राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि किसी व्यक्ति की वर्तमान सामाजिक या आर्थिक स्थिति देखकर उसके भविष्य की सीमा तय नहीं की जा सकती। श्रमिक का बच्चा वैज्ञानिक और चमड़े का काम करने वाले परिवार का बच्चा संत बन सकता है। समाज को हर बच्चे को आगे बढ़ने का अवसर देना चाहिए। आर्थिक परिस्थितियां किसी बच्चे की अंतिम पहचान नहीं होनी चाहिए। संत शिरोमणि रविदास जी की 650वीं जयंती के अवसर पर भोपाल के रवीन्द्र भवन में आयोजित विराट श्रम साधक संगम में होसबाले ने श्रम की प्रतिष्ठा, सामाजिक समरसता और समाज के कमजोर वर्गों को मजबूत बनाने पर विस्तार से बात रखी। कार्यक्रम में एक हजार से अधिक श्रम साधक और समाजजन शामिल हुए। उन्होंने कहा कि समाज की वास्तविक शक्ति तभी सामने आती है, जब हर वर्ग को सम्मान, सहभागिता और आगे बढ़ने का अवसर मिले। 52 तरह के काम करने वालों तक पहुंच, 40 मिलन चल रहे कार्यक्रम में श्रम साधक कार्य का प्रतिवेदन प्रस्तुत करते हुए विक्रम सिंह ने बताया कि समाज का कोई वर्ग वंचित न रहे, इसके लिए श्रम से जुड़े लोगों के बीच संपर्क और संवाद शुरू किया गया। इस दौरान 52 प्रकार के श्रम कार्य सामने आए। इन सभी तक लगातार पहुंच बनाने के लिए मिलन की व्यवस्था विकसित की गई। वर्तमान में भोपाल में करीब 40 श्रम साधक मिलन संचालित हो रहे हैं। इन मिलनों का उद्देश्य केवल लोगों को एक जगह इकट्ठा करना नहीं है। यहां आत्मीय संबंध विकसित करने, सुख-दुख में सहभागी बनने और समाज के प्रति दायित्व की भावना मजबूत करने पर जोर है। मिलन सिर्फ मिलने या मनोरंजन के लिए नहीं श्रम साधक मिलन से जुड़े अवतार सिंह और रामस्वरूप ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि इन मिलनों में केवल औपचारिक मुलाकात या मनोरंजन नहीं होता। श्रम साधक एक-दूसरे के सुख-दुख में सहभागी बनते हैं और अपने काम के प्रति निष्ठा मजबूत करते हैं। इन बैठकों में नशे से दूर रहने, परिवार और बच्चों के भविष्य तथा जरूरत के समय एक-दूसरे के साथ खड़े होने जैसे मुद्दों पर भी चर्चा होती है। होसबाले बोले- मिलन अंतिम लक्ष्य नहीं, बदलाव का माध्यम होसबाले ने कहा कि मिलन अपने आप में अंतिम लक्ष्य नहीं है। यह मिलने की शुरुआत है। नियमित संपर्क से परिचय संबंध में और संबंध आत्मीयता में बदलता है। यही आत्मीयता आगे चलकर समाज में सकारात्मक बदलाव का माध्यम बन सकती है। उन्होंने कहा कि जिनके पास संसाधन हैं और जिनके पास उनकी कमी है, उनके बीच समन्वय जरूरी है। समाज के समर्थ वर्ग अपनी क्षमता के अनुसार सहयोग करें और जरूरतमंद लोग भी अपने आत्मविश्वास व परिश्रम को बनाए रखें। सहयोग की यह प्रक्रिया समाज को मजबूत बनाती है। ‘निर्बल के बल राम’… कमजोर का सहारा बने समाज सरकार्यवाह ने कहा कि श्रम साधना करने वाले लोग कई बार सामाजिक दृष्टि से निर्बल हो जाते हैं। ऐसे में सवाल है कि निर्बल का बल कौन बनेगा। उन्होंने कहा- “निर्बल के बल राम।” यहां राम को समाज की सामूहिक शक्ति के अर्थ में बताते हुए उन्होंने कहा कि सक्षम लोगों को आगे आकर कमजोर व्यक्ति का सहारा बनना चाहिए। शिक्षा-चिकित्सा-रोजगार में सहयोग की जरूरत होसबाले ने सामाजिक समरसता को केवल आपसी संपर्क तक सीमित नहीं माना। उन्होंने कहा कि जिन वर्गों को शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के अवसरों की जरूरत है, उनके लिए व्यावहारिक सहयोग की व्यवस्था भी विकसित करनी होगी। उन्होंने बच्चों के लिए ट्यूशन और शिक्षा की सुविधा, चिकित्सा व्यवस्था तथा रोजगार के साधन उपलब्ध कराने की दिशा में काम करने की जरूरत बताई। उनके अनुसार जिनके पास संसाधन हैं और जिनके पास इनकी कमी है, उनके बीच समन्वय से समाज की सामूहिक शक्ति बढ़ सकती है। श्रम को छोटा समझना दृष्टि का दोष होसबाले ने कहा कि हमारे संतों ने कर्म को पूजा माना है। शरीर से किया जाने वाला श्रम भी आराधना का एक रूप है। उन्होंने महाभारत में धर्मव्याध की कथा का उदाहरण देते हुए कहा कि धर्म का संबंध किसी विशेष काम या सामाजिक पहचान से नहीं है। व्यक्ति अपने कर्म को पूरी निष्ठा और कर्तव्यबोध के साथ करे, यही महत्वपूर्ण है। उन्होंने महर्षि वेदव्यास का उदाहरण देते हुए कहा कि महानता जन्म या पेशे से तय नहीं होती। इसलिए किसी व्यक्ति को उसके काम के आधार पर छोटा समझना दृष्टि का दोष है। शरीर से श्रम करने पर भी जोर सरकार्यवाह ने कहा कि समाज में श्रम की प्रतिष्ठा बढ़नी चाहिए और प्रत्येक व्यक्ति को जीवन में किसी न किसी रूप में शारीरिक श्रम करना चाहिए। शरीर से काम करने वाले और मस्तिष्क से काम करने वाले दोनों राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया के समान रूप से महत्वपूर्ण अंग हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय राष्ट्र की अवधारणा एक जीवंत राष्ट्रपुरुष जैसी है, जिसके हजारों नेत्र और लाखों हाथ हैं। कोई मस्तिष्क से काम करता है तो कोई हाथों से, दोनों मिलकर राष्ट्र की जीवन-व्यवस्था चलाते हैं। इसलिए किसी के काम को कमतर समझने का आधार नहीं है। नशामुक्ति और महिला सुरक्षा भी एजेंडे में होसबाले ने महिला सुरक्षा को भी समाज की मजबूती से जोड़ा और कहा कि समाज के प्रत्येक वर्ग को सुरक्षित और सम्मानपूर्ण वातावरण मिलना जरूरी है। उन्होंने परिवारों को संस्कारित बनाने और श्रम साधकों के बच्चों के लिए बेहतर वातावरण तैयार करने पर भी जोर दिया। उचित अवसर मिलने पर यही बच्चे प्रोफेसर, वैज्ञानिक और दूसरे क्षेत्रों के विशेषज्ञ बन सकते हैं। रविदास जी का जीवन ही उनका संदेश रविदास जयंती के संदर्भ में होसबाले ने कहा कि संत रविदास जी का स्मरण केवल एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता और कर्मनिष्ठ जीवन के प्रेरक के रूप में किया जाता है। उन्होंने कहा कि संत रविदास जी ने केवल उपदेश नहीं दिए, बल्कि अपने जीवन में कथनी और करनी की एकरूपता दिखाई। उनका जीवन ही उनके संदेश का प्रमाण है। समाज के प्रति दायित्व अमीरी-गरीबी से तय नहीं होसबाले ने कहा कि समाज के प्रति दायित्व केवल आर्थिक रूप से सक्षम व्यक्ति का नहीं है। हर व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार समाज के लिए योगदान कर सकता है। उन्होंने गुजरात के अकाल के दौरान एक वृद्ध महिला द्वारा अपनी क्षमता के अनुसार सुखड़ी देने का उदाहरण सुनाते हुए कहा कि समाज के प्रति जिम्मेदारी केवल अधिक संसाधन रखने वालों की नहीं होती। उन्होंने कहा कि राष्ट्र निर्माण किसी एक व्यक्ति या वर्ग का काम नहीं है। जो व्यक्ति जिस क्षेत्र में है, वहीं से राष्ट्र के लिए योगदान कर सकता है। श्रम साधक मिलन के पीछे भी यही भावना है कि व्यक्ति अपने काम के प्रति निष्ठावान रहे, समाज के प्रति आत्मीयता रखे और अपने कर्तव्य को ईमानदारी से निभाए। कार्यक्रम में मध्यभारत प्रांत के संघचालक अशोक पांडेय, संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले और भोपाल विभाग संघचालक सोमकांत उमालकर मंचासीन रहे। कार्यक्रम का समापन कल्याण मंत्र के साथ हुआ।
