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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस:पुरुष प्रधान खेलों में बेटियों की भागीदारी 300% तक बढ़ी, अब कोई नहीं कहता- ‘यह खेल तो लड़कों का है’

वक्त के साथ खेल का मैदान और माहौल दोनों बदल गए हैं। 10 साल पहले तक कुश्ती, फेंसिंग, बॉक्सिंग और कराते जैसे खेलों में लड़कों का ही दबदबा था। इनमें लड़कियों की संख्या लड़कों के मुकाबले आधी या उससे भी कम हुआ करती थी। कोई बच्ची इनकी ट्रेनिंग भी लेना चाहती तो लोग कहते थे- ये तो लड़कों के खेल हैं। लेकिन अब तस्वीर बदल गई है। टीटी नगर स्टेडियम के आंकड़े देखें तो 2015 में जिन खेलों में लड़कों का वर्चस्व था, 2025 में उनमें लड़कियों की भागीदारी 100 से 300% तक बढ़ी है। फेंसिंग में लड़कियों की संख्या, जो पहले आधे से भी कम थी, अब बराबरी पर आ गई है। बॉक्सिंग में लड़कियों की भागीदारी चार गुना हो गई है। टीटी नगर स्टेडियम के 10 साल के आंकड़ों का एनालिसिस… जूडो में तो अब लड़कियों की संख्या लड़कों से भी ज्यादा
इसलिए बढ़ी बेटियों की भागीदारी
टीटी नगर स्टेडियम में फेंसिंग कोच युक्ति शर्मा और जूडो कोच गोविंद रजक बताते हैं कि पिछले कुछ साल से ट्रेंड में बड़ा बदलाव आया है। लड़कियां सेल्फ डिपेंड होना चाहती हैं इसलिए जरूरी है कि वे मजबूत भी हों। वे ऐसे खेलों का चयन कर रही हैं जो सेल्फ डिफेंस से जुड़े हैं। खूब मेडल भी ला रही हैं… यह एक सकारात्मक बदलाव है। पहले जिन खेलों में लड़कों का दबदबा रहता था, उसमें न केवल लड़कियों की भागीदारी बढ़ी है, बल्कि खूब मेडल ला रही हैं। -बीएस यादव, ज्वाइंट डायरेक्टर, खेल विभाग

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