मध्य प्रदेश में मंदाकिनी नदी खतरे के निशान से ऊपर बह रही है। नर्मदा भी उफान पर है। वहीं, छतरपुर, सतना, मंडला-मैहर समेत कई जिलों में बाढ़ के हालात हैं। छतरपुर के कुटनी और जबलपुर के बरगी बांधों से पानी छोड़ा जा रहा है। भोपाल में गुरुवार-शुक्रवार की दरमियानी रात बारिश हुई। मौसम विभाग ने प्रदेश में अगले 48 घंटे के लिए भारी बारिश की चेतावनी जारी की है। प्रदेश में अब तक 29.2 इंच बारिश हो चुकी है, जो कोटे की 78% है। गुरुवार को ट्रफ और स्पष्ट निम्न दवाब का क्षेत्र एक्टिव रहा। इस वजह से प्रदेश के पूर्वी हिस्से में तेज बारिश हुई। यह सिस्टम शुक्रवार को आगे बढ़ेगा। मौसम विशेषज्ञ शैलेंद्र कुमार नायक ने बताया कि अगले दो दिन तक भोपाल, उज्जैन, सागर, नर्मदापुरम, ग्वालियर और चंबल संभाग में अति भारी या भारी बारिश होने का अनुमान है। इन जिलों के लिए अलर्ट मौसम विभाग ने शिवपुरी, गुना, राजगढ़, निवाड़ी, टीकमगढ़, छतरपुर, सागर, दमोह, नर्मदापुरम में अति भारी बारिश का ऑरेंज अलर्ट जारी किया है। भोपाल, उज्जैन, ग्वालियर, श्योपुर, भिंड, दतिया, पन्ना, सतना, रीवा, अशोकनगर, विदिशा, रायसेन, छिंदवाड़ा, बैतूल, सीहोर, शाजापुर, देवास, आगर-मालवा और मंदसौर में भारी बारिश की चेतावनी है। इंदौर, धार, आलीराजपुर, बुरहानपुर, बड़वानी, खंडवा, खरगोन, झाबुआ, नीमच, रतलाम, हरदा, मुरैना, जबलपुर, कटनी, सिवनी, नरसिंहपुर, बालाघाट, मंडला, डिंडौरी, पांढुर्णा, सीधी, सिंगरौली, मऊगंज, मैहर, शहडोल, उमरिया और अनूपपुर में कहीं तेज तो कहीं हल्की बारिश हो सकती है। चित्रकूट में मंदाकिनी, मंडला में नर्मदा उफान पर गुरुवार को चित्रकूट में मंदाकिनी का जलस्तर 138.52 मीटर के साथ डेंजर लेवल के करीब पहुंच गया। SDERF ने करीब 100 लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया। छतरपुर में बारिश और बाढ़ के खतरे को देखते हुए सभी स्कूलों में छुट्टी कर दी गई। लवकुशनगर की गुढ़ाकला ग्राम पंचायत में मूसलाधार बारिश से कच्चा मकान ढह गया। मैहर में पुलों के ऊपर से पानी बहने के कारण मुकुंदपुर रोड बंद रहा। मंडला में नर्मदा का जलस्तर 436.1 मीटर पहुंच गया। जबलपुर में बरगी बांध का जलभराव 93.33% होने के बाद 5 गेट करीब एक मीटर खोले गए। इससे नर्मदा घाटों पर 4 फीट तक पानी बढ़ने की संभावना है। तस्वीरों में देखिए, प्रदेश में बारिश के हालत… दो दिन दिखेगा असर मौसम विशेषज्ञों की मानें तो 4 और 5 सितंबर को सिस्टम की सक्रियता ज्यादा बढ़ेगी। 6 और 7 सितंबर को भी ग्वालियर-चंबल संभाग में तेज बारिश होने का अनुमान है। प्रदेश में अब तक 741.2 मिमी यानी 29.2 इंच बारिश हो चुकी है। हालांकि, यह अब तक की सामान्य बारिश 31.8 इंच (808.2 मिमी) की तुलना में 2.6 इंच कम है। वहीं, ओवरऑल 8 प्रतिशत कम पानी गिरा है। पूर्वी हिस्से में 1% और पश्चिमी हिस्से में औसत से 17% बारिश कम हुई है। 34 जिलों में 1% से 23% तक कम बारिश इस मानसूनी सीजन में मध्य प्रदेश के पूर्वी हिस्से- जबलपुर, रीवा, सागर और शहडोल संभाग में 1% तक कम बारिश हुई है। बालाघाट, डिंडौरी, छिंदवाड़ा, दमोह, जबलपुर, कटनी, नरसिंहपुर, निवाड़ी, पांढुर्णा, रीवा, सागर, सिवनी, टीकमगढ़, डिंडौरी, निवाड़ी में 1% से 23% तक कम बारिश हुई है। हालांकि, बीते एक सप्ताह से यहां के कई जिलों में बाढ़ के हालात बने हुए हैं। इससे सीजन में पहली बार पूर्वी हिस्सा आंकड़ों में बेहतर रहा है। वहीं, पश्चिमी हिस्से के आगर-मालवा, आलीराजपुर, अशोकनगर, बैतूल, दतिया, देवास, धार, हरदा, इंदौर, झाबुआ, मुरैना, मंदसौर, नर्मदापुरम, नीमच, बड़वानी, खंडवा, रायसेन, रतलाम, सीहोर, शाजापुर, श्योपुर, शिवपुरी, उज्जैन और विदिशा में औसत से 6% से 54% कम पानी गिरा है। 21 जिलों में ज्यादा बारिश मौसम विभाग के मुताबिक, अनूपपुर, छतरपुर, मैहर, मंडला, मऊगंज, निवाड़ी, पन्ना, सतना, शहडोल, सीधी, सिंगरौली, उमरिया, भिंड, भोपाल, बुरहानपुर, दतिया, गुना, ग्वालियर, खरगोन, राजगढ़ और शिवपुरी में ही औसत से ज्यादा बारिश दर्ज की गई। मैप से समझें, 4 दिन ऐसा रहेगा मौसम जून में कम, जुलाई-अगस्त में अच्छी बारिश मौसम विभाग के अनुसार, मध्य प्रदेश में जून में 14% कम बारिश हुई थी। जुलाई के शुरुआती दिनों में तेज बारिश होने से यह आंकड़ा बढ़ गया। इसके बाद मानसून दो बार ब्रेक हुआ और कई दिन तक बारिश नहीं हुई। जून के आखिरी सप्ताह में फिर से स्ट्रॉन्ग सिस्टम एक्टिव हो गया। इसके बावजूद 13 प्रतिशत कम बारिश हुई है। हालांकि, जुलाई और फिर अगस्त का भी कोटा फुल हो गया है लेकिन जून की भरपाई नहीं हो पाई। अब तक प्रदेश में 8 प्रतिशत कम पानी गिरा है। बता दें कि प्रदेश की सामान्य बारिश 37.3 इंच है। भोपाल, इंदौर, जबलपुर और ग्वालियर जिले की सामान्य बारिश 38 से 39 इंच तक है। एमपी के 5 बड़े शहरों में बारिश का रिकॉर्ड भोपाल में 4 साल से कोटे से ज्यादा बारिश भोपाल में सितंबर महीने की औसत बारिश 7 इंच है, लेकिन पिछले 4 साल से कोटे से ज्यादा पानी बरस रहा है। ओवरऑल रिकॉर्ड की बात करें तो साल 1961 में पूरे सितंबर माह में 30 इंच से ज्यादा पानी गिरा था। वहीं, 24 घंटे में सर्वाधिक 9.2 इंच बारिश का रिकॉर्ड 2 सितंबर 1947 को बना था। राजधानी में इस महीने औसत 8 से 10 दिन बारिश होती है। वहीं, दिन में तापमान 31.3 डिग्री और न्यूनतम तापमान 22.2 डिग्री सेल्सियस तक रहता है। इंदौर में सितंबर में रिकॉर्ड 30 इंच बारिश इंदौर में सितंबर महीने में रिकॉर्ड 30 इंच बारिश हो चुकी है। यह ओवरऑल रिकॉर्ड साल 1954 में बना था। वहीं, 20 सितंबर 1987 को 24 घंटे में पौने 7 इंच पानी गिर चुका है। इस महीने इंदौर में औसत 8 दिन बारिश होती है, लेकिन इस बार 15 या इससे अधिक दिन तक बारिश हो सकती है। ग्वालियर में वर्ष 1990 में गिरा था 25 इंच पानी ग्वालियर में सितंबर 1990 में 647 मिमी यानी साढ़े 25 इंच बारिश हुई थी। यह सितंबर में मासिक बारिश का ओवरऑल रिकॉर्ड है। वहीं, 7 सितंबर 1988 को 24 घंटे में साढ़े 12 इंच बारिश हुई थी। सितंबर में ग्वालियर की औसत बारिश करीब 6 इंच है, लेकिन पिछले चार साल से इससे अधिक बारिश हो रही है। ग्वालियर में इस बार अगस्त में ही बारिश का कोटा पूरा हो गया। ऐसे में सितंबर में जितनी भी बारिश होगी, वह बोनस की तरह ही रहेगी। जबलपुर में 24 घंटे में साढ़े 8 इंच बारिश का रिकॉर्ड सितंबर महीने में जबलपुर में भी मानसून जमकर बरसता है। 20 सितंबर 1926 को जबलपुर में 24 घंटे के अंदर साढ़े 8 इंच बारिश का रिकॉर्ड है। वहीं, पूरे महीने में 32 इंच बारिश साल 1926 में हो चुकी है। यहां महीने में औसत 10 दिन बारिश होती है। वहीं, सामान्य बारिश साढ़े 8 इंच है। पिछले 3 साल से सामान्य से ज्यादा पानी गिर रहा है। उज्जैन में 1981 में पूरे मानसून का कोटा हो गया था फुल उज्जैन की सामान्य बारिश 34.81 इंच है, लेकिन वर्ष 1961 में सितंबर की बारिश ने ही पूरे सीजन की बारिश का कोटा फुल कर दिया था। इस महीने 1089 मिमी यानी करीब 43 इंच पानी गिरा था। वहीं, 24 घंटे में सर्वाधिक साढ़े 5 इंच बारिश का रिकॉर्ड 27 सितंबर 1961 को बना था। सितंबर महीने में उज्जैन की सामान्य बारिश पौने 7 इंच है, लेकिन पिछले दो साल से 12 इंच से ज्यादा बारिश हो रही है। इस महीने औसत 7 दिन बारिश होती है।
ये खबर भी पढ़ें… हिमालय के ग्लेशियर सिर्फ बढ़ते तापमान से नहीं जूझ रहे हिमालय के ग्लेशियरों पर अब सिर्फ बढ़ते तापमान का खतरा नहीं है। हवा में मौजूद कालिख और धूल भी बर्फ के पिघलने की रफ्तार बढ़ा रही है। गाड़ियों, कोयला बिजलीघरों, फैक्ट्रियों, ईंट भट्ठों, घरों के चूल्हों और जंगलों व खेतों में लगने वाली आग से निकलने वाले कण हवा के साथ ऊंचे पहाड़ों तक पहुंचते हैं और ग्लेशियरों की सफेद सतह पर जम जाते हैं। पढे़ं पूरी खबर…
