इंजेक्शन लगते ही कुछ ही मिनटों में मरीज खुद सांस लेना बंद कर देता है। दिमाग तक ऑक्सीजन पहुंचना रुकने लगता है। फिर ब्रेन डैमेज, कार्डियक अरेस्ट और कुछ ही देर में मौत…
यह किसी थ्रिलर फिल्म का दृश्य नहीं, बल्कि उस इंजेक्शन की हकीकत है, जिसका इस्तेमाल केवल ऑपरेशन थिएटर में एनेस्थीसिया विशेषज्ञ की निगरानी में किया जाता है। पिछले साल एम्स भोपाल की वरिष्ठ डॉक्टर ने इसी इंजेक्शन का उपयोग कर आत्महत्या की थी।
इतना खतरनाक होने के बावजूद यह इंजेक्शन मध्यप्रदेश के मेडिकल कॉलेजों के बाहर मौजूद मेडिकल स्टोरों पर कितनी आसानी से मिल रहा है, इसकी पड़ताल दैनिक भास्कर ने की।
20 जून 2026 को कटनी में एक नर्सिंग छात्रा ने एनेस्थीसिया इंजेक्शन लगाकर आत्महत्या कर ली थी। घटना के बाद उसकी बहन का सवाल था-ऑपरेशन थिएटर में इस्तेमाल होने वाला इतना खतरनाक इंजेक्शन उसके पास पहुंचा कैसे? इसी सवाल का जवाब तलाशने के लिए भास्कर रिपोर्टर ने इंदौर, भोपाल और सागर में 10 दिन से ज्यादा समय तक पड़ताल की। कभी मरीज के परिजन बनकर तो कभी आम ग्राहक की तरह मेडिकल स्टोरों पर पहुंचे। कई जगह इंजेक्शन खरीदने की पूरी प्रक्रिया कैमरे में रिकॉर्ड की गई। जांच में सामने आया कि कई मेडिकल स्टोर संचालकों ने डॉक्टर का वैध प्रिस्क्रिप्शन, अस्पताल की सील या मरीज से जुड़ा कोई मेडिकल दस्तावेज मांगे बिना ही इंजेक्शन बेच दिया। केस:1
सागर- सिर्फ नाम लिखी पर्ची दिखाई… मिनटों में मिल गया इंजेक्शन भास्कर रिपोर्टर ने सबसे पहले ऐसे परिजन की तलाश शुरू की, जो इस इंजेक्शन की पर्ची लेकर मेडिकल स्टोर पहुंच रहा हो। पहले दिन कई लोगों से बातचीत की गई, लेकिन ऐसा कोई मरीज या परिजन नहीं मिला।
दूसरे दिन अस्पताल स्टाफ से चर्चा के दौरान एक अहम जानकारी सामने आई। पता चला कि किसी मरीज की मौत के बाद डॉक्टर मेडिकल स्टोर के स्टाफ से सीधे इंजेक्शन मंगवा रहे हैं।
केवल इमरजेंसी की स्थिति में परिजनों को साधारण पर्ची पर इंजेक्शन का नाम लिखकर दिया जाता है।
अगले दिन सुबह से फिर ऐसे परिजनों की तलाश शुरू हुई। देर रात करीब 9 बजे भास्कर टीम को सफलता मिली।
एक 26 वर्षीय युवक रोहित (बदला हुआ नाम) अपने बुजुर्ग नाना के लिए ये खास इंजेक्शन खरीदने पहुंचा था। उसने बताया कि अगले दिन सुबह उसके नाना का सिस्ट का ऑपरेशन होना है और डॉक्टर ने यह इंजेक्शन मंगवाया है। वह पूरी प्रक्रिया कैमरे में रिकॉर्ड कराने के लिए भी तैयार हो गया।
रोहित सबसे पहले बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज के मुख्य द्वार के सामने स्थित एक मेडिकल स्टोर पर पहुंचा। वहां दुकानदार ने स्टॉक खत्म होने की बात कहकर लौटा दिया।
इसके बाद वह दूसरे मेडिकल स्टोर पहुंचा। यहां मेडिकल स्टोर संचालक ने डॉक्टर का वैध प्रिस्क्रिप्शन, अस्पताल की सील या मरीज से जुड़ा कोई मेडिकल दस्तावेज नहीं मांगा।
उसने केवल साधारण पर्ची पर इंजेक्शन का नाम देखा, कुछ सामान्य सवाल पूछे और कुछ ही मिनटों में इंजेक्शन बेच दिया।
यानी जिस इंजेक्शन का इस्तेमाल केवल ऑपरेशन थिएटर में विशेषज्ञ की निगरानी में होना चाहिए, वह सिर्फ नाम लिखी एक साधारण पर्ची के आधार पर उपलब्ध हो गया। केस-2 : भोपाल- नहीं मांगा प्रिस्क्रिप्शन, बिना मेडिकल सत्यापन बेच दी दवा भोपाल में गांधी मेडिकल कॉलेज के बाहर भी सागर जैसी स्थिति देखने को मिली। रिपोर्टिंग के दौरान एक 30 वर्षीय युवक मिला, जो यह इंजेक्शन खरीदने आया था। उसके हाथ में सिर्फ एक साधारण पर्ची थी, जिस पर केवल इंजेक्शन का नाम लिखा हुआ था।
वह पहले एक मेडिकल स्टोर पर पहुंचा। दुकानदार ने स्टॉक खत्म होने की बात कह दी। युवक जैसे ही आगे बढ़ा, उसी दुकानदार ने बगल के दूसरे मेडिकल स्टोर का पता बता दिया।
दूसरे मेडिकल स्टोर पर युवक ने सिर्फ दवा का नाम लिखी साधारण पर्ची दिखाई। भास्कर टीम ने पूरी प्रक्रिया कैमरे में रिकॉर्ड की।
यहां भी मेडिकल स्टोर संचालक ने न तो डॉक्टर का वैध प्रिस्क्रिप्शन मांगा और न ही अस्पताल की सील या मरीज से जुड़ा कोई मेडिकल दस्तावेज। दवा का नाम देखकर इंजेक्शन उपलब्ध करा दिया।
यानी राजधानी में भी जिस दवा की बिक्री सख्त मेडिकल निगरानी में होनी चाहिए, वह सामान्य पर्ची के आधार पर बेची जा रही थी। केस: 3
इंदौर- यहां तस्वीर अलग, स्टॉक नहीं लेकिन मंगवाने का भरोसा
भोपाल और सागर के विपरीत इंदौर में भास्कर टीम को अलग तस्वीर देखने को मिली। सरकारी मेडिकल कॉलेज के आसपास करीब आठ घंटे तक ऐसे परिजनों की तलाश की गई, जो यह इंजेक्शन खरीदने आए हों, लेकिन ऐसा कोई व्यक्ति नहीं मिला।
पड़ताल को आगे बढ़ाने के लिए शाम करीब 8 बजे एक मेडिकल स्टाफ की मदद ली गई। स्टाफ ने एक पर्चे पर इस खास इंजेक्शन का नाम लिखा। इसके बाद टीम कई मेडिकल स्टोरों पर पहुंची।
हालांकि, किसी भी मेडिकल स्टोर पर यह इंजेक्शन उपलब्ध नहीं मिला। ज्यादातर दुकानदारों ने बताया कि यह दवा नियमित रूप से स्टॉक में नहीं रखी जाती। यदि दिन के समय दवा बाजार खुला हो तो मांगने पर मंगवाई जा सकती है।
यानी इंदौर में इंजेक्शन तत्काल उपलब्ध नहीं मिला, लेकिन दुकानदारों ने यह भी स्पष्ट किया कि आवश्यकता पड़ने पर इसे मंगाया जा सकता है।
सागर में एक दिन पहले लगाया इंजेक्शन, 11 दिन वेंटिलेटर पर रहने के बाद मौत इस इंजेक्शन के गलत इस्तेमाल का मामला सागर के बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज में सामने आया था। यहां भर्ती मरीज देवेंद्र पाठक को बायोप्सी के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया था। आरोप है कि ऑपरेशन के दौरान इस्तेमाल होने वाला इंजेक्शन ऑपरेशन से एक दिन पहले ही नर्स ने आईवी लाइन के जरिए लगा दिया। इंजेक्शन लगने के कुछ मिनट बाद मरीज की हालत बिगड़ गई। करीब 45 मिनट तक सीपीआर देना पड़ा। इसके बाद मरीज को 11 दिन तक वेंटिलेटर पर रखा गया, लेकिन उसकी जान नहीं बच सकी। मामले की जांच के बाद कॉलेज प्रबंधन ने नर्स शिखा पटले को निलंबित कर दिया। प्रदेश के उपमुख्यमंत्री एवं स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ला ने भी इस मामले में जांच के आदेश दिए हैं। डॉक्टरों ने कहा- गुणवत्ता को लेकर शिकायत की गई थी भास्कर की पड़ताल में यह भी सामने आया कि ये इंजेक्शन सरकारी सप्लाई में उपलब्ध कराया जाता है।
मेडिकल कॉलेज से मिली जानकारी के अनुसार, सागर मेडिकल कॉलेज के एनेस्थीसिया विभाग ने इस दवा की गुणवत्ता को लेकर बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज के डीन कार्यालय में शिकायत की थी।
विभाग का कहना था कि सरकारी सप्लाई में आने वाली दवा अपेक्षित गुणवत्ता की नहीं है, जिससे मरीजों पर इसका असर नहीं हो रहा है।
जब सप्लाई में सुधार नहीं हुआ तो मरीजों के परिजनों से बाहर की मेडिकल दुकानों से इंजेक्शन मंगवाने की व्यवस्था शुरू कर दी गई। सिर्फ 45 से 90 रुपए का इंजेक्शन, लेकिन खतरा बहुत बड़ा इस इंजेक्शन की बाजार कीमत महज 45 से 90 रुपए के बीच है। लेकिन इसकी सबसे बड़ी समस्या कीमत नहीं, बल्कि इसकी आसान उपलब्धता है।
जिस दवा का इस्तेमाल केवल ऑपरेशन थिएटर में एनेस्थीसिया विशेषज्ञ की निगरानी में होना चाहिए। लेकिन वह बिना पर्याप्त मेडिकल सत्यापन के मेडिकल स्टोर से मिल जाए तो उसके दुरुपयोग की आशंका कई गुना बढ़ जाती है।
यही वजह है कि विशेषज्ञ इस दवा की बिक्री और उपलब्धता को लेकर सख्त निगरानी की जरूरत बता रहे हैं। समझिए… आखिर यह इंजेक्शन इतना खतरनाक क्यों है? ये कोई सामान्य इंजेक्शन नहीं है। इसका इस्तेमाल केवल ऑपरेशन थिएटर में एनेस्थीसिया के दौरान किया जाता है।
भोपाल सिटी सोसाइटी ऑफ एनेस्थीसियोलॉजी के अध्यक्ष डॉ. यशवंत धवले बताते हैं कि यह इंजेक्शन मरीज की मांसपेशियों को एक से दो मिनट के भीतर अस्थायी रूप से शिथिल (रिलैक्स) कर देता है। इसके बाद मरीज स्वयं सांस नहीं ले पाता। इसलिए इंजेक्शन लगाते ही उसे तुरंत वेंटिलेटर पर रखना पड़ता है।
यदि समय पर ऑक्सीजन और कृत्रिम श्वसन उपलब्ध नहीं कराया जाए तो कुछ ही मिनटों में मस्तिष्क तक ऑक्सीजन की आपूर्ति प्रभावित होने लगती है। इसके बाद स्थायी ब्रेन डैमेज, कार्डियक अरेस्ट और अंततः मौत तक हो सकती है। 32 मेडिकल स्टोरों पर एक्शन के बाद भी लापरवाही जून में खाद्य एवं औषधि प्रशासन ने भोपाल के मेडिकल स्टोरों पर शेड्यूल-एच दवाओं की बिक्री को लेकर बड़ी कार्रवाई की थी।
सीएमएचओ एवं उपसंचालक, खाद्य एवं औषधि प्रशासन डॉ. मनीष शर्मा के अनुसार, शेड्यूल-एच दवाओं की बिक्री केवल पंजीकृत चिकित्सक के वैध प्रिस्क्रिप्शन पर ही की जा सकती है।
नियमों का उल्लंघन करने वाले मेडिकल स्टोरों के खिलाफ औषधि एवं प्रसाधन अधिनियम के तहत कार्रवाई का प्रावधान है। इस दवा का नाम हम यहां इसलिए नहीं बता रहे- WHO की “Preventing Suicide: A Resource for Media Professionals (2023)” में मीडिया के लिए स्पष्ट सलाह दी गई है कि आत्महत्या की विधि (method) का विस्तृत वर्णन न करें।
इस्तेमाल किए गए विशिष्ट साधन या पदार्थ (specific medication/drug) का नाम देने से बचें।
ऐसी जानकारी न दें जिससे संवेदनशील व्यक्ति किसी तरीके या साधन की पहचान कर सके। मंत्री बोले- कठोर कार्रवाई करेंगे इस मामले में आधिकारिक पक्ष जानने के लिए फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन के कंट्रोलर मनोज पुष्प से कई बार फोन और मेसेज के माध्यम से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उनकी ओर से कोई जवाब नहीं मिला। प्रदेश के लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग राज्यमंत्री नरेंद्र शिवाजी पटेल से भास्कर ने इस मसले पर बात की। उन्होंने कहा कि शेड्यूल एच एवं एच-1 श्रेणी की औषधियों का विक्रय केवल चिकित्सकीय प्रिस्क्रिप्शन पर ही किया जाए।
नियमों के पालन के लिए औषधि निरीक्षक सतत निरीक्षण और कार्रवाई कर रहे हैं। इसके लिए राज्य स्तरीय फ्लाइंग स्क्वॉड का भी गठन किया गया है।
किसी भी प्रकार की अनियमितता पाए जाने पर संबंधित के विरुद्ध कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।
