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अंगदान के इंतजार में 2 दिन पड़ी रही ब्रेनडेड बॉडी:एम्स-जीएमसी की लड़ाई में बर्बाद हुए अंग; ‘ईगो’ ने छीनी 6 मरीजों की उम्मीद

भोपाल के ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस (एम्स) के आईसीयू में 26 साल का एक युवक जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहा था। डॉक्टरों की टीम उसे ब्रेनडेड घोषित कर चुकी थी। परिजन ने उसके अंगदान की सहमति दे दी। इससे छह मरीजों को जीवनदान मिलने की उम्मीद थी। एम्स की टीम अंगदान की प्रक्रिया पूरी करने के लिए तैयार थी। उसे भोपाल के गांधी मेडिकल कॉलेज (जीएमसी) की ऑर्गन ट्रांसप्लांट कमेटी की मंजूरी का इंतजार था, ताकि युवक के अंग निकाले जा सकें और जरूरतमंद मरीजों तक पहुंचाए जा सकें, लेकिन एम्स और जीएमसी के बीच समन्वय, प्रक्रिया और मंजूरी को लेकर ऐसा विवाद खड़ा हुआ कि दो दिन तक अंगदान की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी। एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप आखिरकार इंतजार से परेशान और पूरी प्रक्रिया से आहत परिजन ने अंगदान की सहमति वापस ले ली। युवक का अंतिम संस्कार कर दिया गया, यानी जिन अंगों से छह मरीजों को नई जिंदगी मिल सकती थी, वे दान नहीं हो सके। अब इस मामले में एम्स और जीएमसी एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। एम्स के वरिष्ठ डॉक्टरों ने अंगदान की प्रक्रिया की निगरानी करने वाली राष्ट्रीय संस्था नेशनल ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गनाइजेशन (NOTTO) और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय से शिकायत की है। वहीं जीएमसी का दावा है कि प्रक्रिया में हुई गड़बड़ी के लिए एम्स जिम्मेदार है। पूरे विवाद को सिलसिलेवार समझिए… विवाद की शुरुआत 26 साल के सुनील से होती है। 30 जून 2026 को सड़क हादसे के बाद उसे गंभीर हालत में भोपाल एम्स लाया गया। न्यूरोसर्जरी टीम ने इलाज की पूरी कोशिश की, लेकिन सिर में गंभीर चोटों के कारण उसका बचना संभव नहीं था। डॉक्टरों ने परिवार को बताया कि सुनील ‘ब्रेन स्टेम डेथ’ (ब्रेनडेड) की स्थिति में है। इस अवस्था में मस्तिष्क की गतिविधियां स्थायी रूप से बंद हो जाती हैं, जबकि मशीनों की मदद से कुछ समय तक शरीर के अंगों को काम करते रखा जा सकता है। सुनील के जीजा महेंद्र ने बताया- डॉक्टरों ने हमें अंगदान की सलाह दी। पहला एप्निया टेस्ट और वॉट्सएप ग्रुप पर शुरू हुआ विवाद एम्स की ओर से NOTTO को भेजे गए शिकायती पत्र के मुताबिक, परिवार की सहमति मिलने के बाद तुरंत ब्रेन स्टेम डेथ असेसमेंट कमेटी का गठन किया गया। पहला ब्रेन स्टेम डेथ असेसमेंट और एप्निया टेस्ट भी पूरा हो गया। इसके बाद एम्स ने स्टेट ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गनाइजेशन (SOTTO) और संबंधित अधिकारियों को फोन और ई-मेल के जरिए इसकी सूचना दी। यहीं से विवाद शुरू हुआ। एम्स का कहना है कि उस समय ऐसा कोई लिखित आदेश या सर्कुलर नहीं था, जिसमें परिवार की सहमति से पहले संभावित ब्रेनडेड मरीज की सूचना SOTTO को देना अनिवार्य किया गया हो। एम्स के मुताबिक, उसने स्थापित कानूनी गाइडलाइंस के तहत ही काम किया था। इसके बावजूद भोपाल ऑर्गन ट्रांसप्लांट कमेटी ने प्रक्रिया पर आपत्ति जताई। विवाद का सबसे तीखा पक्ष भोपाल ट्रांसप्लांट कमेटी के ऑफिशियल वॉट्सएप ग्रुप की चैट में सामने आया एम्स की सफाई- मरीज को स्थिर करना हमारी प्राथमिकता थी कमेटी के रुख के बाद एम्स के डॉ. योगेश निवारिया ने ग्रुप पर माफी मांगते हुए लिखा कि जानकारी देने में देरी इसलिए हुई, क्योंकि उनकी टीम डोनर के वाइटल्स स्थिर करने और परिजन की काउंसलिंग में व्यस्त थी। उन्होंने इसे अनजाने में हुई देरी बताते हुए कहा कि उस समय डोनर को स्थिर करना और उसके अंगों को सुरक्षित रखना उनकी प्राथमिकता थी। डॉ. निवारिया ने लिखा- मध्य प्रदेश में अंगदान पहले ही बहुत दुर्लभ है। देश और प्रदेश में सैकड़ों मरीज अंगों के इंतजार में दम तोड़ रहे हैं। कृपया इन अंगों को बर्बाद न होने दें। इसके बाद कमेटी ने एम्स से ऑफिशियल ई-मेल पर माफीनामा मांगा। एम्स ने ई-मेल भेजा और अनुमति मिल गई, लेकिन इसके साथ कमेटी ने शर्त रखी कि ब्रेन स्टेम डेथ की पूरी प्रक्रिया दोबारा शुरू की जाए। दोबारा प्रक्रिया के बीच बिगड़ी डोनर की हालत, टूटा परिवार का भरोसा एम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, पहले एप्निया टेस्ट के करीब 7 घंटे बाद दूसरा टेस्ट पूरा हो चुका था। इसके बावजूद प्रक्रिया नए सिरे से शुरू करने को कहा गया। एम्स की टीम ने आशंका जताई कि देरी से डोनर के अंगों की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है। इस दौरान सुनील की मेटाबॉलिक और हेमोडायनामिक स्थिति लगातार बिगड़ती गई। हालत इतनी खराब हुई कि दोबारा एप्निया टेस्ट करना मेडिकल रूप से संभव नहीं रहा। उधर, सुनील का परिवार दो दिन से अस्पताल की गैलरी में इस उम्मीद में इंतजार कर रहा था कि अंगदान की प्रक्रिया पूरी होने के बाद शव उन्हें सौंप दिया जाएगा। सुनील के जीजा महेंद्र ने बताया- हमें कहा गया था कि अगले दिन दोपहर 2 बजे तक प्रक्रिया पूरी हो जाएगी। हम इंतजार करते रहे। रात 11 बजे हमें बताया गया कि टीम आने में देरी हो रही है। एक दिन और लगेगा। अगले दिन भी शाम 5:30 बजे तक प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ी। हमने अनुमति वापस ले ली। कमेटी की दलील- पहले भी एम्स की देरी से एक अंग का इस्तेमाल नहीं हो पाया था भोपाल ट्रांसप्लांट कमेटी के असिस्टेंट नोडल ऑफिसर डॉ. नवीन कुमार पटबमनिया के मुताबिक, गलती एम्स की थी। उन्होंने कहा- पहले हुई एक बैठक में एम्स की टीम भी शामिल थी। इसमें तय हुआ था कि संदिग्ध मरीज की जानकारी एप्निया टेस्ट से पहले दी जाए, ताकि अंगों के आवंटन के लिए पर्याप्त समय मिल सके। करीब दो महीने पहले भी एम्स की देरी के कारण एक अंग का इस्तेमाल नहीं हो पाया था। इसलिए इस बार लिखित माफीनामा मांगा गया और प्रक्रिया दोबारा करने को कहा गया। कमेटी की नोडल ऑफिसर डॉ. कविता कुमार ने कहा कि एम्स ने कमेटी के नियमों का गलत अर्थ निकालकर शिकायत की। वहीं, एम्स भोपाल के मेडिकल सुपरिंटेंडेंट डॉ. विकास गुप्ता ने कहा कि एम्स ने कोई शिकायत नहीं की, बल्कि NOTTO को तथ्यात्मक रिपोर्ट भेजी है। आरोप- कुछ लोग नहीं चाहते कि एम्स में सालाना 25 ट्रांसप्लांट हों एम्स के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम नहीं छापने की शर्त पर आरोप लगाया कि इस विवाद के पीछे निजी अस्पतालों और ट्रांसप्लांट इंडस्ट्री के बड़े खिलाड़ी सक्रिय हैं। अधिकारी के मुताबिक, वे नहीं चाहते कि एम्स भोपाल में सालाना 25 से अधिक ट्रांसप्लांट हों, अगर एम्स यह आंकड़ा छू लेता है तो उसे एप्रोप्रिएट अथॉरिटी का दर्जा मिल जाएगा। इसके बाद ट्रांसप्लांट के लिए किसी बाहरी कमेटी की अनुमति की जरूरत नहीं होगी। एम्स में आयुष्मान योजना के तहत किडनी ट्रांसप्लांट मुफ्त होता है, जबकि निजी अस्पतालों में इसका खर्च 30 लाख रुपए से अधिक है, अगर एम्स आत्मनिर्भर हो गया तो निजी अस्पतालों का कारोबार प्रभावित होगा।

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