3 साल में 342 शिकायतें, कड़े निर्देश दिए तो 9 माह में दर्ज हो गए 351 नए मामले, मप्र में वसूली एजेंटों का गुंडाराज कर्ज लिया, किस्त चूकी और फिर शुरू हुआ धमकी भरे फोन कॉल्स, रात-बेरात दरवाजे पर दस्तक और गाली-गलौज का सिलसिला। मध्यप्रदेश में लाखों कर्जदारों का यह दर्द अब सिर्फ जुबानी नहीं, बल्कि सरकारी आंकड़ों में भी दर्ज हो चुका है। सूचना के अधिकार के तहत रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) से मिले जवाब ने चौंकाने वाली तस्वीर साफ की है। प्रदेश में बैंकों और उनकी वसूली एजेंसियों के उत्पीड़न को लेकर शिकायतें बीते तीन सालों में चार गुना (400%) तक बढ़ गई हैं। आबादी 6%, लेकिन शिकायतें सिर्फ 1%; क्योंकि मप्र में जागरूकता की कमी संसद में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025-26 में देशभर से वसूली एजेंसियों के खिलाफ कुल 18,021 शिकायतें आईं। इनमें मध्यप्रदेश की हिस्सेदारी महज 195 (करीब 1%) रही। जबकि देश की कुल आबादी में मप्र का हिस्सा लगभग 6% है। आबादी के अनुपात में शिकायतों की यह बेहद कम संख्या बताती है कि मप्र में पीड़ित या तो अपने अधिकारों से पूरी तरह अंजान हैं, या फिर एजेंटों के डर से ऑम्बड्समैन तक जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाते।
शिकायत दर्ज कराने के तीन आसान तरीके आरबीआई के आदेश की भी परवाह नहीं रिकवरी एजेंटों की मनमानी रोकने के लिए आरबीआई ने 28 नवंबर 2025 को सख्त गाइडलाइन जारी की थी। बैंकों को स्पष्ट निर्देश थे कि वे किसी भी सूरत में गैर-कानूनी प्रताड़ना का सहारा न लें और कर्जदार को उचित नोटिस दें। लेकिन मप्र में दिसंबर 2025 से मार्च 2026 के बीच जारी आदेश के तुरंत बाद ही धमकी भरे कॉल और तय नियम न मानने की 71 शिकायतें आ गईं। अप्रैल से अगस्त 2026 के बीच यानी अगले 5 महीनों में प्रताड़ना की 280 और शिकायतें जुड़ गईं। नतीजा यह हुआ कि आरबीआई की सख्ती के बावजूद बीते 9 महीनों में मप्र से 351 मामले दर्ज हुए। पीड़ित हैं तो डरें नहीं, ऐसे सिखाएं सबक सबसे पहले संबंधित बैंक के शिकायत निवारण अधिकारी से लिखित शिकायत दर्ज कराएं। {यदि 30 दिनों के भीतर बैंक आपकी समस्या का हल नहीं निकालता है, तो सीधे आरबीआई- इंटीग्रेटेड ऑम्बड्समैन योजना (2021) का दरवाजा खटखटाएं।
