केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह 3 अक्टूबर को भोपाल आएंगे। वे राज्य स्तरीय गोपालक सम्मेलन में शामिल होंगे और चार राज्यों के सहकारिता मंत्रियों के साथ बैठक करेंगे। उनके दौरे से प्रदेश में 2018 से लंबित सहकारी चुनावों को लेकर फिर चर्चा तेज हो गई है। किसान, पशुपालक और स्थानीय सहकारिता नेता उम्मीद कर रहे हैं कि शाह चुनाव कराने को लेकर सरकार और संगठन को दिशा-निर्देश दे सकते हैं। प्रदेश में PACS ( प्रायमरी एग्रीकल्चर को-ऑपरेटिव सोसाइटी) से लेकर जिला सहकारी बैंकों और अपेक्स बैंक तक निर्वाचित बोर्ड नहीं हैं, इनका संचालन सरकारी अफसरों या प्रशासकों के हाथ में है। जानकारों के मुताबिक, ‘प्रशासक राज’ का सबसे ज्यादा असर किसानों और पशुपालकों पर पड़ रहा है। समितियों और बैंकों में निर्वाचित प्रतिनिधि नहीं होने से किसानों की स्थानीय समस्याएं उठाने वाला कोई नहीं है। खाद-बीज की उपलब्धता और सरकारी योजनाओं के लाभ के लिए उन्हें दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। चुनाव नहीं होने से सहकारिता में नई स्थानीय लीडरशिप भी तैयार नहीं हो पा रही है। पढ़िए रिपोर्ट… सरकार ने कानून बदलकर चुनाव टालने की ताकत बढ़ाई हाईकोर्ट ने 20 दिसंबर 2023 को जनहित याचिका पर आदेश देते हुए 10 मार्च 2024 से पहले चुनाव कराने को कहा था। चार चरणों में चुनाव कराने का कार्यक्रम भी प्रस्तावित हुआ, लेकिन कांग्रेस की आपत्तियों, विधानसभा-लोकसभा चुनाव और बाद में ‘बीज-खाद समितियों के विभाजन’ का हवाला देकर चुनाव टलते गए। इसके बाद मार्च 2025 में सरकार ने सहकारी अधिनियम में संशोधन किए। इनमें तीन प्रमुख प्रावधान जोड़े गए, जिनका सहकारी संस्थाओं के चुनाव और संचालन पर सीधा असर पड़ता है। किसे फायदा, किसका नुकसान? इस व्यवस्था में सरकार को प्रशासनिक नियंत्रण का फायदा है, जबकि किसान और स्थानीय सहकारिता नेता निर्णय प्रक्रिया से बाहर हो गए हैं। सरकार को फायदा: निर्वाचित बोर्ड नहीं होने से स्थानीय स्तर पर राजनीतिक हस्तक्षेप कम रहता है और खाद-बीज, ऋण व उपार्जन जैसे फैसलों पर सरकार का प्रशासनिक नियंत्रण बना रहता है। 2026 में अधिकारियों की जगह राजनीतिक कार्यकर्ताओं को प्रशासक बनाने की तैयारी की खबरें भी सामने आई हैं। किसानों को नुकसान: सहकारी संस्थाओं में निर्वाचित बोर्ड नहीं होने से किसानों की स्थानीय शिकायतें उठाने वाला प्रतिनिधि तंत्र मौजूद नहीं है। सहकारिता नेताओं को झटका: लंबे समय से सहकारिता की राजनीति कर रहे स्थानीय नेताओं के लिए अध्यक्ष या संचालक बनने के अवसर बंद हैं। इससे उनका स्थानीय राजनीतिक नेटवर्क प्रभावित हुआ है। आंकड़ों में सहकारिता व्यवस्था की चुनौतियां सहकारिता से जुड़े पूर्व प्रदेश संयोजक मदनलाल राठौर के मुताबिक, मध्य प्रदेश में सहकारिता व्यवस्था की स्थिति चिंताजनक है। वे इसके असर को इन आंकड़ों से समझाते हैं। बैद्यनाथन कमेटी की सिफारिशों पर सवाल 2008 में सहकारिता को मजबूत करने के लिए सरकार ने बैद्यनाथन कमेटी की सिफारिशें लागू की थीं। इसके तहत केंद्र सरकार से मध्य प्रदेश को 800 करोड़ रुपए मिले थे। कमेटी की प्रमुख शर्तों में सहकारी संस्थाओं में निर्वाचित व्यक्ति को अध्यक्ष बनाने और गैर-निर्वाचित व्यक्ति को प्रशासक या अध्यक्ष नहीं बनाने का प्रावधान था। मौजूदा व्यवस्था को इसी प्रावधान के संदर्भ में सवालों के घेरे में रखा जा रहा है। चुनाव नहीं होने पर सरकार की दलील, विशेषज्ञों की आपत्ति सरकार ने विधानसभा में चुनाव न कराने के पीछे कई प्रक्रियागत कारण बताए हैं। इनमें 2019 में सदस्यता सूची का नया प्रारूप, कोरोना काल, आचार संहिताएं, कर्जमाफी योजना से पात्रता में बदलाव और न्यायालय में लंबित मामले शामिल हैं। सरकार का कहना है कि चुनाव नहीं होने से संस्थाएं निष्क्रिय नहीं होतीं। वहीं सहकार भारती के प्रदेश महामंत्री राकेश चौहान इससे असहमत हैं। उनका कहना है, लोकतांत्रिक प्रक्रिया को-ऑपरेटिव का मूल सिद्धांत है। चुनाव नहीं होने से लोकतांत्रिक व्यवस्था प्रभावित होती है। इससे किसानों के साथ-साथ को-ऑपरेटिव लीडरशिप को भी नुकसान हुआ है।
