मध्यप्रदेश के नीमच जिले में स्थित भादवा माता मंदिर को आरोग्य तीर्थ भी कहा जाता है। इसे मालवा की वैष्णो देवी और आरोग्य देवी के नाम से भी जाना जाता है। दावा है कि यहां स्थित प्राचीन बावड़ी के जल से लकवा और मिर्गी जैसी असाध्य बीमारियां ठीक हो जाती हैं। इसी मान्यता के चलते मरीज यहां कई दिनों तक रुकते हैं। भादवा गांव में मंदिर स्थित होने के कारण इनका नाम भादवा माता पड़ा। खास बात यह है कि शुरुआत से ही यहां के मुख्य पुजारी भील समुदाय से रहे हैं। हालांकि, गांव में ब्राह्मण और भील, दोनों समुदायों के लोग रहते हैं। नवरात्रि में दैनिक भास्कर की टीम मंदिर पहुंची। यहां पुजारी और श्रद्धालुओं से बात की। बावड़ी में स्नान कर कलावा बांधते हैं भक्त मंदिर में स्थित प्राचीन बावड़ी में सालभर पानी रहता है। यहां आने वाले भक्त बावड़ी में स्नान और आचमन करते हैं। बोतल में भरकर घर भी ले जाते हैं। इसके अलावा, रोग ग्रस्त अंग पर भस्म का लेप करते हैं। मन्नत मांगकर श्रद्धालु कलावा भी बांधते हैं। सालभर यहां लकवा, चर्म रोग समेत अन्य असाध्य रोगों से पीड़ित आते हैं। उनका मानना है कि भस्म लेपन, बावड़ी के जल और कलावा बांधने, मंदिर की परिक्रमा करने और माता की कृपा से रोग ठीक हो जाता है। वैज्ञानिकों की रिसर्च के अनुसार बीमारियों का निवारण करने वाले विशेष तत्व पाए गए हैं। कहा जाता है कि रोजाना रात को मंदिर में माता फेरा लगाती हैं। माता अपने भक्तों को आशीर्वाद देकर उन्हें निरोगी बनाती हैं। जिंदा मुर्गा, बकरा तक चढ़ाते हैं श्रद्धालु मन्नत पूरी होने पर भक्त मंदिर में सोने-चांदी के छत्र, मुकुट, माला, टीका, नथ, कमर बंध, पायजेब, बिछिया, त्रिशूल, तलवार, चंवर, साड़ी, चुनरी, लहंगा, चोली, सोलह श्रृंगार, तोरण आदि चढ़ाते हैं। बच्चों के स्वास्थ्य मनोरथ के लिए उनका मुंडन कर बाल चढ़ाए जाते हैं। कुवांरी कन्याएं पति की मनोकामना के लिए सोलह श्रृंगार और बीमार रोग ग्रस्त अंग के ठीक होने पर चांदी की प्रतिकृति बनाकर चढ़ाते हैं। मंदिर में बलि का रिवाज नहीं है। कुछ लोग जिंदा मुर्गा, बकरा भी चढ़ाते हैं। इसके बाद ये प्राणी मंदिर परिसर में ही घूमते रहते हैं। हालांकि, प्रशासन ने इस पर रोक लगा दी है। अब मंदिर में चांदी के बकरे और मुर्गे अर्पित किए जाते हैं। मंदिर को लेकर दो मान्यताएं इतिहासकारों की मानें, तो मंदिर 500 साल से भी ज्यादा पुराना है। इसे लेकर अलग-अलग मान्यताएं हैं। पहली- ब्राह्मणों के अनुसार, विक्रम सम्वत् 1458 में राजस्थान के मेणार से पंडित पीताम्बरदास के पुरखे गांव भादवा में आकर बसे। एक दिन पीताम्बरदास को माता ने स्वप्न में दर्शन देकर कहा– ‘गांव में स्थित आरणी वृक्ष के मूल में मेरी प्रतिमा दबी है। इसे निकालकर स्थापित करो।’ जब यहां खुदाई की गई, तो मां की प्रतिमा निकली। दूसरी – भीलों के पूर्वज राजस्थान से आकर नीमच के महेंद्री गांव में बसे। यहां से दो भाई धन्नाजी और रूपाजी भादवा आए। रूपाजी पास के ही गांव सावन में चले गए। वहीं, धन्नाजी भादवा में बस गए। एक दिन किसी बात से नाराज होकर रूपाजी रूठकर आरणी के वृक्ष के नीचे बैठ गए। उसी रात रूपाजी को स्वप्न में माता ने दर्शन दिए। कहा- मेरी प्रतिमा आरणी के मूल में दबी है, उसे निकाल कर स्थापित करो।’ रूपाजी ने माता की मूर्ति निकालकर स्थापित कर दी। राजा ने भीलों को दिया पूजा का अधिकार कहा जाता है कि जब मेवाड़ के महाराणा मोकल को माता के चमत्कार के बारे पता चला, तो वे भादवा आए। उन्होंने संवत् 1482 में भीलों को पूजा का अधिकार दिया था। इसके बाद आज भी मंदिर के पुजारी उसी भील परिवार के हैं। ब्राह्मणों का तर्क है कि वंश परंपरागत है, जबकि भीलों के कथन का आधार भाटो की पोथियां हैं, जो हस्तलिखित हैं। वर्तमान में मंदिर में भील समाज के धन्नाजी के वंशज ही पूजा कर रहे हैं। नौ देवियों समेत भगवान विष्णु और शिव विराजमान मंदिर के पुजारी अर्जुन पंडित बताते हैं कि मंदिर में भादवा माता चांदी के सिंहासन पर विराजित हैं। माता की मूर्ति के चारों ओर नौ देवियों की मूर्तियां हैं। यहां- ब्रह्मणी, महेश्वरी, कुमारी, वैष्णवी, वाराही, नरसिंही, इंद्री, शिवदत्ती और चामुंडा देवी विराजमान हैं। मूर्ति के सामने अखंड ज्योति कई साल से लगातार जल रही है। मंदिर में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी, माता पार्वती और भगवान शंकर की आलिंगनबद्ध प्रतिमा भी है। गर्भ गृह के बाहर मुख्य द्वार के पहले गणेश और हनुमान जी विराजे हैं। वहीं, पश्चिम में भैरव और गौराजी की प्रतिमा है। मालवी भाषा में फिल्म भी बनी कवि और वरिष्ठ राजनेता बालकवि बैरागी ने माता की महिमा पर मालवी भाषा में ‘जय भादवा माता’ फिल्म भी बनाई। मंदिर की बावड़ी के पानी को लेकर बालकवि का यह गीत लोग गुनगुनाते हैं- ‘मालवा की राणी थारो अमृत पानी, थारी महीमा कोणी जाए बखाणी, मारी माय।’ उन्होंने लोगों के रोग मुक्त होने के कारण पानी को अमृत कहा है। अष्टमी के दिन जिले में रहता है अवकाश मंदिर में आमतौर पर रोजाना करीब 1500 से दो हजार श्रद्धालु आते हैं। वहीं, नवरात्रि में 15 से 20 हजार रोजाना श्रद्धालु आते हैं। हर साल चैत्र और अश्विन महीने की नवरात्रि में मेला भी लगता है। माता का विशेष श्रृंगार किया जाता है। यहां देशभर से श्रद्धालु दर्शन करने पहुंचते हैं। माता के दरबार में श्रद्धालु भजन-कीर्तन करते हुए पैदल भी आते हैं। नवरात्रि में अष्टमी के दिन हवन होता है। भक्तों की भीड़ को देखते हुए कलेक्टर द्वारा इस दिन जिले में छुट्टी भी कर दी जाती है। ऑनलाइन दर्शन की भी व्यवस्था भादवा माता ट्रस्ट के पदेन अध्यक्ष कलेक्टर और सचिव एसडीएम हैं। मंदिर समिति के सदस्य अलग-अलग क्षेत्र के वरिष्ठ व्यक्ति और जनप्रतिनिधि हैं। साल 1935 से ट्रस्ट का संचालन शासन के अधीन है। ट्रस्ट के जरिए साफ-सफाई, यात्रियों के रहने के लिए धर्मशाला, स्नान-ध्यान के लिए सुलभ कॉम्प्लेक्स, अन्न क्षेत्र के माध्यम से रियायती भोजन उपलब्ध कराया जा रहा है। भक्तों को घर बैठे ऑनलाइन दर्शन की सुविधा भी है। श्रद्धालु बोले – यहां रहकर मां बोलने लगी हैं नीमच के खजूरीगौड़ गांव से आईं कारीबाई लकवे से पीड़ित हैं। उनके बेटे सत्यनारायण ने बताया, पिछले करीब 20 दिन से मंदिर में रुके हैं। जब माताजी को यहां लेकर आए थे, तब वे बोल भी नहीं पा रही थीं। यहां तक कि चल भी नहीं पा रही थीं। 20 दिन में माताजी बोलने लगी हैं। नवरात्रि के आखिरी दिन तक यहां रुकेंगे। इंदौर से आईं चारू मंडलोई ने बताया कि यह चमत्कारी मंदिर है। यहां से अमृत बावड़ी का जल लेकर जाते हैं, जिसे आंखों पर लगाने पर आंखों की समस्या दूर होती है। कनघटी गांव से शांतिलाल ने बताया कि उनकी सास काशीबाई लकवे से पीड़ित हैं। पिछले 10 दिन से यहीं रह रहे हैं। रोजाना बावड़ी के जल से नहलाते हैं। माता की आरती के दर्शन करवाकर परिक्रमा लगवाते हैं। उनकी हालत में सुधार भी है। सीएसपी किरण चौहान ने बताया कि तीन शिफ्ट में जवानों की ड्यूटी लगाई गई है। अतिरिक्त फोर्स भी मंगाया गया है। इसके अलावा, अस्थाई पुलिस चौकी बनाई गई है। सीसीटीवी से निगरानी की जा रही है।
