सुप्रीम कोर्ट ने 15 जून 2026 को मध्य प्रदेश सरकार की 25 अगस्त 2011 की अधिसूचना को रद्द कर दिया। इस अधिसूचना के जरिए लोकायुक्त के स्पेशल पुलिस एस्टैब्लिशमेंट (SPE) को सूचना के अधिकार (RTI) कानून के दायरे से बाहर रखा गया था। कोर्ट ने कहा कि SPE कोई खुफिया या सुरक्षा संगठन नहीं है, इसलिए इसे RTI से छूट नहीं दी जा सकती। यह अधिसूचना कानून के विपरीत और ज्यादा पाई गई। एसपीई को इंटेलिजेंस या सिक्योरिटी संगठन नहीं माना जा सकता जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी और जस्टिस अतुल एस. चंदूरकर की बेंच ने फैसला सुनाया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लोकायुक्त और उप-लोकायुक्त भ्रष्टाचार और लोक सेवकों से जुड़े मामलों की जांच करते हैं। SPE इन्हीं मामलों में सहायता करता है। 1981 के मध्य प्रदेश लोकायुक्त कानून के तहत उन्हें खुफिया या सुरक्षा संबंधी जांच का अधिकार नहीं है। इसलिए SPE को इंटेलिजेंस या सिक्योरिटी संगठन नहीं माना जा सकता। राज्य सरकार Section 24(4) RTI Act के तहत छूट दे सकती है, लेकिन केवल वास्तविक इंटेलिजेंस/सिक्योरिटी संगठनों को। SPE उस श्रेणी में नहीं आता। SPE ने हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की यह पूरा मामला कामता प्रसाद मिश्रा, एक पुलिस इंस्पेक्टर से शुरू हुआ। उन पर रिश्वत लेते हुए पकड़े जाने का आरोप था। SPE ने प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट की धाराओं के तहत केस दर्ज किया। जांच के बाद मिश्रा ने RTI के तहत कुछ दस्तावेज मांगे, जैसे सेंक्शन से संबंधित फाइल, नोटिंग्स और पत्राचार। SPE ने 2011 की अधिसूचना का हवाला देकर जानकारी देने से इनकार कर दिया। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने दिसंबर 2021 में SPE के रिजेक्शन ऑर्डर रद्द कर दिए और जानकारी देने का निर्देश दिया। इसके बाद SPE ने हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की। अधिसूचना की वैधता पर कोर्ट का विश्लेषण 25 अगस्त 2011 की अधिसूचना को Section 24(4) of RTI Act के तहत जारी किया गया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे कानून के विपरीत पाया। कोर्ट ने suo motu अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते हुए इस अधिसूचना की वैधता की जांच की। राज्य सरकार को पूरा अवसर दिया गया, लेकिन यह साबित नहीं हो सका कि SPE कोई इंटेलिजेंस या सिक्योरिटी संगठन है। इसलिए अधिसूचना को रद्द कर दिया गया। SPE का कार्यक्षेत्र और सीमाएं SPE का गठन मध्य प्रदेश स्पेशल पुलिस इस्टेबलिशमेंट एक्ट 1947 के तहत हुआ है। विभिन्न अधिसूचनाओं (1959, 1989, 2000, 2001) के माध्यम से इसका दायरा केवल लोक सेवकों द्वारा किए गए भ्रष्टाचार, विश्वास भंग करने और धोखाधड़ी के मामलों तक ही सीमित रखा गया है। यह संगठन किसी भी प्रकार के खुफिया संग्रह, आंतरिक सुरक्षा या सीमा सुरक्षा जैसे कामों में शामिल नहीं है, जो सेकंड शेड्यूल में उल्लिखित केंद्रीय संगठनों (जैसे BSF, CRPF, NIA आदि) के कामों से अलग है। फैसले से यह होगा प्रभाव कोर्ट ने माना कि RTI एक्ट की Section 24(4) केवल वास्तविक इंटलिजेंस एंड सिक्योरिटी ऑर्गेनाइजेशंस को छूट देती है। SPE को इस श्रेणी में रखना एक्सेसिव और कानून के खिलाफ है। इसलिए हाई कोर्ट का आदेश बरकरार रखा गया और कामता प्रसाद मिश्रा को मांगी गई जानकारी (सेंक्शन प्रक्रिया संबंधी दस्तावेज) उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया। यह फैसला RTI कानून के तहत पारदर्शिता को मजबूत करता है। ये है मामला कामता प्रसाद मिश्रा, जो कटनी के माधव नगर थाने में टीआई थे, पर 11 अप्रैल 2017 को ट्रैप केस में FIR दर्ज हुई। 20 मई 2020 को अभियोजन स्वीकृति मिली। उन्होंने 1 जुलाई 2020 को RTI आवेदन दायर किया, जिसे SPE ने 2011 की अधिसूचना के आधार पर अस्वीकार कर दिया। राज्य सूचना आयोग ने भी याचिका खारिज की, लेकिन मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने दिसंबर 2021 में SPE के आदेश रद्द कर जानकारी उपलब्ध कराने का निर्देश दिया। SPE ने सुप्रीम कोर्ट में क्रिमिनल अपील दायर की, जिसमें यह फैसला 15 जून 2026 को सुनाया गया।
