नवरात्रि में अनोखे तरीके से माता की भक्ति करते भक्त देखे जा सकते हैं। किसी ने माता को जीभ काटकर चढ़ा दी, तो किसी ने शरीर पर ही जवारे उगा लिए। दैनिक भास्कर ने ऐसे ही युवक और बुजुर्ग महिला से बात की। उनका दावा है कि अब स्थिति सामान्य है। बात करने में भी दिक्कत नहीं होती। हालांकि मेडिकल साइंस इससे इत्तेफाक नहीं रखता। मनोरोग विशेषज्ञ सत्यकांत त्रिवेदी इसे सिर्फ आस्था मानते हैं, लेकिन जीभ सामान्य होने की बात को वो भी नकारते हैं। सीधी: बुजुर्ग महिला ने नाती के लिए मांगी थी मन्नत सेमरिया क्षेत्र के रामगढ़ पंचायत की कोलान बस्ती में पिछले साल यानी 2025 में शारदीय नवरात्रि में दुर्गा पूजा पंडला लगा था। इसी पंडाल में पंचमी के दिन कल्लूबाई (80) ने अपनी ब्लेड से जीभ काटकर माता को अर्पित कर दी थी। कल्लूबाई अब सामान्य लोगों की तरह बात करती हैं। वह बताती हैं कि नवरात्रि में उपवास रखा था। उसी दौरान 16 साल के नाती को तेज बुखार था। वह स्कूल नहीं जा पाता था। गांव में डॉक्टर को दिखाया। दाहिने पैर ने काम करना बंद कर दिया। वह रोने लगा। पैर जमीन पर नहीं रख पा रहा था। उसे जिला अस्पताल में दिखाया, वहां से जबलपुर रेफर कर दिया। पैर में सूजन आ गई। मैं उसे गोद में उठाकर ले जाया करती थी। लोगों ने दिल्ली–मुंबई ले जाने की भी सलाह दी। हालांकि दिन में तो ठीक रहता, लेकिन रात में तेज दर्द होने लगता। उसका दर्द देखा नहीं जा रहा था। कुछ दिन बाद एक पैर से चलना शुरू कर दिया, लेकिन फिर भी गिर जाता था। जब कुछ नहीं सूझा, तो मैंने सब कुछ माता पर छोड़ दिया। पंचमी के दिन सुबह करीब 8 बजे अपनी जीभ का करीब एक इंच हिस्सा काट कर चढ़ा दिया। उस वक्त वहां खून भी बह रहा था। कल्लूबाई का दावा है कि माता के आशीर्वाद से शाम 5:00 बजे जीभ जस की तस हो गई थी। एक दिन पहले माता ने सपने में दर्शन दिए। कल्लूबाई ने बताया कि परिवार के सदस्यों की बीमारी भी दूर हो गई है। इसी विश्वास के साथ इस साल माता की परिक्रमा भी करेंगी। भिंड: युवक बोला- पता नहीं चला, जीभ काट ली भिंड के करीब एक साल पहले भारौली गांव में सती माता मंदिर में 21 साल के आकाश ने भी अपनी जीभ काटकर चढ़ा दी थी। दावा है कि अब उसकी जीभ सामान्य हो गई है। उसे बोलने में भी परेशानी नहीं हो रही। आकाश के परिजन का कहना है कि उस वक्त बेटे की माता के प्रति आस्था थी। वह गुरु के आदेश को सर्वोपरि मानता था। चाचा उदयवीर सिंह का कहना है कि भतीजा पढ़ाई में होशियार है। उसने बीएससी की है। आगे की पढ़ाई और नौकरी की तैयारी के लिए दिल्ली गया था। उसका झुकाव प्रवचनों और संत समाज की ओर बढ़ता गया। करीब एक साल पहले गांव में भागवत कथा के दौरान आकाश ने सती माता मंदिर में जीभ काटकर चढ़ा दी थी। उसे जिला अस्पताल लेकर पहुंचे थे। उसने गुरु के आदेश पर ऐसा करने की बात कही थी। अब स्थिति सामान्य है। वह बिना परेशानी बातचीत कर रहा है। सागर: युवक ने शरीर पर जवारे भी उगाए थे सागर जिले के रहली विकासखंड के चांदपुर में चैत्र नवरात्रि में भक्त कमलेश कुर्मी ने आसन पर बैठकर शरीर पर जवारे लगाए थे। उन्होंने नवरात्र के नौ दिनों तक अन्न-जल और अपनी दैनिक दिनचर्या का त्याग कर शरीर पर जवारे लगाए। कमलेश माता की स्थापना कर मां दुर्गा की प्रतिमा के पास नौ दिन तक कुर्सी पर बैठे रहे। शरीर के अलग-अलग हिस्सों पर जवारे लगाए रहे। इस दौरान न तो वह उठते और न ही कहीं जाते हैं। दिनभर में सिर्फ दो चम्मच जल और दही ग्रहण करते थे। कमलेश ने इसके लिए 15 दिन पहले से तैयारी शुरू कर दी थी। नवरात्र से 15 दिन पहले ही अन्न-जल त्याग दिया था। साथ ही, प्रतिमा का निर्माण शुरू किया। परमा यानी चैत्र नवरात्रि के पहले दिन स्थापना करके शरीर पर जवारे लगाए। अब मेडिकल साइंस की बात… डॉक्टर बोले- दोबारा विकसित नहीं होती जीभ ईएनटी विशेषज्ञ डॉ. नितेश मुद्गल ने बताया कि जीभ का कटा हुआ हिस्सा दोबारा विकसित नहीं होता। जो लोग आस्था और विश्वास के नाम पर ऐसे कृत्य के लिए प्रेरित होते हैं, वे कई बार धार्मिक विश्वास में डूबे रहते हैं। ऐसे मामलों में व्यक्ति की मानसिक दशा का आकलन जरूरी है। कुछ मामलों में व्यक्ति की मनोदशा ठीक नहीं होती। खुद को गंभीर चोट पहुंचाने की ऐसी घटनाओं को केवल धार्मिक आस्था से जोड़कर नहीं देखना चाहिए। इनके पीछे मानसिक स्थिति और अन्य परिस्थितियों की जांच भी जरूरी है। मनोरोग विशेषज्ञ बोले – ऐसी चीजों से बचना चाहिए भोपाल में वरिष्ठ मनोरोग विशेषज्ञ सत्यकांत त्रिवेदी कहते हैं कि इस परंपरा को समझने के लिए आस्था, सामूहिक मनोविज्ञान, सांस्कृतिक स्थिति और मानवीय अनुभूति के बीच के संबंध को समझना जरूरी है। मनुष्य का दिमाग केवल घटनाओं को दर्ज नहीं करता, बल्कि उन्हें अपनी मान्यताओं, अपेक्षाओं और सामाजिक परिवेश के आधार पर अर्थ भी देता है। गहरी धार्मिक आस्था, अनुष्ठान के दौरान भावनात्मक तल्लीनता और सामूहिक विश्वास किसी अनुभव की अनुभूति और उसकी व्याख्या को प्रभावित कर सकते हैं। मनोविज्ञान की स्पष्ट सीमा है, जबकि आस्था दर्द की अनुभूति को प्रभावित कर सकती है, भय कम कर सकती है। किसी अनुभव को असाधारण अर्थ दे सकती है; परंतु इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि शरीर का कट चुका अंग दोबारा विकसित हो सकता है।
