मध्य प्रदेश में पहली बार बिना तार वाला ड्युअल-चैंबर पेसमेकर (Leadless Dual-Chamber Permanent Pacemaker) का सफल इंदौर में एक 88 वर्षीय बुजुर्ग में किया गया। खास बात यह कि मरीज को जिस दिन इम्प्लांट हुआ उसी दिन डिस्चार्ज भी कर दिया गया। अब वे पूरी तरह से ठीक है। यह इम्प्लांट 20 अगस्त को किया गया है। पहले जानिए क्या है Leadless Pacemaker? पारंपरिक पेसमेकर में छाती के नीचे एक डिवाइस लगाई जाती है और उसे हार्ट से जोड़ने के लिए तार यानी लीड्स डाली जाती हैं। वहीं, लीडलेस पेसमेकर में इन तारों और छाती में पेसमेकर के लिए अलग पॉकेट बनाने की जरूरत नहीं होती। छोटा पेसमेकर सीधे हार्ट में इम्प्लांट किया जाता है। इसमें ड्युअल तकनीक हार्ट के ऊपरी और निचले कक्षों के बीच बेहतर तालमेल बनाए रखने में मदद करती है। इससे हार्ट की प्राकृतिक धड़कन के अनुरूप पेसिंग करने में मदद मिलती है। कमजोर दिल की पंपिंग वाले मरीजों के लिए भी अहम यह प्रक्रिया डॉ. मयंक जैन और डॉ. नागेंद्र चौहान (सुयश हॉस्पिटल) नेपूरी की। इस तकनीक को प्रदेश में अत्याधुनिक कार्डियक केयर की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि है। डॉ. गोविंद मालपानी (डायरेक्टर) के अनुसार, पेसमेकर तकनीक उन मरीजों में भी उपयोगी हो सकती है, जिनकी हार्ट की पंपिंग क्षमता यानी Ejection Fraction (EF) कमजोर है और जिन्हें आगे चलकर हार्ट फेलियर का जोखिम रहता है। उपयुक्त मरीजों में पेसिंग से हृदय की कार्यक्षमता और जीवन की गुणवत्ता बेहतर करने में मदद मिल सकती है। उन्होंने बताया कि इस तरह की प्रक्रिया का एक फायदा यह भी है कि मरीज को लंबे समय तक अस्पताल में रखने की जरूरत कम हो सकती है और कई मामलों में उसी दिन डिस्चार्ज किया जा सकता है। 16.50 लाख रुपए की लागत वाला पेसमेकर डॉ. जैन के मुताबिक इंदौर के इस मरीज को काफी समय से हार्ट में तकलीफ थी। उनकी सांसें फुल जाती थी। इसके बाद सारी जांचों के बाद उन्हें सलाह दी तो वे सहमत हुए। उन्हें जो बिना तार वाला ड्युअल-चैंबर पेसमेकर इम्प्लांट किया गया है उसकी कीमत करीब 16.50 लाख रुपए है। वे 20 को ही डिस्चार्ज किए गए और खुद चलते हुए गए। डॉ. मालपानी ने बताया कि आधुनिक पेसमेकर का इस्तेमाल केवल हार्ट की धड़कन को नियंत्रित करने तक सीमित नहीं है। कुछ मरीजों में इसका उद्देश्य हृदय की पंपिंग और कार्यक्षमता को बेहतर करना भी होता है। हालांकि, किस मरीज के लिए कौन-सी पेसमेकर तकनीक उपयुक्त है, यह उसकी हार्ट की स्थिति और अन्य चिकित्सकीय परिस्थितियों के आधार पर एक्सपर्ट्स तय करते हैं। प्रक्रिया के बाद जटिलताओं का जोखिम बेहद कम: डॉ. मनीष जैन डॉ. मनीष जैन ने बताया कि आधुनिक तकनीक और निर्धारित चिकित्सा प्रोटोकॉल के साथ इस तरह की प्रक्रिया के बाद गंभीर जटिलताओं की संभावना बेहद कम रहती है। मरीज की स्थिति के अनुसार इलाज की योजना बनाई जाती है और प्रक्रिया के दौरान व बाद में उसकी निगरानी की जाती है। उन्होंने कहा कि किसी भी चिकित्सा प्रक्रिया में कुछ जोखिम हो सकते हैं, लेकिन एक्सपर्ट्स की निगरानी, उचित सावधानियों और प्रोटोकॉल का पालन करने से इन्हें काफी हद तक कम किया जा सकता है। Dual-Chamber तकनीक हार्ट के दोनों प्रमुख चेंबरों में बनाती है संतुलन
