भोपाल में कलेक्टर गाइडलाइन की जियो-टैगिंग व्यवस्था में बड़ी तकनीकी गड़बड़ी सामने आई है। इसके चलते एक ही कॉलोनी, एक ही सड़क और कई मामलों में एक ही प्रॉपर्टी दो अलग-अलग वार्डों में दर्ज हो रही है। इसका सीधा असर यह है कि एक ही जगह की जमीन के दो अलग-अलग रेट तय हो रहे हैं- कहीं कम, कहीं कई गुना ज्यादा। दैनिक भास्कर पड़ताल में सामने आया है कि इस सिस्टम की कमजोरी का फायदा उठाकर कम रेट वाली लोकेशन सिलेक्ट कर ज्यादा रेट वाले इलाके की रजिस्ट्री कराई जा रही है। यह गड़बड़ी किसी एक इलाके तक सीमित नहीं है, बल्कि भोपाल की 800 से ज्यादा लोकेशनों पर पाई गई है। नाम न छापने की शर्त पर पंजीयन विभाग के अफसरों ने यह जानकारी दी। हालांकि आईजी पंजीयन अमित तोमर ने कॉल रिसीव नहीं किया। सेमरा-चांदबड़ : सिर्फ वार्ड बदलने से हर वर्ग फीट पर ~500 का फर्क गड़बड़ी कैसे हुई: परिसीमन और जियो-टैगिंग की दोहरी चूक सूत्रों के मुताबिक, इस तकनीकी गड़बड़ी के पीछे दो बड़े कारण हैं। पहला- 2014 में नगर निगम द्वारा किए गए वार्ड परिसीमन के बाद सीमाओं को डिजिटल नक्शों में सटीक रूप से अपडेट नहीं किया गया। दूसरा- पिछले साल जब संपदा-2 सिस्टम के लिए कलेक्टर गाइडलाइन की जियो-टैगिंग को नगर निगम के नक्शों से जोड़ा गया, तो कई लोकेशन वार्ड बाउंड्री के पार चली गईं। इस वजह से जियो-टैगिंग सिस्टम में एक ही लोकेशन के लिए दो अलग-अलग वार्ड और दो अलग-अलग रेट खुलने लगे। इससे रजिस्ट्री प्रक्रिया की पारदर्शिता पर ही सवाल खड़े हो गए हैं। कम रेट चुनकर महंगी रजिस्ट्री, लेकिन यह बड़ा खतरा जब सिस्टम में एक ही लोकेशन के लिए दो रेट दिखते हैं, तो लोग कम रेट वाली लोकेशन को सिलेक्ट करते हैं और आसपास की महंगे लोकेशन की रजिस्ट्री करा लेते हैं। इससे सरकार को कम स्टांप ड्यूटी मिलती है, यानी राजस्व नुकसान की आशंका है। खरीदार को तात्कालिक फायदा जरूर होता है, लेकिन जोखिम ज्यादा है। रजिस्ट्री से पहले वार्ड और रेट की गड़बड़ी ऐसे जानें प्रॉपर्टी का सही वार्ड कैसे पहचानें? रजिस्ट्री से पहले कलेक्टर गाइडलाइन की जियो-टैग लोकेशन, नगर निगम के वार्ड मैप और दस्तावेजों में दर्ज वार्ड आपस में मिलाएं। अगर कहीं भ्रम हो तो सर्विस प्रोवाइडर से जांच जरूर कराएं। अलग-अलग वार्ड रेट दिखें तो क्या करें? रजिस्ट्री में जल्दबाजी न करें। पहले यह तय करें कि जमीन किस वार्ड में आती है। गलत वार्ड पर रजिस्ट्री होने से आगे चलकर स्टांप ड्यूटी, नामांतरण और कानूनी विवाद खड़े हो सकते हैं।
