मध्यप्रदेश की सियासत में समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर एक बार फिर विवाद उठा है। ‘जंग-ए-आज़ादी में उलमा की कुर्बानी’ कार्यक्रम के समापन के अवसर पर राजधानी भोपाल के बुधवारा चौराहे पर आयोजित एक कार्यक्रम में कांग्रेस के दिग्गज नेताओं ने शिरकत की। इस मंच से नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने बड़ा ऐलान करते हुए कहा उस सरकार के मंसूबे देखिए जिसे गांव-गांव तक इस कानून को तक ले जाना है। वो बात अलग है कि बहुमत में उन्होंने ये काला कानून पास करा लिया। लेकिन, आने वाले समय में जब सरकार आएगी तो यूसीसी को खत्म किया जाएगा। आरिफ मसूद ने खोली ‘मोहब्बत की दुकान’ विधायक आरिफ मसूद द्वारा आयोजित आज़ादी के पखवाड़े के समापन कार्यक्रम में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष (PCC Chief) जीतू पटवारी और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार विशेष रूप से उपस्थित रहे। इस दौरान अतिथियों द्वारा बच्चों को नकद पुरस्कार देकर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए जीतू पटवारी ने विधायक आरिफ मसूद के प्रयासों की जमकर सराहना की। पटवारी ने कहा, “नफरत के इस दौर में आरिफ मसूद जी ने आज़ादी का पखवाड़ा मनाकर राहुल गांधी जी की ‘मोहब्बत की दुकान’ को सही मायनों में खोला है।” मप्र के यूसीसी में मुख्य प्रावधान विवाह और बहुविवाह पर पूर्ण प्रतिबंध मध्य प्रदेश में लागू इस संहिता के अंतर्गत विवाह की एक समान व्यवस्था सुनिश्चित की गई है जिसके तहत राज्य में बहुविवाह को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया गया है। कानून प्रभावी होने के बाद कोई भी व्यक्ति अपने पहले जीवनसाथी के जीवित रहते या उससे कानूनी तलाक लिए बिना दूसरा विवाह नहीं कर सकता है। यह नियम सभी धर्मों और समुदायों पर समान रूप से लागू होता है, जिससे वैवाहिक अधिकारों में एकरूपता और पारदर्शिता सुनिश्चित हो सके। विवाह एवं विवाह विच्छेद का अनिवार्य पंजीकरण संहिता के प्रावधानों के अनुसार राज्य के भीतर होने वाले प्रत्येक विवाह और विवाह विच्छेद (तलाक) का सरकारी रिकॉर्ड में पंजीकरण कराना अनिवार्य कर दिया गया है। तय समय सीमा के भीतर निर्धारित प्राधिकारी के पास इस प्रक्रिया को पूरा करना होगा और पंजीकरण न कराने की स्थिति में संबंधित पक्षों पर दंडात्मक कार्रवाई अथवा आर्थिक जुर्माने का प्रावधान किया गया है। इसका उद्देश्य वैवाहिक धोखाधड़ी को रोकना और कानूनी अधिकारों को मजबूत करना है। लिव-इन रिलेशनशिप के लिए कड़े नियम बिना विवाह के साथ रहने वाले जोड़ों यानी लिव-इन रिलेशनशिप के लिए इस संहिता में विशेष और कड़े नियम तय किए गए हैं। ऐसे जोड़ों को एक निश्चित अवधि के भीतर रजिस्ट्रar के समक्ष अपने संबंध की घोषणा कर पंजीकरण कराना आवश्यक होगा। यदि लिव-इन पार्टनर्स में से किसी की भी आयु 21 वर्ष से कम है, तो इस पंजीकरण की सूचना उनके माता-पिता या अभिभावकों को दी जाएगी। नियमों का उल्लंघन करने या पंजीकरण न कराने पर जेल और जुर्माने दोनों का प्रावधान है। उत्तराधिकार और संपत्ति में समान अधिकार संपत्ति के उत्तराधिकार के मामलों में ऐतिहासिक सुधार करते हुए इस संहिता में बेटे और बेटियों को पूरी तरह से समान धरातल पर ला खड़ा किया गया है। पैतृक एवं स्व-अर्जित संपत्ति पर अब बेटियों का भी उतना ही कानूनी हक होगा जितना बेटों का होता है, चाहे वे विवाहित हों या अविवाहित। इसके साथ ही माता-पिता की संपत्ति पर पत्नी और बच्चों के अधिकारों को भी इस प्रकार सुदृढ़ किया गया है जिससे किसी भी प्रकार के लैंगिक भेदभाव की गुंजाइश न बचे। बच्चों के अधिकारों का संरक्षण और वैधानिकता बच्चों के हितों को सर्वोपरि रखते हुए संहिता ने समाज में उनके कानूनी अधिकारों को अत्यधिक मजबूत किया है। नए प्रावधानों के तहत अब लिव-इन रिलेशनशिप, सरोगेसी या कानूनी रूप से गोद लिए गए बच्चों को भी माता-पिता की संपत्ति और भरण-पोषण में जैविक बच्चों की तरह ही पूरे अधिकार प्राप्त होंगे। कानून में बच्चों के प्रति होने वाले किसी भी प्रकार के सामाजिक या कानूनी भेदभाव को समाप्त करने का स्पष्ट प्रयास किया गया है। पारंपरिक कुप्रथाओं पर प्रतिबंध विवाह विच्छेद और सामाजिक कुप्रथाओं से जुड़े मामलों में महिलाओं के शोषण को रोकने के लिए इस संहिता में कड़े कदम उठाए गए हैं। तीन तलाक और निकाह हलाला जैसी प्रथाओं को कानूनन अमान्य ठहराते हुए पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया गया है। इनके स्थान पर केवल न्यायालय और निर्धारित वैधानिक प्रक्रियाओं के माध्यम से ही विवाह विच्छेद को मान्यता दी जाएगी ताकि समाज के हर वर्ग की महिलाओं को गरिमापूर्ण जीवन और समान सामाजिक न्याय मिल सके। जनजातीय समाज को विशेष छूट राज्य की समृद्ध सांस्कृतिक विविधता को बनाए रखने के लिए इस संहिता में मध्य प्रदेश की अधिसूचित जनजातियों (Scheduled Tribes) को विशेष रूप से रियायत दी गई है। संविधान के दायरे में आने वाले आदिवासी समाजों के पारंपरिक नियमों, प्रथाओं और उनकी विशिष्ट जीवन शैली को देखते हुए उन्हें इस समान नागरिक संहिता के कड़े प्रावधानों से पूरी तरह बाहर (मुक्त) रखा गया है, ताकि उनकी रीति-रिवाज अक्षुण्ण बनी रहें।
