सरकारी नौकरी में दो-बच्चों की पाबंदी हटने जा रही है। सामान्य प्रशासन विभाग ने प्रस्ताव तैयार कर लिया है और इस पर सहमति बन गई है। इसे जल्द ही कैबिनेट में रखा जाएगा। इसके बाद तीसरी संतान होने पर किसी कर्मचारी को बर्खास्त नहीं किया जा सकेगा। सूत्रों के अनुसार मुख्यमंत्री ने प्रस्ताव को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है। यह प्रतिबंध 2001 में दिग्विजय सिंह सरकार ने सिविल सेवा नियम, 1961 में संशोधन कर लागू किया था। नियम बदलने से करीब 30 हजार ऐसे टीचर्स को राहत मिलेगी जिनके दो से ज्यादा बच्चे हैं। अब नियम बदलने से और किसे फायदा होगा, किन विभागों को राहत और लंबित मामलों का क्या होगा? पढ़िए पूरी रिपोर्ट… क्यों किया जा रहा नियम में बदलाव? पिछले कुछ वर्षों में इस नियम की प्रासंगिकता पर सवाल उठे और इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता के खिलाफ माना गया। हाल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत के तीन बच्चों पर जोर देने के बाद बदलाव की प्रक्रिया तेज हुई। 18 फरवरी को लखनऊ में मोहन भागवत ने घटती जनसंख्या पर चिंता जताते हुए कहा कि तीन बच्चों का औसत समाज के अस्तित्व के लिए जरूरी है। जिस समाज में परिवार में तीन बच्चे नहीं होते, वो भविष्य में खत्म हो जाता है। उन्होंने भारत की 2.1 प्रजनन दर का हवाला देते इसे वैज्ञानिक तरीके से समझाया। 5 पॉइंट्स में समझिए फैसले का असर स्कूल शिक्षा, उच्च शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे विभागों में फैसले का स्वागत हो रहा है। यहां 8-10 हजार मामले लंबित थे। नियम की कठोरता का अंदाजा इस बात से है कि एक न्यायाधीश को भी नौकरी गंवानी पड़ी थी। राजस्थान और छत्तीसगढ़ पहले ही हटा चुके हैं पाबंदी
मध्य प्रदेश पहला राज्य नहीं है। राजस्थान की वसुंधरा राजे सरकार ने 11 मई 2016 और छत्तीसगढ़ की रमन सिंह सरकार ने 14 जुलाई 2017 को यह पाबंदी हटा दी थी। इन राज्यों में तीन बच्चों वाले कर्मचारी बिना बाधा नौकरी कर रहे हैं। आंध्र प्रदेश ने तीसरे बच्चे पर 25,000 रुपये प्रोत्साहन की घोषणा की है। दो केस से समझिए मासूमों पर भारी नौकरी जाने का डर
केस 1: चौथा बच्चा हुआ तो जिंदा दफना दिया
ये मामला पिछले साल 30 सितंबर का है। छिंदवाड़ा के नांदनवाड़ी प्रायमरी स्कूल के टीचर बबलू डांडोलिया के पहले से तीन बच्चे थे। नौकरी जाने के डर से बबलू ने पत्नी राजकुमारी के गर्भवती होने की जानकारी छिपाई। 23 सितंबर को रात करीब 3 बजे घर पर ही बच्चे का जन्म हुआ। इसके बाद दोनों नवजात को नांदनवाड़ी गांव के जंगल ले गए। यहां उन्होंने बच्चे लावारिस छोड़ा और उसे पत्थरों से दबा दिया। दूसरे दिन ग्रामीण जब जंगल की तरफ गए, तो उन्हें बच्चे के रोने की आवाज सुनाई दी। पत्थर हटाकर देखा तो मासूम जिंदा था। रातभर ठंड में पड़े होने और चीटिंयों के काटने की वजह से उसे इन्फेक्शन हो गया था। ग्रामीण उसे अस्पताल ले गए थे। केस 2: बेटी का समग्र आईडी में नाम ही नहीं जोड़ा
ये मामला भी छिंदवाड़ा का ही है। हर्रई ब्लॉक के आश्रम में पदस्थ अधीक्षक कैलाश सूर्यवंशी ने पहली पत्नी को तलाक देने के बाद छिंदवाड़ा की रहने वाली सुषमा से दूसरी शादी की थी। पहली पत्नी से उनके दो बच्चे हैं, जबकि दूसरी पत्नी से एक बेटी है। दो बच्चों के सरकारी नियम के चलते कैलाश ने दूसरी पत्नी की बेटी का नाम सरकारी रिकॉर्ड (समग्र आईडी) में नहीं जुड़वाया। इसके चलते बेटी की पढ़ाई रूक गई। जब पत्नी ने पति पर नाम जोड़ने के लिए दबाव बनाया तो वह वापस पहली पत्नी के पास चला गया। सुषमा ने इसकी शिकायत जनसुनवाई में की थी।
