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इस साल मानसून कमजोर रहेगा, अल नीनो का असर:करीब 80 सेमी बारिश का अनुमान, सीजन के आखिर में थोड़ी राहत मिल सकती है

भारत मौसम विभाग के मुताबिक, इस साल बारिश सामान्य से कम रहने का अनुमान है। वहीं दक्षिण-पश्चिम मानसून 1 जून के आसपास केरल तट पर पहुंच सकता है। इसके बाद यह आगे बढ़ते हुए भोपाल सहित मध्य भारत में 15 से 20 जून के बीच दस्तक देगा। पिछले साल मानसून तय समय से 8 दिन पहले यानी 24 मई को ही केरल पहुंच गया था। मानसून केरल से आगे बढ़ते हुए महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में आमतौर पर मध्य जून तक पहुंचता है। 11 जून तक मुंबई और 8 जुलाई तक पूरे देश में फैल जाता है। इसकी वापसी उत्तर-पश्चिम भारत से 17 सितंबर को शुरू होती है और यह पूरी तरह 15 अक्टूबर तक लौट जाता है। अल नीनो इफेक्ट की वजह से मानसून में देरी हो सकती है। हालांकि सीजन के आखिर में थोड़ी राहत मिल सकती है। इस साल कम बारिश का अनुमान मौसम विभाग के मुताबिक, इस बार देश में मानसून सीजन के दौरान करीब 80 सेंटीमीटर बारिश होने का अनुमान है, जबकि 1971-2020 के आंकड़ों के आधार पर लॉन्ग पीरियड एवरेज 87 सेंटीमीटर है। IMD के डिप्टी डायरेक्टर जनरल डॉ. एम. मोहापात्रा प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि इस साल देश में कुल बारिश लॉन्ग पीरियड एवरे का करीब 92% रहने का अनुमान है, जिसे सामान्य से कम कैटेगरी में रखा गया है। क्या होता है लॉन्ग पीरियड एवरेज मौसम विभाग ने 1971-2020 की अवधि के आधार पर दक्षिण-पश्चिम मानसून के लिए लॉन्ग पीरियड एवरेज (LPA) को 87 सेमी (870 मिमी) निर्धारित किया है। इसका मतलब है कि अगर किसी साल की बारिश 87 सेमी से ज्यादा होती है, तो उसे सामान्य से अधिक माना जाता है। अगर कम हो तो कमजोर मानसून माना जाता है। अल नीनो से मानसून में हल्की देरी संभव मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक, जून के आसपास अल नीनो की स्थिति विकसित हो सकती है। यह आमतौर पर भारत में मानसून को कमजोर करता है, जिससे बारिश में कमी और ब्रेक की स्थिति बन सकती है। हालांकि, सीजन के आखिर (सितंबर) में इंडियन ओशन डाइपोल (IOD) के पॉजिटिव फेज में आने की संभावना है। यह स्थिति आमतौर पर बारिश को बढ़ाती है, जिससे अल नीनो के असर की कुछ भरपाई हो सकती है। अल नीनो और ला नीना क्लाइमेट (जलवायु) के दो पैटर्न होते हैं- अल नीनो: इसमें समुद्र का तापमान 3 से 4 डिग्री बढ़ जाता है। इसका प्रभाव 10 साल में दो बार होता है। इसके प्रभाव से ज्यादा बारिश वाले क्षेत्र में कम और कम बारिश वाले क्षेत्र में ज्यादा बारिश होती है। ला नीना: इसमें समुद्र का पानी तेजी से ठंडा होता है। इसका दुनियाभर के मौसम पर असर पड़ता है। आसमान में बादल छाते हैं और अच्छी बारिश होती है। 1972 में सबसे देरी से केरल पहुंचा था मानसून IMD के आंकड़ों के मुताबिक, बीते 150 साल में मानसून के केरल पहुंचने की तारीखें अलग-अलग रही हैं। 1918 में मानसून सबसे पहले 11 मई को केरल पहुंच गया था, जबकि 1972 में सबसे देरी से 18 जून को केरल पहुंचा था।

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