भोपाल से महज 35 किमी दूर एक ऐसा मौसम अनुसंधान केंद्र है, जहां बादल सिर्फ देखे नहीं जाते, बल्कि उनकी चाल, ताकत और बारिश की हर बूंद को मापा जाता है। सीहोर जिले के शीलखेड़ा गांव के पास 100 एकड़ में बने एटमॉस्फेरिक रिसर्च टेस्ट बेड में वायुमंडल की सतह से लेकर 30 किमी ऊंचाई तक का डेटा लिया जा रहा है। यही डेटा तय करेगा कि कब आंधी आएगी, कहां ओले गिरेंगे और मानसून कितना मजबूत होगा। मौसम विभाग के अरेरा हिल्स कंट्रोल रूम से यह जानकारी सीधे पूर्वानुमान में जाती है, जिससे मध्यप्रदेश में चेतावनी पहले से ज्यादा सटीक हो सकती है। ये हाईटेक परिसर अब मध्य भारत के मौसम की नई दिशा तय करेगा। जानिए… रडार बादलों के और बैलून ऊपरी वायुमंडल के पैरामीटर मापता है मध्य भारत संवेदनशील… इसलिए यहां रिसर्च इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मेट्रोलॉजी (आईआईटीएम) का एटमॉस्फेरिक रिसर्च टेस्ट बेड (एआरटीबी) ऐसा वैज्ञानिक केंद्र है, जो माइक्रो लेवल डेटा का विश्लेषण करता है। वैज्ञानिकों के अनुसार मध्य भारत मानसून के लिहाज से सबसे संवेदनशील है। यहां अरब सागर और बंगाल की खाड़ी दोनों का असर होने से बारिश का पैटर्न तेजी से बदलता है। इसी कारण आईआईटीएम ने शीलखेड़ा को रिसर्च साइट चुना। अरेरा हिल्स का कंट्रोल रूम… यहीं से जारी होता है अलर्ट अरेरा हिल्स स्थित भारत मौसम विभाग का क्षेत्रीय केंद्र शहर और आसपास के जिलों के लिए मुख्य पूर्वानुमान इकाई है। यहां लगा डॉप्लर वैदर रडार लगभग 250–300 किमी तक बादलों की गतिविधि ट्रैक करता है। आम लोगों को क्या फायदा होगा यहां का डेटा राष्ट्रीय और वैश्विक मौसम मॉडल में भी उपयोग हो रहा है। मौसम विशेषज्ञ डॉ. जीडी मिश्रा के अनुसार, इससे देश के पूर्वानुमान की सटीकता बढ़ेगी।
