जिस स्कूल में दिव्यांग बच्चों के भविष्य को संवारने की जिम्मेदारी है, वहां बच्चे ही अपनी पढ़ाई और बुनियादी सुविधाओं के लिए आवाज उठाने को मजबूर हैं। शासकीय दृष्टि बाधित उच्चतर माध्यमिक विद्यालय भोपाल में पढ़ने वाले विद्यार्थियों ने स्कूल की व्यवस्थाओं पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। बच्चों का आरोप है कि स्कूल में पर्याप्त शिक्षक नहीं हैं, नियमित कक्षाएं नहीं लगतीं और कई बार शिक्षक पढ़ाने के बजाय मोबाइल चलाते रहते हैं। स्थिति यह है कि पहली से 12वीं तक की पढ़ाई वाले इस स्कूल में करीब 190 विद्यार्थी हैं, जबकि शिक्षक महज तीन हैं। सबसे गंभीर स्थिति श्रवण बाधित विद्यार्थियों की है। बच्चों का कहना है कि शिक्षकों को साइन लैंग्वेज तक नहीं आती। स्कूल में उनकी बात समझने के लिए इंटरप्रेटर भी नहीं है। ऐसे में सवाल यह है कि जो बच्चा सुन और बोल नहीं सकता, वह अपनी शिकायत आखिर किसे बताए और शिक्षक उसे पढ़ाएंगे कैसे? बता दें कि यह स्कूल सामजिक न्याय एवं दिव्यांगजन सशक्तिकरण भोपाल द्वारा संचालित किया जाता हैं। अपनी मांगों को लेकर बच्चों ने सोमवार को प्रदर्शन भी किया। 2018 से पढ़ रहा हूं, 2026 में भी गणित-अंग्रेजी नहीं आती विद्यार्थियों ने अपनी परेशानी बताते हुए कहा कि वे वर्षों से स्कूल में पढ़ रहे हैं, लेकिन पढ़ाई की स्थिति बेहद खराब है। एक विद्यार्थी अंश राजपूत ने बताया कि वह 2018 से स्कूल में पढ़ रहा है, लेकिन 2026 तक उसे गणित और अंग्रेजी की बुनियादी जानकारी तक नहीं हो पाई। बच्चों का कहना है कि वे बार-बार शिक्षकों से कक्षाएं लेने की बात कहते हैं, लेकिन उनकी सुनवाई नहीं होती। विद्यार्थियों ने आरोप लगाया कि 10वीं और 12वीं में बड़ी संख्या में बच्चे फेल होने के बाद जिम्मेदारी अभिभावकों और बच्चों पर डाल दी जाती है। उनका कहना है कि जब पूरे साल पढ़ाई ही नहीं होगी तो परीक्षा में बच्चे पास कैसे होंगे? शिक्षक तीन, कक्षाएं पहली से 12वीं तक स्कूल प्रबंधन के अनुसार यहां पहली से 12वीं तक कक्षाएं संचालित होती हैं। दृष्टि बाधित और श्रवण बाधित विद्यार्थियों को मिलाकर करीब 190 बच्चे पढ़ते हैं। स्कूल में शिक्षक के पांच पद हैं, इसके अलावा दो व्याख्याता और प्रशिक्षकों के पद भी हैं। लेकिन फिलहाल तीन शिक्षक उपलब्ध हैं। प्राचार्य मोहम्मद इरफान ने बताया कि छत्तीसगढ़ से प्रतिनियुक्ति पर आए तीन शिक्षकों को वहां की सरकार ने वापस बुला लिया था। इसके बाद शिक्षकों की कमी हुई। उन्होंने बताया कि रिक्त पदों के विरुद्ध अतिथि शिक्षक रखने की प्रक्रिया चल रही है और जल्द चार और शिक्षक रखे जाने की उम्मीद है। एक कमरे में दो-दो, तीन-तीन कक्षाएं प्राचार्य ने खुद माना कि स्कूल में कमरों की कमी है और कई बार एक कमरे में दो से तीन कक्षाएं लगानी पड़ती हैं। यानी एक तरफ शिक्षक कम हैं और दूसरी तरफ कक्षाओं के लिए कमरे भी पर्याप्त नहीं हैं। स्कूल में कंप्यूटर, ड्राइंग और सिलाई जैसे प्रशिक्षणों के लिए प्रशिक्षकों की जरूरत भी बताई गई है। प्रबंधन के अनुसार इसके लिए शासन से अनुमति की आवश्यकता है। टीचर फोन चलाते हैं, पढ़ाते नहीं विद्यार्थियों ने शिक्षकों पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि कई बार शिक्षक कक्षा में मोबाइल फोन चलाते रहते हैं और पढ़ाई नहीं कराते। एक छात्रा ने आरोप लगाया कि शिक्षक फोन पर स्क्रॉल करते रहते हैं। विद्यार्थियों का कहना है कि उन्हें पढ़ाई के लिए जिस मदद की जरूरत है, वह नहीं मिल रही। ये आरोप कितने सही हैं, इसकी जांच संबंधित विभाग को करनी चाहिए, लेकिन सवाल यह है कि दिव्यांग बच्चों की शिकायतों की निगरानी और स्कूल में पढ़ाई की गुणवत्ता जांचने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है? कंप्यूटर लैब से लेकर हॉस्टल तक शिकायतें कंप्यूटर लैब से लेकर हॉस्टल तक शिकायतें विद्यार्थियों ने केवल पढ़ाई ही नहीं, बल्कि स्कूल की दूसरी व्यवस्थाओं पर भी सवाल उठाए हैं। बच्चों का कहना है कि उन्हें कंप्यूटर लैब का पर्याप्त उपयोग नहीं करने दिया जाता। छात्राओं ने गर्ल्स हॉस्टल नहीं होने की बात कही है। हॉस्टल में रहने वाले विद्यार्थियों ने साफ-सफाई की कमी और खेल गतिविधियों के लिए बाहर नहीं जाने देने का आरोप लगाया है। एक विद्यार्थी ने बताया कि हॉस्टल में बच्चों को बंद करके रखा जाता है और शाम के समय खेल गतिविधियों की अनुमति नहीं मिलती। बच्चों का कहना है कि वे दूर-दराज से आते हैं और उनके परिवारों को भी काफी परेशानी उठानी पड़ती है। साइन लैंग्वेज नहीं आती तो श्रवण बाधित बच्चे पढ़ेंगे कैसे? इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल श्रवण बाधित विद्यार्थियों की पढ़ाई और संवाद को लेकर है। बच्चों के अनुसार स्कूल के शिक्षकों को साइन लैंग्वेज नहीं आती और कोई इंटरप्रेटर भी उपलब्ध नहीं है। ऐसे में व्यवस्था पर सीधा सवाल खड़ा होता है, जिस विद्यार्थी की भाषा साइन लैंग्वेज है, उसके शिक्षक को वही भाषा नहीं आती तो शिक्षा का अधिकार जमीन पर कैसे लागू होगा? बच्चों का कहना है कि वे अपनी समस्याएं समझाने की कोशिश करते हैं, लेकिन संवाद की व्यवस्था ही नहीं होने के कारण उनकी आवाज जिम्मेदार लोगों तक नहीं पहुंच पाती। प्राचार्य बोले- ‘बच्चों ने शिकायत नहीं की, सीधे आंदोलन पर चले गए स्कूल के प्रभारी अधीक्षक एवं प्राचार्य मोहम्मद इरफान ने कहा कि उन्होंने 17 मार्च 2026 को कार्यभार संभाला है। उनके अनुसार अब तक किसी विद्यार्थी या अभिभावक ने उनके पास लिखित या मौखिक शिकायत नहीं की। उनका कहना है कि यदि बच्चे या उनके अभिभावक शिकायत लेकर आते तो स्कूल प्रबंधन समाधान की कोशिश करता। प्राचार्य ने बताया कि शिक्षकों की कमी दूर करने की प्रक्रिया चल रही है। चार और शिक्षक रखे जाने के बाद स्थिति में सुधार की उम्मीद है। उन्होंने भवन में कमरों की कमी और प्रशिक्षण के लिए अतिरिक्त प्रशिक्षकों की जरूरत भी स्वीकार की। बच्चों का सवाल- शिकायत नहीं सुनी गई तो आंदोलन के अलावा रास्ता क्या? बच्चों का कहना है कि वे लंबे समय से समस्याओं का सामना कर रहे हैं और बार-बार अपनी बात रखने के बावजूद समाधान नहीं हुआ। इसी वजह से वे आंदोलन की राह पर आए हैं। अब मामला केवल स्कूल के तीन शिक्षकों का नहीं है। सवाल यह है कि 190 दिव्यांग विद्यार्थियों की पढ़ाई, हॉस्टल, संवाद, खेल और प्रशिक्षण जैसी बुनियादी जरूरतों की निगरानी कौन कर रहा है? अगर बच्चों को पढ़ाने के लिए शिक्षक ही पर्याप्त नहीं हैं, श्रवण बाधित बच्चों के लिए साइन लैंग्वेज इंटरप्रेटर नहीं है और एक कमरे में दो-तीन कक्षाएं चल रही हैं, तो फिर जिम्मेदारी तय करने का समय कब आएगा? बच्चों ने कहा
सरकार से 15 मांगें
विद्यार्थियों ने सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग से 15 प्रमुख मांगें रखी हैं। इनमें सभी 26 शिकायतों की स्वतंत्र जांच, विद्यार्थियों से सीधे भारतीय सांकेतिक भाषा में बातचीत, मूक-बधिर और साइन लैंग्वेज प्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति, इंटरप्रेटर की व्यवस्था, परिवहन और हॉस्टल सुविधा, कंप्यूटर लैब व खेल गतिविधियों तक पहुंच, बेहतर भोजन-सफाई और परीक्षा व्यवस्था शामिल हैं। 190 बच्चे, सिर्फ 3 शिक्षक?
शासकीय दृष्टि बाधित उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में विद्यार्थियों ने शिक्षकों की भारी कमी का आरोप लगाया।
बच्चों का सवाल: जब शिक्षक ही पर्याप्त नहीं हैं, तो पढ़ाई कैसे होगी? मूक-बधिर विद्यार्थियों की 26 शिकायतें
