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क्या एमपी में अभी और तेज होंगे आंदोलन:एक महीने में व्यापारी-किसान, कर्मचारी-छात्र सब उतरे सड़क पर, असंतोष बढ़ा या राजनीति हो रही

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल इन दिनों धरना-प्रदर्शनों का शहर बन चुकी है। बीते एक महीने में शायद ही कोई ऐसा दिन बीता हो, जब राजधानी की सड़कों पर कोई प्रदर्शन न हुआ हो। व्यापारी, कर्मचारी, युवा, छात्र, किसान से लेकर स्कूली बच्चों (जेन-जी और जेन-अल्फा) तक, समाज का हर तबका अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतर चुका है। कई समूहों ने अब भी अलग-अलग जगहों पर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। इनमें से कई प्रदर्शनों के कारण भोपाल बंद तक की स्थिति बनी। महज एक महीने में अचानक ऐसा क्या हुआ कि समाज का हर तबका सड़कों पर आ गया? लोगों की समस्याएं क्या हैं और उनमें इतना असंतोष क्यों फैला? क्या इन प्रदर्शनों के पीछे विपक्षी पार्टियां हैं या इसकी कोई दूसरी वजह है? राजनीतिक विशेषज्ञ इन आंदोलनों को किस नजर से देखते हैं और इनके राजनीतिक मायने क्या हैं? दैनिक भास्कर में संडे बिग स्टोरी में आज इसी की बात… पहले पढ़िए, बीते एक महीने में एमपी में कौन-कौन से प्रदर्शन हुए किसान आंदोलन: तोड़े बैरिकेड्स, सहमति बनी तब माने अगस्त की शुरुआत ही भोपाल में बड़े किसान प्रदर्शन से हुई। मूंग की सरकारी खरीदी की सीमा बढ़ाने, MSP पर खरीदी और सोसायटियों में खाद वितरण की ई-टोकन व्यवस्था खत्म करने की मांग को लेकर 19 से अधिक किसान संगठनों ने भोपाल कूच किया। सीहोर, हरदा और नर्मदापुरम से किसान ट्रैक्टर लेकर राजधानी पहुंचे और सीएम हाउस की ओर बढ़ने लगे। इस दौरान किसानों ने कई जगह पुलिस के बैरिकेड्स तोड़ दिए। देर रात सरकार ने किसान संगठनों के साथ बैठक की। मांगों पर सहमति बनने के बाद प्रदर्शन खत्म हुआ। व्यापारी आंदोलन: सीलिंग के विरोध में सड़क पर उतरे भोपाल में बीते एक महीने का सबसे बड़ा विरोध व्यापारियों का रहा। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद नगर निगम ने रिहायशी इलाकों में व्यावसायिक गतिविधियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की और 6,500 से ज्यादा दुकानदारों को नोटिस दिए। सीलिंग की कार्रवाई के विरोध में 5 हजार से ज्यादा व्यापारियों ने गांधी प्रतिमा के सामने रामधुन गाई। इसके बाद 1 सितंबर को भोपाल बंद का आह्वान किया गया। बंद के दौरान 2 हजार से ज्यादा व्यापारियों ने रोशनपुरा चौराहे पर बैरिकेड्स तोड़कर सीएम हाउस की ओर कूच किया। व्यापारियों का प्रदर्शन 20 अगस्त से 3 सितंबर तक जारी रहा। युवाओं का प्रदर्शन: नौकरी के लिए खून से लिखी चिट्‌ठी भोपाल में शिक्षक भर्ती के चयनित अभ्यर्थियों का आंदोलन भी लगातार जारी रहा। 20 अगस्त से वर्ग-1, वर्ग-2 और वर्ग-3 शिक्षक भर्ती के चयनित अभ्यर्थी नीलम पार्क में धरने पर बैठे हैं। अभ्यर्थी पद बढ़ाने और भर्ती प्रक्रिया में सुधार की मांग कर रहे हैं। प्रदर्शन के दौरान कई अभ्यर्थी अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर भी बैठे। कुछ की तबीयत बिगड़ने की जानकारी सामने आई। सरकार का ध्यान अपनी मांगों की ओर खींचने के लिए अभ्यर्थियों ने मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री के नाम खून से पत्र लिखकर भी विरोध जताया। छात्रों का आंदोलन: नर्सिंग से लेकर स्कूल तक विरोध भोपाल में अगस्त के दौरान नर्सिंग छात्रों से लेकर स्कूली बच्चों तक ने प्रदर्शन किए। 11-12 अगस्त को नर्सिंग छात्रों ने परीक्षा, रिजल्ट, रजिस्ट्रेशन और डिग्री में देरी के विरोध में धरना दिया। इसी दौरान तीन छात्र छह मंजिला निर्माणाधीन बिल्डिंग की छत पर चढ़ गए। 18-19 अगस्त को DMS को KVS में विलय करने के विरोध में 300 से 400 स्कूली बच्चों ने रैली निकाली। Gen Z और Gen Alpha के बच्चों ने अभिभावकों के साथ स्कूल बचाने और बुनियादी सुविधाओं को लेकर प्रदर्शन किया। कर्मचारियों का आंदोलन: धरना देकर समान वेतन मांगा भोपाल में आउटसोर्स, संविदा और नियमित कर्मचारियों ने भी अलग-अलग मांगों को लेकर प्रदर्शन किए। 2 अगस्त को बिजली विभाग के हजारों आउटसोर्स और ठेका कर्मचारियों ने आंदोलन किया। नौकरी की सुरक्षा, न्यूनतम वेतन और समान काम-समान वेतन की मांग को लेकर प्रदर्शन किया। करीब 3 हजार स्वास्थ्यकर्मियों ने भी विरोध जताया। 18 अगस्त को लिपिक कर्मचारियों ने CPCT, वेतन विसंगति और ई-अटेंडेंस के विरोध में प्रदर्शन किया। वहीं, 24 अगस्त से 5 हजार से ज्यादा पेसा मोबिलाइजर्स सेवा बहाली की मांग को लेकर अंबेडकर पार्क में धरने पर हैं। अब तीन एक्सपर्ट से समझिए, आखिर इन आंदोलनों के पीछे वजह क्या है? प्रभावितों को लगा सरकार समाधान नहीं कर रही सीनियर जर्नलिस्ट और राजनीतिक विश्लेषक सुरेश शर्मा का मानना है कि भोपाल में अलग-अलग वर्गों के आंदोलनों की वजहें भले अलग हों, लेकिन ज्यादातर का आधार रोजगार, आय, नौकरी की सुरक्षा और प्रशासनिक फैसलों से जुड़ी नाराजगी है। वे कहते हैं कि किसानों का मुद्दा फसल खरीदी और MSP से जुड़ा है। कर्मचारियों की मांग नौकरी और वेतन को लेकर है। युवाओं का असंतोष भर्ती और पदों को लेकर है, जबकि व्यापारियों का विरोध सीधे उनके कारोबार पर असर डालने वाली सीलिंग कार्रवाई से जुड़ा है। यानी मुद्दे अलग-अलग हैं, लेकिन सभी मामलों में प्रभावित वर्ग को लगता है कि उसकी समस्या का समाधान सरकार या प्रशासन के स्तर पर नहीं हो रहा। यही वजह है कि लोग अपनी बात रखने के लिए सड़क का रास्ता अपना रहे हैं। विपक्ष की भूमिका नहीं, सबकी मांगें अलग-अलग सुरेश शर्मा के मुताबिक, इन प्रदर्शनों की शुरुआत ज्यादातर स्थानीय और वास्तविक मुद्दों से हुई है। इनमें विपक्ष की सीधी भूमिका नजर नहीं आती। हालांकि आंदोलन शुरू होने के बाद विपक्षी दलों और नेताओं ने इन मुद्दों को सरकार के खिलाफ राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश जरूर की है। सीधे राजनीतिक असंतोष कहना सही नहीं सुरेश शर्मा आगे कहते हैं कि राजनीतिक तौर पर चिंता की बात यह है कि असंतोष किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं है। किसान, कर्मचारी, व्यापारी और युवा अलग-अलग मुद्दों पर सरकार से जवाब मांग रहे हैं। रेश शर्मा के मुताबिक, लंबे समय तक सत्ता में रहने वाली सरकारों को ऐसे आंदोलनों को लेकर ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत होती है।
किसी आंदोलन में समस्या के समाधान का आश्वासन दिया जाता है तो उसे पूरा करना भी जरूरी है। अगर आश्वासन पूरा नहीं होता, तो यही नाराजगी दोबारा आंदोलन में बदल सकती है। हालांकि मौजूदा प्रदर्शनों को सीधे एंटी-इन्कम्बेंसी कहना भी सही नहीं होगा। अभी ये मुख्य रूप से अपनी आवश्यकताओं और मांगों की पूर्ति के लिए किए जा रहे आंदोलन हैं। मध्य प्रदेश में किसान और युवाओं के प्रदर्शन के बाद सरकार को कुछ फैसलों में बदलाव करना पड़ा है। वहीं, व्यापारियों की सीलिंग कार्रवाई में भी ढील दी जा रही है। सरकारी फैसलों का जमीन पर असर अलग सीनियर जर्नलिस्ट सरमन नगेले का मानना है कि कई बार सरकार या प्रशासन का कोई फैसला नियमों के तहत लिया जाता है, लेकिन जब उसका सीधा असर किसी वर्ग के कारोबार, नौकरी या रोजमर्रा के जीवन पर पड़ता है तो प्रभावित लोग अपनी मांग मनवाने के लिए प्रदर्शन का सहारा लेते हैं। उनके मुताबिक, मूंग की सरकारी खरीद, भोपाल में व्यापारियों की सीलिंग कार्रवाई और शिक्षक भर्ती में पद बढ़ाने की मांग इसके उदाहरण हैं। स्थानीय स्तर पर सुनवाई की कमी भी बड़ी वजह सोशल एक्टिविस्ट कुंज बिहारी तिवारी का मानना है कि इस समय राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर लोगों में आक्रोश बढ़ रहा है।
उनके मुताबिक, स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक अधिकारियों से जुड़ी शिकायतें और भ्रष्टाचार के आरोप लगातार सामने आते हैं। लोग अपनी शिकायतें और मांगें रखने के बावजूद समय पर समाधान नहीं मिलने की स्थिति में सड़क पर उतरते हैं। ये आंदोलन आगे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकते हैं सुरेश शर्मा के मुताबिक, फिलहाल भोपाल में चल रहे आंदोलनों को सरकार के खिलाफ किसी एकजुट राजनीतिक आंदोलन के तौर पर देखना जल्दबाजी होगी। इनकी शुरुआत अलग-अलग स्थानीय और वर्ग विशेष की समस्याओं से हुई है। हालांकि, अगर समय रहते इन मांगों का समाधान नहीं हुआ तो यही स्थानीय मुद्दे मिलकर सरकार के खिलाफ बड़ा नैरेटिव बना सकते हैं। विपक्ष को भी इन मुद्दों पर सरकार को घेरने का मौका मिल रहा है। रोजगार, कारोबार, किसान और कर्मचारी जैसे मुद्दों का समय रहते समाधान करना होगा। ऐसा नहीं हुआ तो अलग-अलग जगहों का स्थानीय असंतोष आगे चलकर बड़े राजनीतिक नैरेटिव में बदल सकता है। अभी सवाल यह नहीं है कि ये आंदोलन किस राजनीतिक दल के हैं, बल्कि यह है कि इतने अलग-अलग वर्गों को एक साथ सड़क पर आने की जरूरत क्यों महसूस हो रही है।

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