है। मिलावट को देखते हुए इस बार भी कई माता मंदिरों में घी के दीपक नहीं जलाए जाएंगे। इन मंदिरों में लाइव दर्शन और श्रद्धालुओं के रुकने समेत कई इंतजाम किए गए हैं। मंदिरों में विशेष आरती के साथ मनोकामना ज्योति कलश भी जलाए जाएंगे। कई विदेशी भक्तों ने भी बुकिंग कराई है। नवरात्रि के दौरान 11 से 20 अक्टूबर तक 10 लंबी दूरी की एक्सप्रेस ट्रेनों का डोंगरगढ़ स्टेशन पर अस्थायी ठहराव भी दिया जाएगा। इसके साथ ही कुछ मेमू ट्रेनों का डोंगरगढ़ और रायपुर तक अस्थायी रूप से विस्तार किया जाएगा। दैनिक भास्कर आपको बता रहा है प्रदेश के प्रमुख मंदिरों में क्या-क्या कार्यक्रम होंगे। इन मंदिरों में इस साल नवरात्रि में क्या खास है, दर्शन-पूजन और ज्योति कलश की क्या व्यवस्थाएं हैं पढ़िए:- पहले जानिए शक्ति पीठों के बारे में… 3 देवियों को समर्पित है मां महामाया देवी रतनपुर स्थित महामाया मंदिर महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती को समर्पित है। यह 52 शक्तिपीठों में से एक है। स्थानीय धार्मिक मान्यता के अनुसार यहां माता सती का दायां कंधा गिरा था। देवी महामाया को कोसलेश्वरी के रूप में भी जाना जाता है। वे प्राचीन दक्षिण कोसल क्षेत्र की अधिष्ठात्री देवी हैं। इस बार करीब एक टन दोना-पत्तल का ऑर्डर है, जिसमें प्रसाद दिया जाएगा। मध्यप्रदेश के राजा की कुलदेवी, इतिहास 2000 साल पुराना डोंगरगढ़ की पहाड़ी पर स्थित मां बम्लेश्वरी देवी का विख्यात मंदिर आस्था का केंद्र है। बड़ी बम्लेश्वरी के समतल पर स्थित मंदिर छोटी बम्लेश्वरी के नाम से प्रसिद्ध है। बम्लेश्वरी शक्तिपीठ का इतिहास करीब 2,000 वर्ष पुराना है। इसे वैभवशाली कामाख्या नगरी के रूप में जाना जाता था। मां बम्लेश्वरी को मध्य प्रदेश के उज्जयिनी के प्रतापी राजा विक्रमादित्य की कुलदेवी भी कहा जाता है। इतिहासकारों ने इस क्षेत्र को कलचुरी काल का पाया है। मंदिर की अधिष्ठात्री देवी मां बगलामुखी हैं। उन्हें मां दुर्गा का स्वरूप माना जाता है। यहां उनकी पूजा मां बम्लेश्वरी के रूप में की जाती है। डोंगरगढ़ स्टेशन से कुछ ट्रेनों का विस्तार दंतेश्वरी मंदिर की मान्यता- देवी का दांत गिरा था देश के 52 शक्ति पीठों में से एक दंतेश्वरी मंदिर है। मान्यता है कि यहां देवी का दांत गिरा था। 14वीं शताब्दी में बना यह मंदिर दंतेवाड़ा में स्थित है। मां की मूर्ति काले पत्थर से तराश कर बनाई गई है। मंदिर को चार भागों में विभाजित किया गया है। गर्भगृह और महा मंडप का निर्माण पत्थर के टुकड़ों से किया गया था। मंदिर के प्रवेश द्वार के सामने एक गरुड़ स्तंभ है। मंदिर खुद एक विशाल प्रांगण में स्थित है जो विशाल दीवारों से घिरा हुआ है। शिखर को मूर्तिकला से सजाया गया है। विदेशों के भक्त भी ज्योत जलाने www.maadanteshwari.in वेबसाइट पर ऑनलाइन बुकिंग करवा रहे हैं। इसके अलावा यदि कोई भक्त पूरे 9 दिनों तक माता के दर्शन करना चाहता है, तो 2100 रुपए की रसीद कटवा सकता है। इस दौरान रोज सार्वजनिक कार्यक्रम होंगे। मंदिर में मिलने वाले चांदी के सिक्के की कीमत बढ़ी मंदिर में मिलने वाले 10 ग्राम के चांदी के सिक्के की कीमत इस बार 4100 रुपए रखी गई है। पिछली बार इसकी कीमत करीब 2100 रुपए थी। पिछली बार 1100 से ज्यादा सिक्के तैयार किए गए थे। इन्हें दो किस्तों में तैयार किया गया था, जिसमें पहली किस्त में 600 और दूसरी किस्त में 500 सिक्के बनाए गए थे। इस बार चांदी के बाजार भाव बढ़ने का असर सिक्के की कीमत पर भी पड़ा है। 3 देवियों की आराधना एक साथ 1400 साल पहले महामाया मंदिर का निर्माण हैहयवंशी राजाओं ने करवाया था। महामाया मंदिर का गर्भगृह और गुंबद का निर्माण श्रीयंत्र के रूप में हुआ है। मंदिर में मां महालक्ष्मी, मां महामाया और मां समलेश्वरी तीनों की पूजा आराधना एक साथ की जाती है। अंबिकापुर की महामाया को पहले कहते थे समलाया अंबिकापुर का नाम महामाया अंबिका देवी के नाम पर है। किंवदंती (मान्यता) है कि महामाया का सिर रतनपुर और धड़ अंबिकापुर में है। माता की प्रतिमा छिन्नमस्तिका है। महामाया के बगल में विंध्यवासिनी विराजमान हैं। विंध्यवासिनी की प्राण-प्रतिष्ठा विंध्याचल से लाकर की गई है। शारदीय नवरात्र में छिन्नमस्तिका महामाया के शीश का निर्माण राजपरिवार के कुम्हार हर साल करते हैं। जिस प्रतिमा को लोग मां महामाया के नाम से पूजते हैं, पहले उसका नाम समलाया था। महामाया मंदिर में ही दो मूर्तियां स्थापित थीं। पहले महामाया को बड़ी समलाया कहा जाता था और समलाया मंदिर में विराजमान मां समलाया को छोटी समलाया कहते थे। बाद में समलाया मंदिर में छोटी समलाया की प्रतिमा स्थापित की गई। इसके बाद उन्हें महामाया कहा जाने लगा। पहाड़ी पर विराजित हैं मां चंद्रहासिनी सक्ती जिले के चंद्रपुर की छोटी-सी पहाड़ी पर मां चंद्रहासिनी विराजित हैं। मान्यता है कि देवी सती का अधोदंत (दाढ़) चंद्रपुर में गिरा था। यह मंदिर मां दुर्गा के 52 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। यहां पौराणिक और धार्मिक कथाओं की झांकियां और करीब 100 फीट ऊंची महादेव-पार्वती की विशाल प्रतिमा श्रद्धालुओं का मन मोह लेती है। अब जानिए अंचल की देवियों के बारे में… कोरबा के सर्वमंगला देवी मंदिर का निर्माण कोरेश के जमींदार परिवार ने करवाया था। यह मंदिर त्रिलोकीनाथ मंदिर, काली मंदिर और ज्योति कलश भवन से घिरा हुआ है। यहां भी एक गुफा है, जो नदी के नीचे से होकर दूसरी तरफ निकलती है। गंगरेल में 52 गांव डूबे, तब हुई मां अंगारमोती की स्थापना धमतरी जिले के गंगरेल में 52 गांवों के डूबने के बाद मां अंगारमोती की स्थापना की गई थी। मंदिर में माता की चरण पादुकाएं अभी भी विराजित हैं। गंगरेल बांध बनने से पहले ये 52 गांव टापू पर स्थित थे। बांध बनने के बाद इन गांवों के लोगों ने मां अंगारमोती को बांध के किनारे लाकर स्थापित किया। वे माता को अपनी अधिष्ठात्री देवी मानते हैं। माता के चरणों को छूती हैं जलधाराएं गरियाबंद जिले में स्थित जतमई माता के मंदिर से सटी जलधाराएं उनके चरणों का स्पर्श करती हैं। स्थानीय मान्यता के अनुसार, ये जलधाराएं माता की दासियां हैं। मेन गेट पर पौराणिक पात्रों को दर्शाते भित्तिचित्र देखे जा सकते हैं। मां जतमई की पत्थर की मूर्ति गर्भगृह में स्थापित है। 150 साल पुराना चंडी मंदिर, आरती में आते हैं भालू महासमुंद जिले के बागबाहरा के घुंचापाली में मां चंडी का मंदिर स्थित है। मान्यता है कि करीब 150 साल पहले यह तंत्र-मंत्र की साधना का स्थल हुआ करता था। यहां महिलाओं का जाना प्रतिबंधित था। प्राकृतिक रूप से एक शिला (पत्थर) ने मां चंडी के स्वरूप में आकार लिया। इसके बाद वैदिक रीति-रिवाज से पूजा-अर्चना शुरू हुई। इसके बाद महिलाओं के मां चंडी की पूजा करने पर लगा प्रतिबंध भी समाप्त हो गया। यहां सुबह-शाम आरती के वक्त भालुओं की आमद भी होती है। इस बार श्रद्धालु मंदिर की वेबसाइट chandimata.in पर जाकर 9 दिनों तक 24×7 लाइव दर्शन कर सकते हैं। दिव्यांगों और बुजुर्गों के लिए निशुल्क वाहन की व्यवस्था है। तीन मंजिला मंदिर में विराजे 12 ज्योतिर्लिंग बरफानी धाम राजनांदगांव शहर में स्थित है। मंदिर के शीर्ष पर एक बड़ा शिवलिंग है। उसके सामने नंदी की विशाल प्रतिमा है। मंदिर तीन स्तरों में बना है। निचले स्तर पर पाताल भैरवी का मंदिर है, दूसरे स्तर पर नवदुर्गा या त्रिपुर सुंदरी विराजमान हैं और ऊपरी स्तर पर भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों की प्रतिमाएं हैं। ………………… इससे जुड़ी खबर भी पढ़ें… छत्तीसगढ़ में ₹200 का स्मारक सिक्का होगा जारी: माता साहिब हासी देवी का सम्मान, राष्ट्रपति मुर्मू करेंगी लॉन्च, कोलकाता टकसाल में बना, 35 ग्राम वजन शदाणी दरबार की पीठाधीश माता साहिब हासी देवी की 200वीं जयंती पर भारत सरकार 200 रुपए का स्मारक सिक्का जारी करेगी। 22 अक्टूबर को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू रायपुर लोकभवन में इसका विमोचन करेंगी। इसके साथ ही विशेष डाक टिकट भी जारी किया जाएगा। पढ़ें पूरी खबर…

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