इंदौर में पुष्य नक्षत्र के संयोग पर रविवार को राजबाड़ा, सराफा और आसपास के बाजारों में जमकर रौनक रही। दीपावली से पहले आखिरी रविवार और अवकाश होने के कारण शाम को बाजारों में ग्राहकों की भीड़ बढ़ गई। कपड़े, बर्तन, सजावटी सामान, पूजा सामग्री, सोना-चांदी और रोजमर्रा की छोटी-बड़ी चीजों की खरीदारी होती रही। बाजारों में परिवारों के साथ पहुंचे लोगों के कारण देर शाम तक चहल-पहल बनी रही। इस बार पुष्य नक्षत्र पर खरीदारी के साथ व्यापारियों के बीच एक पुरानी परंपरा भी चर्चा में रही। कई कारोबारी नए बही-खाते खरीदने और उनका ऑर्डर देने पहुंचे। मान्यता है कि पुष्य नक्षत्र पर नए बही-खाते घर या दुकान में लाना शुभ होता है। इनकी विधि-विधान से पूजा दीपावली पर की जाती है। हालांकि, नए खातों में काम शुरू करने का समय व्यापारियों की अपनी परंपरा के अनुसार अलग-अलग होता है। 70-80 साल से देख रहे बही-खाते खरीदने की परंपरा सराफा कारोबारी अशोक कुमार गुप्ता ने बताया कि पुष्य नक्षत्र पर नए बही-खाते खरीदने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। वे खुद पिछले 70-80 साल से इस परंपरा को देखते आ रहे हैं। मान्यता के अनुसार, इस दिन नए खाते खरीदकर घर या दुकान में लाए जाते हैं, जबकि दीपावली पर उनकी पूजा होती है। उन्होंने बताया कि दीपावली के अगले दिन अवकाश रहता है और उसके तीसरे दिन से नए बही-खातों में व्यापार का हिसाब-किताब लिखना शुरू किया जाता है। पुराने बही-खातों को भी कम से कम तीन से पांच साल तक संभालकर रखा जाता है, ताकि पुराने लेन-देन की जरूरत पड़ने पर जांच की जा सके 50% से ज्यादा दुकानदार आज भी निभा रहे परंपरा अविनाश शास्त्री, सराफा एसोसिएशन के कार्यकारिणी सदस्य ने बताया कि दीपावली के बाद नए बही-खाते शुरू करने की परंपरा बहुत पुरानी है। पहले गोवर्धन पूजा या दीपावली पड़वा को वर्ष का पहला दिन मानकर नए खातों की शुरुआत की जाती थी। जिस तरह अप्रैल से नया वित्तीय वर्ष शुरू होता है, उसी तरह व्यापारी परंपरागत रूप से दीपावली के बाद नए बही-खाते शुरू करते आए हैं। उन्होंने बताया कि आज भी 50% से अधिक दुकानदार इस परंपरा का पालन करते हैं। नई तकनीक और डिजिटल हिसाब-किताब के दौर में भी व्यापारी शुभ मुहूर्त और परंपरा के महत्व को बनाए हुए हैं। 100 साल पुरानी दुकान में आज भी संभालकर रखते हैं 15 साल पुराने खाते प्रेम नीमा ने बताया कि पुष्य नक्षत्र पर नए बही-खाते खरीदने के बजाय उनका ऑर्डर दिया जाता है। धनतेरस के शुभ मुहूर्त में इन्हें दुकान पर मंगवाया जाता है। दीपावली पर पंडित से विधि-विधान के साथ पूजा कराई जाती है। कुमकुम और चावल से तिलक कर भगवान का आशीर्वाद लिया जाता है। उन्होंने बताया कि उनकी दुकान करीब 100 साल पुरानी है और यहां बही-खातों की परंपरा आज भी जारी है। हालांकि, नए खाते दुकान पर दीपावली से ही रख दिए जाते हैं, लेकिन उनमें नियमित हिसाब-किताब 1 अप्रैल से शुरू किया जाता है। गिरवी रखे गहनों का रिकॉर्ड भी पुराने खातों में नीमा ने बताया कि डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल बढ़ा है, लेकिन बही-खातों की जरूरत अब भी बनी हुई है। खासकर सोना-चांदी गिरवी रखने वाले ग्राहकों का पूरा विवरण और लेन-देन का रिकॉर्ड इनमें दर्ज किया जाता है। कई बार ग्राहक 10-12 साल बाद अपना गिरवी रखा सामान लेने आते हैं। ऐसे में पुराने खाते देखकर उनका रिकॉर्ड निकाला जाता है और हिसाब के अनुसार सामान या रकम लौटाई जाती है। उन्होंने बताया कि सरकारी नियमों के तहत सामान्य रिकॉर्ड तीन साल तक रखने की जरूरत होती है, लेकिन उनकी दुकान पर 10, 12 और 15 साल पुराने बही-खाते भी संभालकर रखे जाते हैं। उनके मुताबिक, बही-खाते केवल हिसाब-किताब की किताबें नहीं, बल्कि व्यापारी और ग्राहक के बीच भरोसे का रिकॉर्ड भी हैं।
