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सीएम बोले- महिला दिवस माता सीता के नाम पर मने:करीला के 200 साल पुराने मंदिर पहुंचे डॉ. यादव; कहते हैं यहीं लव-कुश का जन्म हुआ

अशोकनगर के करीला में रंगपंचमी पर सीएम मोहन यादव पत्नी समेत माता सीता के दर्शन करने रविवार को पहुंचे। उन्होंने मां जानकी के दर्शन कर पूजा-अर्चना की। पारंपरिक झंडा लेकर चले और मंदिर में उसे अर्पित किया। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर सीएम डॉक्टर मोहन यादव ने कहा आने वाले चुनावों में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण मिलने वाला है। उन्होंने कहा अगर महिला दिवस माता सीता के नाम पर मनाया जाए तो हमारी संस्कृति धन्य हो जाएगी। प्रदेश सरकार महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए कई योजनाएं चला रही है। उन्होंने कलेक्टर से कहा करीला आने वाले श्रद्धालुओं के ठहरने, भोजन व्यवस्था और पार्किंग की बेहतर सुविधाओं के लिए प्रस्ताव तैयार किया जाए। ताकि किसी भी श्रद्धालु को परेशानी न हो। सीएम बोले जहां भगवान की लीलाएं हुई हैं, उन स्थानों को तीर्थ के रूप में विकसित किया जा रहा है और वहां भक्तों के लिए बेहतर व्यवस्थाएं की जा रही हैं। अशोकनगर के गेहूं की तारीफ की
मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने अशोकनगर के गेहूं की भी जमकर तारीफ की। उन्होंने कहा कि अशोकनगर का गेहूं काफी प्रसिद्ध है और इसकी काफी मांग रहती है। अंत में उन्होंने दीपनाखेड़ा से करीला तक 10 किलोमीटर लंबी सड़क की मांग का भी जिक्र किया और इस संबंध में कलेक्टर को प्रस्ताव तैयार करने के निर्देश दिए। इधर, प्रभारी मंत्री राकेश शुक्ला बोले- मुख्यमंत्री ने अशोकनगर जिले को 115 करोड़ रुपये के लोकार्पण और भूमि पूजन की सौगात दी है। इन परियोजनाओं में करीब 50 विकास कार्य शामिल हैं। इनमें ईसागढ़ के संदीपनी विद्यालय, अशोकनगर के स्वास्थ्य केंद्र, मुंगावली की सड़क सहित अन्य विकास कार्यों का लोकार्पण किया गया। करीब 89 लाख रुपये की लागत से यहां विभिन्न कार्य कराए गए हैं। इनमें 55 लाख रुपये की लागत से पानी की टंकी का निर्माण, 26 लाख रुपये से हेलीपैड तक जाने वाला मार्ग, वीआईपी दर्शन और वीआईपी पार्किंग की व्यवस्था बनाई गई है। वहीं 7.50 लाख रुपये की लागत से सीता रसोई के पास निर्माण कार्य कराया गया है। अब जानिए करीला धाम के बारे में करीब 200 वर्ष पुराना है धाम का इतिहास
करीला धाम का इतिहास लगभग 200 वर्ष पुराना बताया जाता है। कहा जाता है कि महंत तपसी महाराज को स्वप्न में संकेत मिला था कि करीला गांव की पहाड़ी पर स्थित वाल्मीकि आश्रम में माता जानकी और लव-कुश कुछ समय तक रहे थे। स्वप्न के बाद तपसी महाराज ने इस स्थान की खोज की और उन्हें वही आश्रम मिला जैसा उन्होंने स्वप्न में देखा था। इसके बाद उन्होंने वहां रहकर पूजा-अर्चना शुरू की और आसपास के ग्रामीणों के सहयोग से यह स्थान धीरे-धीरे एक प्रमुख धार्मिक केंद्र बन गया। दर्शन करने लाखों श्रद्धालु पहुंचेंगे
प्रसिद्ध मां जानकी धाम करीला में रंग पंचमी के अवसर पर लगने वाला ऐतिहासिक करीला मेला शुरू हो गया है। आज (रविवार) सुबह से ही श्रद्धालुओं की भारी भीड़ मंदिर परिसर में उमड़ रही है। प्रशासन के अनुमान के अनुसार अगले 24 घंटों में लाखों श्रद्धालु माता जानकी के दर्शन के लिए करीला धाम पहुंचेंगे। मेले का शुभारंभ पारंपरिक रूप से झंडा चढ़ाने की रस्म के साथ किया गया। कहते हैं- माता सीता यहीं आकर ठहरीं
करीला धाम को लेकर गहरी धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं। मान्यता है कि जब भगवान राम ने माता सीता को वनवास भेजा था, तब वे महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में आकर ठहरी थीं। माना जाता है कि यही वह स्थान है जहां माता सीता ने अपने पुत्रों लव और कुश को जन्म दिया था। किंवदंती के अनुसार लव-कुश के जन्म के समय स्वर्ग से अप्सराएं यहां उतरी थीं और उन्होंने खुशी में नृत्य किया था। इसी मान्यता के चलते यहां रंग पंचमी की रात को नृत्यांगनाओं द्वारा बधाई नृत्य करने की परंपरा चली आ रही है। आज भी सैकड़ों नृत्यांगनाएं पूरी रात राई नृत्य प्रस्तुत करती हैं। अनोखा मंदिर, जहां राम की प्रतिमा नहीं
करीला धाम का मंदिर अन्य मंदिरों से अलग माना जाता है। यहां माता सीता, लव-कुश और महर्षि वाल्मीकि की प्रतिमाएं स्थापित हैं, लेकिन भगवान राम की प्रतिमा नहीं है। मंदिर में स्थापित ये प्रतिमाएं सैकड़ों वर्ष पुरानी मानी जाती हैं और आकार में छोटी होने के बावजूद अत्यंत पवित्र मानी जाती हैं। यहां मुख्य रूप से माता सीता की पूजा होती है। झंडा चढ़ाने की परंपरा से शुरू हुआ मेला
करीला धाम में मेले की शुरुआत झंडा चढ़ाने की परंपरा से होती है। बताया जाता है कि विदिशा जिले के ललितपुर गांव के लोगों ने कई वर्षों पहले रंग पंचमी के दिन यहां झंडा चढ़ाने की शुरुआत की थी। समय के साथ यह परंपरा बढ़ती गई और श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ने लगी। धीरे-धीरे यहां अस्थायी बाजार और दुकानें लगने लगीं और यह आयोजन एक विशाल मेले का रूप ले गया। साल में केवल एक बार खुलती है पवित्र गुफा
करीला धाम की सबसे महत्वपूर्ण आस्था उस पवित्र गुफा से जुड़ी है, जहां माता सीता द्वारा लव-कुश को जन्म देने की मान्यता है। यह गुफा वर्ष में केवल एक दिन, यानी रंग पंचमी के अवसर पर ही खोली जाती है। पूजा-अर्चना के बाद श्रद्धालुओं के लिए गुफा के द्वार खोल दिए जाते हैं और लगभग 24 घंटे तक भक्त यहां दर्शन कर सकते हैं। इसके बाद गुफा को फिर से बंद कर दिया जाता है। गुफा के भीतर प्रज्वलित अग्नि की भभूति को अत्यंत पवित्र माना जाता है और श्रद्धालु इसे प्रसाद के रूप में प्राप्त करते हैं। मन्नत पूरी होने पर कराया जाता है राई नृत्य
करीला धाम में राई नृत्य की परंपरा बहुत पुरानी है। हालांकि यहां अन्य दिनों में भी राई नृत्य होते हैं, लेकिन रंग पंचमी के दिन इसका विशेष महत्व होता है। सुबह से लेकर पूरी रात तक सैकड़ों नृत्यांगनाएं यहां नृत्य प्रस्तुत करती हैं। मान्यता है कि जो भी श्रद्धालु माता जानकी से मन्नत मांगता है और उसकी मनोकामना पूरी हो जाती है, वह माता के दरबार में बधाई के रूप में राई नृत्य करवाता है। यह नृत्य बच्चों के जन्म, नौकरी लगने, व्यापार में सफलता या चुनाव जीतने जैसी विभिन्न मनोकामनाओं की पूर्ति पर कराया जाता है। रात भर चलता है राई नृत्य
रंग पंचमी की सुबह से ही करीला पहाड़ी पर राई नृत्य शुरू हो जाता है। नृत्यांगनाएं सबसे पहले मंदिर में माता जानकी के सामने नृत्य प्रस्तुत करती हैं। इसके बाद दिन-रात लगातार कार्यक्रम चलता रहता है। मेले के समापन पर सभी नृत्यांगनाएं एक साथ सामूहिक नृत्य करती हैं, जिसे “घेरा की राई” कहा जाता है। इसी विशेष प्रस्तुति के साथ मेले का औपचारिक समापन माना जाता है। तीन तस्वीरें देखिए…

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