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अबूझमाड़ में सरकारी पट्टे के लिए काट रहे जंगल, VIDEO:आजादी के बाद पहली बार राजस्व सर्वे, गांव छोड़कर गए लोग लौटे, इसलिए भी कटाई

छत्तीसगढ़ का अबूझमाड़ 40 साल तक नक्सलियों के एकछत्र कब्जे में रहा। खूब खून बहा। 31 मार्च 2026 को यह संकट खत्म हो, गया लेकिन 4400 वर्ग किमी में फैला यह दुर्लभ वनक्षेत्र नए संकट के मुहाने पर खड़ा है। संकट है जंगल की अंधाधुंध कटाई का। आजादी के बाद पहली बार सरकार अबूझमाड़ का राजस्व सर्वे करवा रही है। आदिवासियों में यह बात फैला दी गई है कि सरकार पट्टे बांटेगी। इसके​ लिए खुद को भू-स्वामी साबित करना होगा। यही वजह है कि गांव-गांव में बड़े पैमाने पर जंगल की कटाई हो रही है। यह बड़ा खुलासा दैनिक भास्कर इन्वेस्टिगेशन में हुआ है। पहले देखिए ये तस्वीरें- कटाई होती दिखी, जंगल जलते दिखे भास्कर टीम 2 दिन अबूझमाड़ के अंदर रही। बीजापुर से नारायणपुर, गढ़चिरौली तक 40 गांव नापे। नारायणपुर, ओरछा, इरकभट्टी, कच्चापाल, कोडलियार, पदमकोट, कुतुल, नेलांगूर तक सड़क किनारे के गांवों में कटाई होती दिखी। जंगल जलता हुआ दिखा। आदिवासी पेड़ों को 2-3 फीट की ऊंचाई पर हल्का काट कर छोड़ दे रहे हैं। पेड़ वहां से सूखने लगते हैं, गिर जाते हैं। फिर इन्हें या तो जला रहे हैं, या काट कर फेंसिंग के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं। अब सवाल यह है कि जंगल कौन काट रहा है? इसका जवाब है, पहला- मूल स्थानीय आदिवासी। दूसरा- वे आदिवासी जो नक्सलवाद के चलते, दबाव में या नौकरी के चलते 25-30 साल पहले गांव छोड़कर चले गए थे, वे बड़ी संख्या में वापसी कर रहे हैं। लोग बड़े पैमाने पर जंगल कटवा रहे हैं ताकि बड़ी जमीन के मालिक बन जाएं। पर्यावरण प्रेमी नितिन सिंघवी ने मुख्य सचिव को अबूझमाड़ के संबंध में पत्र लिखा है। सुप्रीम कोर्ट के टीएन गोदावर्मन केस का हवाला देते हुए लिखा है कि प्रतिपादित सिद्धांतों के अनुसार अबूझमाड़ का अधिकांश वन क्षेत्र प्रथम दृष्टया ‘डीम्ड फॉरेस्ट’ की श्रेणी में आता है। नक्सल खत्म होते ही जंगल कटना शुरू केंद्र सरकार ने अगस्त 2024 में घोषणा की कि 31 मार्च 2026 तक देश से नक्सलवाद खत्म कर देंगे। इसके लिए सभी क्षेत्रों समेत अबूझमाड़ में भी फोर्स उतारी गई। हर 6 किमी में कैंप खोल गए। कैंप खुलते ही गांव में नक्सली दहशत कम हो गई, तो जंगल काटने शुरू हो गए। क्योंकि पूर्व की कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में कुछ गांवों में राजस्व सर्वे हुआ था, पट्टे बांटे गए थे। बस यही वजह है कि लोग जमीन कब्जाने जुट गए हैं। जब तक नक्सलियों की दहशत थी तो जंगल से एक पेड़ नहीं कटा था। थोड़ी-थोड़ी दूरी पर नजर आती है पेड़ों की कटाई नारायणपुर से गढ़चिरौली तक 70 किमी लंबी सड़क बन रही है। इस सड़क के किनारे बसे अधिकांश गांवों में कटाई हो रही है। इनमें नेलांगूर, पदमकोट भी शामिल हैं। यहां पेड़ काटे जा रहे हैं। जलाए जा रहे हैं। तस्वीरों में यह साफ दिखाई देता है। यहीं अभी-अभी घर बन रहे हैं। यह भी स्पष्ट दिखता है। कच्चापाल से ओरछा तक- कच्चापाल रामकृष्ण मिशन आश्रम के ठीक सामने मार्च-अप्रैल में हजारों पेड़ काट दिए गए। इस सड़क के दोनों तरफ जहां तक नजर जाती है, ठूंठ ही दिखते हैं। कटाई करने वालों को कभी ​शासन-प्रशासन ने नहीं रोका। सरपंच राजमनू रेड्डी कहती हैं- गांववालों ने ही जंगल काटा है। इसमें खेती करेंगे। 233 गांव अबूझमाड़ में, और इससे सटे क्षेत्र में 100 और गांव हैं। इनमें से नारायणपुर जिले में ही 207 गांव आते हैं। इसके साथ इस सीमा से लगे क्षेत्र में भी 80 गांव हैं। इन सभी में कहीं ज्यादा, कहीं कम पेड़ कट रहे हैं। आदिवासी सिर्फ इतना कहते हैं- जमीन हमारी है। 30 साल से रह रहे हैं। जंगल में भीतरी और बाहरी लोग शामिल हैं जमीन के खेल में पीसीसीएफ अरुण पांडेय ने कहा कि अबूझमाड़ का प्रशासकीय नियंत्रण लेने के लिए नए परिक्षेत्र के गठन का प्रस्ताव शासन को भेजा है। 2600 वर्ग किमी का अतिरिक्त वन क्षेत्र नारायणपुर वन मंडल से जुड़ जाएगा। पेड़ों की कटाई रोकने के लिए 30 जगहों पर स्थानीय युवकों को नियुक्त किया गया है। ………………….. इससे जुड़ी यह खबर भी पढ़िए… 30-40km पैदल चलकर महाराष्ट्र से लाते थे नमक-तेल:रात जंगल में गुजारते थे, अबूझमाड़ में पहली बार लगा बाजार;5 हजार लोग सामान लेने पहुंच रहे कभी नमक, तेल और राशन खरीदने के लिए अबूझमाड़ के ग्रामीणों को 30 से 40 किलोमीटर तक पैदल चलना पड़ता था। संकरी पगडंडियों, ऊंची पहाड़ियों और घने जंगलों को पार कर वे पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले के भामरागढ़ पहुंचते थे। सुबह अंधेरा रहते घर से निकलने वाले ग्रामीण देर रात लौटते थे। कई बार जंगल में ही रात बितानी पड़ती थी। पढ़ें पूरी खबर…

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