Homeमध्यप्रदेशपंचायत’ में मां, ‘महारानी’ में पुलिस, अब 67 की महिला:भोपाल की ज्योति...

पंचायत’ में मां, ‘महारानी’ में पुलिस, अब 67 की महिला:भोपाल की ज्योति दुबे बोलीं, ‘एक्टर के लिए उम्र नहीं, किरदार मायने रखता है’

एक कलाकार की असली पहचान तब बनती है, जब दर्शक उसके चेहरे से ज्यादा उसके किरदार को याद रखें। भोपाल की अभिनेत्री ज्योति दुबे पिछले एक दशक से थिएटर और कैमरे पर लगातार काम कर रही हैं। ‘पंचायत’ के सीजन-1 में आत्माराम की मां के छोटे से किरदार से उन्हें ऐसी पहचान मिली कि आज भी दर्शक उनसे पूछ लेते हैं- ‘पंचायत’ के अगले सीजन में आप आ रही हैं क्या? ज्योति के लिए यह पहचान सिर्फ एक सीरीज तक सीमित नहीं रही। ‘महारानी’, ‘ग्रहण’ और ‘ठुकरा के मेरा प्यार’ जैसी वेब सीरीज में उन्होंने अलग-अलग किरदार निभाए। हाल ही में रिलीज हुए ‘ठुकरा के मेरा प्यार’ के सीजन-2 में वे सुषमा के किरदार में नजर आ रही हैं। इस सीरीज में उन्होंने 67 साल की महिला का किरदार निभाया है, जबकि इससे पहले वे 35 और 25 साल की उम्र के किरदार भी निभा चुकी हैं। ज्योति कहती हैं कि उनके लिए उम्र किरदार का हिस्सा है, सीमा नहीं। वे मानती हैं कि एक कलाकार को एक ही तरह की भूमिकाओं में बंधकर नहीं रहना चाहिए, बल्कि अलग-अलग किरदारों को निभाकर खुद को चुनौती देते रहना चाहिए। ‘पंचायत’ के बाद आज भी लोग पूछते हैं- अगले सीजन में आ रही हैं? ज्योति को ‘पंचायत’ के पहले सीजन के सातवें एपिसोड में आत्माराम की मां के किरदार से खास पहचान मिली। उनका किरदार सिर्फ एक एपिसोड में था, लेकिन दर्शकों ने उसे याद रखा। वे बताती हैं कि आज भी कई लोग उनसे पूछते हैं कि ‘पंचायत’ के अगले सीजन में वे नजर आएंगी या नहीं। ज्योति कहती हैं कि कई बार लोग उन्हें उनके चेहरे से तुरंत पहचान नहीं पाते, क्योंकि हर प्रोजेक्ट में उनका लुक बदल जाता है। लेकिन जैसे ही किसी किरदार या सीरीज का नाम सामने आता है, वे पहचान लेते हैं कि ‘अच्छा, ये किरदार आपने किया था।’ उनके मुताबिक कलाकार के लिए इससे बड़ी बात यही है कि दर्शक उसके किरदार को याद रखें। 67 साल की महिला बनना चुनौती भी था, अनुभव भी ‘ठुकरा के मेरा प्यार’ में 67 साल की महिला का किरदार निभाना ज्योति के लिए खास अनुभव रहा। कम उम्र में उम्रदराज महिला की भूमिका निभाने के लिए सिर्फ मेकअप और लुक बदलना ही काफी नहीं था। उन्हें उस उम्र की सोच, व्यवहार, चाल-ढाल और बोलने के तरीके को भी समझना पड़ा। ज्योति कहती हैं, “मेरे लिए उम्र सिर्फ किरदार का हिस्सा है, सीमा नहीं। मैंने 67 साल की महिला का किरदार निभाया है, 35 साल का और 25 साल का भी। मुझे ऐसे चैलेंजिंग रोल पसंद हैं, जिनमें मैं खुद को और अपने टैलेंट को एक्सपोज कर सकूं।” उनके मुताबिक एक कलाकार को अपनी उम्र तक सीमित किरदार नहीं चुनने चाहिए। अलग-अलग उम्र और स्वभाव के किरदार निभाने से ही कलाकार को अपनी क्षमताओं को तलाशने का मौका मिलता है। ‘महारानी’ में पुलिस वाली बनीं, गन हैंडलिंग की ट्रेनिंग ली ‘महारानी’ में ज्योति ने पुलिस अधिकारी रंजना कुमारी का किरदार निभाया था। भूमिका में एक्शन और बंदूक से जुड़े सीन भी थे। इसके लिए सेट पर एक्सपर्ट्स ने उन्हें गन हैंडलिंग की जानकारी दी। उन्होंने अपनी तरफ से भी तैयारी की और गन की ग्रिप से लेकर उसे संभालने के तरीके तक को समझा। ज्योति का मानना है कि कलाकार को सेट पर मिलने वाली ट्रेनिंग के भरोसे ही नहीं रहना चाहिए। जिस किरदार को निभाना है, उसकी तैयारी खुद भी करनी चाहिए। उनके लिए अभिनय सिर्फ संवाद बोलना नहीं, बल्कि किरदार की दुनिया को समझकर उसके भीतर उतरना है। आलोक चटर्जी के साथ सीन शूट नहीं हो सका ‘महारानी’ में वरिष्ठ रंगकर्मी आलोक चटर्जी के साथ ज्योति का एक सीन होना था। इमरजेंसी के कारण वह सीन शूट नहीं हो सका। इसमें चेजिंग सीक्वेंस था, जो बाद में कहानी से हटा दिया गया और ज्योति के किरदार को सीधे मृत दिखाया गया। हालांकि थिएटर में वे आलोक चटर्जी के साथ काम कर चुकी हैं। ‘डेथ ऑफ अ सेल्समैन’ और ‘नटसम्राट’ जैसे नाटकों में उनके साथ मंच साझा किया है। ज्योति उन्हें थिएटर की बड़ी किताब मानती हैं। वे कहती हैं कि उनके साथ काम करने के अलावा उन्हें सुनना और उनकी अभिनय प्रक्रिया को देखना भी अपने आप में सीखने का अनुभव रहा। माता-पिता आज भी दोस्तों से कहते हैं- इसका नया रोल जरूर देखना ज्योति के अभिनय सफर में परिवार का समर्थन भी महत्वपूर्ण रहा है। वे बताती हैं कि उनके माता-पिता उनकी सीरीज देखते हैं और फिर अपने दोस्तों को उनके काम के बारे में बताते हैं। ज्योति कहती हैं कि जब उनके माता-पिता अपने दोस्तों से कहते हैं कि ‘इसका नया रोल जरूर देखना’ या ‘इसने अच्छा काम किया है’, तो उन्हें बहुत खुशी होती है। उनके लिए परिवार की यह प्रतिक्रिया किसी पुरस्कार से कम नहीं है। बचपन में पता था एक्टिंग करनी है, रास्ता नहीं मालूम था ज्योति को बचपन में ही महसूस हो गया था कि उन्हें अभिनय करना है, लेकिन उस समय यह नहीं पता था कि इस क्षेत्र में जाने का रास्ता क्या है। आज की पीढ़ी के लिए परिस्थितियां बदली हैं। उनके मुताबिक थिएटर और कैमरे के सामने काम करने के इच्छुक युवाओं के पास अब जानकारी और विकल्प दोनों मौजूद हैं। वे कहती हैं कि अगर किसी युवा को थिएटर या एक्टिंग करनी है तो उसे घर से बाहर निकलकर तलाश शुरू करनी चाहिए। रास्ते और मौके दोनों मिलेंगे। नई पीढ़ी खुद को प्राथमिकता देती है कम उम्र के कलाकारों के साथ काम करने के अनुभव को लेकर ज्योति कहती हैं कि नई पीढ़ी काफी जिंदादिल है। वे अपने लिए भी जगह बनाना और अपनी प्राथमिकताओं को महत्व देना जानती है। उनके मुताबिक पिछली पीढ़ी में कई लोगों ने दूसरों की जरूरतों को अपनी प्राथमिकता से ऊपर रखा, जबकि आज की पीढ़ी अपने लिए भी सोचती है। ज्योति इसे सकारात्मक बदलाव के तौर पर देखती हैं। अब गोंड जनजाति पर आधारित नाटक ‘लमझाना’ का निर्देशन कैमरे के साथ ज्योति का थिएटर से रिश्ता भी लगातार जारी है। वे अब गोंड जनजाति पर आधारित नाटक ‘लमझाना’ का निर्देशन कर रही हैं। जल्द ही इसका भोपाल में मंचन करने की तैयारी है। मध्य प्रदेश की जनजातीय विविधता को थिएटर के माध्यम से सामने लाना उनके लिए खास अनुभव है। ज्योति के मुताबिक थिएटर किसी भी कलाकार की बुनियाद मजबूत करता है। मंच पर कलाकार का पूरा शरीर दर्शक के सामने होता है। आवाज का उतार-चढ़ाव, बॉडी लैंग्वेज, चेहरे के भाव और छोटा-सा मूवमेंट तक दर्शक देखता है। वे कहती हैं कि अलग-अलग नाटकों में अलग किरदार निभाने से कलाकार को हर बार एक नई दुनिया में जाने का मौका मिलता है। इससे कैरेक्टर का ग्राफ, अभिनय की बारीकियां, वॉइस मॉड्यूलेशन और बॉडी लैंग्वेज समझने में मदद मिलती है। भोपाल में थिएटर की कमी नहीं, दर्शकों को जोड़ने की जरूरत ज्योति मानती हैं कि भोपाल में थिएटर की कमी नहीं है, लेकिन दर्शकों की संख्या बढ़ाने की जरूरत है। वे भारत भवन के पुराने दिनों को याद करते हुए बताती हैं कि एक समय नाटक देखने के लिए कमला पार्क तक टिकट की लाइन लगती थी। उनके मुताबिक आज थिएटर के सामने आर्थिक चुनौतियां जरूर हैं, लेकिन समस्या सिर्फ पैसे की नहीं है। दर्शकों को थिएटर से जोड़ना और प्रस्तुतियों को नए तरीके से पेश करना भी जरूरी है। वे कहती हैं कि हर शहर की अपनी पेइंग कैपेसिटी होती है। मुंबई और दिल्ली में दर्शक महंगे टिकट लेकर भी थिएटर देखते हैं, जबकि भोपाल में 100-200 रुपए के टिकट वाले नाटक में भी दर्शकों की संख्या कम हो जाती है। उनके मुताबिक भोपाल में थिएटर का दर्शक वर्ग बढ़ाने के लिए कलाकारों के साथ दर्शकों को भी आगे आना होगा।

Stay Connected
16,985FansLike
2,458FollowersFollow
61,453SubscribersSubscribe
Must Read
Related News

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here