महाराष्ट्र के नाशिक में रविवार को 517 श्रद्धालुओं ने एक साथ शंख बजाकर गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स बनाया। यह कार्यक्रम गोदावरी नदी के किनारे हुआ। यह आयोजन सिंहस्थ कुंभ मेले के ध्वजारोहण समारोह से पहले किया गया। प्रतिभागियों ने पांच मिनट 30 सेकंड तक शंख बजाए। आयोजकों के मुताबिक, कार्यक्रम के लिए चेन्नई से खास तौर पर प्रमाणित शंख मंगाए गए थे। गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स के सीनियर जज ऋषि नाथ ने देवमामलेदार यशवंत महाराज पटांगण में रिकॉर्ड की घोषणा की। इससे पहले एक साथ शंख बजाने का रिकॉर्ड 2019 में अमेरिका के न्यू जर्सी में 303 लोगों के नाम था। नाशिक-त्र्यंबकेश्वर सिंहस्थ कुंभ मेला दोनों पवित्र शहरों में हर 12 साल में होने वाला बड़ा हिंदू धार्मिक आयोजन है। यह मेला 31 अक्टूबर से 24 जुलाई 2028 तक चलेगा। ध्वजारोहण में शामिल होंगी राष्ट्रपति मुर्मू NTKMA के कमिश्नर शेखर सिंह ने कहा कि इस पहल से परंपरा को कुंभ मेले की शुभ शुरुआत से जोड़ने में मदद मिलेगी। उन्होंने बताया कि 31 अक्टूबर को ध्वजारोहण समारोह के समय 251 प्रतिभागी शंख बजाएंगे। कुंभ मेले का ध्वजारोहण समारोह 31 अक्टूबर को दोपहर 12:02 बजे रामकुंड में होगा। इस समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को आमंत्रित किया गया है। इसी कार्यक्रम में गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स का प्रमाणपत्र भी सौंपा जाएगा। कुंभ मेले में करोड़ों लोगों के पहुंचने की संभावना 20 महीने तक चलने वाले कुंभ मेले के 44 मुहूर्त नासिक में और 53 मुहूर्त त्र्यंबकेश्वर में स्नान के हैं। सरकार का अनुमान है कि नासिक में 8-10 करोड़ और त्र्यंबकेश्वर में 4 करोड़ श्रद्धालु आएंगे। नासिक कुंभ की खास बात है कि यहां वैष्णव और शैव अखाड़ों के स्नान अलग-अलग तीर्थस्थलों पर होते हैं। नासिक और त्र्यंबकेश्वर को एक ही आयोजन के दो प्रमुख केंद्रों के रूप में देखा जाता है। इसे सिंहस्थ कुंभ क्यों कहते हैं नासिक के कुंभ को सिंहस्थ इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसकी पारंपरिक ज्योतिषीय गणना में बृहस्पति के सिंह राशि में प्रवेश का विशेष महत्व है। कुंभ की तिथियां केवल सामान्य कैलेंडर के आधार पर तय नहीं होतीं; इनमें धार्मिक परंपराओं, ग्रहों की स्थिति और अखाड़ों की सहमति की भूमिका होती है। हिंदू मान्यता के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान अमृत कलश को लेकर देवताओं और असुरों के बीच संघर्ष हुआ था। मान्यता है कि अमृत की बूंदें चार स्थानों—प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक—में गिरी थीं। इसी वजह से इन स्थानों पर कुंभ मेले की परंपरा जुड़ी है।
