“बरगी बांध बनाते समय अधिकारी आए थे। बोले थे- देश के लिए डैम बन रहा है, आपको अच्छी जगह बसाएंगे, जमीन देंगे। हमने अपना गांव छोड़ दिया… अब 46 साल बाद वन विभाग कह रहा है कि यह जमीन हमारी है और यहां से हट जाओ। अब कहां जाएं… अगर घर तोड़े गए तो हमारी लाशें यहीं मिलेंगी।” यह दर्द है जबलपुर के यादव नगर में रहने वाले उन बरगी बांध विस्थापित परिवारों का, जिन्हें 1980 में डूब क्षेत्र से हटाकर बसाया गया था। आज वही परिवार एक बार फिर बेघर होने के भय में जी रहे हैं। वन विभाग जिस जमीन को अपना बता रहा है, उस पर बसे ग्रामीण इसे अपने साथ दूसरा विस्थापन मानते हुए खुलकर विरोध कर रहे हैं। बरगी बांध बनने के समय जिन परिवारों ने अपने गांव, खेत और घर देश के विकास के नाम पर छोड़ दिए थे, वे अब 46 साल बाद एक बार फिर बेघर होने के डर में जी रहे हैं। बरगी बांध के विस्थापित करीब 100 से अधिक परिवारों का आरोप है कि शासन के निर्देश पर उन्हें सगड़ा-छपनी पंचायत के यादव नगर में बसाया गया था, लेकिन अब वन विभाग उसी जमीन को वन भूमि बताते हुए उन्हें हटाने की तैयारी कर रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि जबरन बेदखल किया गया तो वे गांव नहीं छोड़ेंगे, बल्कि अपनी जान दे देंगे। पढ़िए, यह रिपोर्ट… कई परिवार सगड़ा-छपनी में आकर बसे
ग्रामीणों के अनुसार, शासन के निर्देश पर बकई, लखनपुर, देवरी, मूसाखुर्द, मिड़की, कठोतिया सहित कई गांवों के परिवार सगड़ा-छपनी पंचायत क्षेत्र में आकर बसे। बरगी बांध प्रबंधन ने उस समय विस्थापितों को बही भी जारी की थी, जिसमें उन्हें अपनी सुविधा अनुसार चार जिलों में बसने की अनुमति दी गई थी। सरकारी योजनाओं से घर बने, अब अतिक्रमण बताया जा रहा करीब तीन दशक पहले बसे इन परिवारों को समय-समय पर शासन की योजनाओं का लाभ मिला। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मकान बने, बिजली, सड़क और पेयजल जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध कराई गईं। ग्रामीणों का कहना है कि सब कुछ सामान्य चल रहा था, लेकिन करीब एक साल पहले वन विभाग की टीम गांव पहुंची और पूरी जमीन को वन विभाग की बताते हुए खाली करने की चेतावनी देने लगी। ग्रामीणों का आरोप है कि पिछले एक वर्ष से वन विभाग के कर्मचारी लगातार गांव आकर मकान और जमीन खाली करने का दबाव बना रहे हैं, जिससे पूरा गांव भय के माहौल में जी रहा है। ‘हम कब्जाधारी नहीं, बरगी बांध के विस्थापित हैं’ ग्रामीण जगदीश यादव बताते हैं कि उनका परिवार बरगी बांध बनने के दौरान यहां आकर बसा था। उनके पास बरगी बांध प्रबंधन की बही भी है और पंचायत द्वारा दिए गए दस्तावेज भी हैं। उन्होंने कहा, “अगर यह जमीन वन विभाग की थी तो 46 साल पहले क्यों नहीं बताया गया? सरकार ने पहले हमारी जमीन बांध में ले ली, फिर यहां बसाया और अब दोबारा उजाड़ने आ गई। अगर हमारे घर तोड़े गए तो हमारी लाशें यहीं मिलेंगी।” हम मजदूरी कर परिवार पालते हैं। बार-बार घर बसाने की क्षमता नहीं है। एक साल से लगातार वन विभाग की कार्रवाई के डर में जीवन गुजर रहा है। ‘यह राजस्व भूमि है, वन विभाग की नहीं’ ग्रामीण नारायण सिंह का दावा है कि जिस भूमि पर यादव नगर बसा है, वह मूल रूप से राजस्व रिकॉर्ड में आबादी की जमीन थी। उनके अनुसार 67 हेक्टेयर राजस्व भूमि में से 55 हेक्टेयर वन विभाग को दी गई थी, जबकि शेष करीब 12 हेक्टेयर भूमि पर गांव बसा हुआ है। उन्होंने बताया कि वर्ष 1995 में तत्कालीन सरपंच गीता साहू ने ग्रामीणों को पट्टे भी दिए थे। बावजूद इसके वन विभाग अब पूरी जमीन को अपना बता रहा है। उनका आरोप है कि उनकी निजी कृषि भूमि पर भी वन विभाग ने पौधारोपण कर दिया। लोहे की जालियां और नालियां खोदकर गांव को घेरने का आरोप ग्रामीणों का कहना है कि पिछले एक वर्ष में वन विभाग ने गांव के चारों ओर लोहे की जालियां लगाना और नालियां खोदना शुरू कर दिया है। उन्हें डर है कि आने वाले समय में गांव का रास्ता भी बंद कर दिया जाएगा। ग्रामीण राकेश कुमार ने बताया कि आज भी गांव के बाहर लगे राजस्व विभाग के मुनारे मौजूद हैं, जो बताते हैं कि यह भूमि राजस्व की है। उन्होंने कहा कि अब वन विभाग खेती तक करने से रोक रहा है। वन विभाग का पक्ष: अभी केवल जांच और सीमांकन वन मंडलाधिकारी (डीएफओ) पुनीत सोनकर ने कहा कि फिलहाल किसी को बेदखल करने की कार्रवाई नहीं की जा रही है। वन विभाग केवल अपनी भूमि का सीमांकन और अतिक्रमण की जांच कर रहा है। उन्होंने बताया कि राजस्व अधिकारियों और जिला प्रशासन के साथ संयुक्त रूप से स्थिति स्पष्ट की जाएगी। जो व्यक्ति पात्र होंगे, उनके अधिकार सुरक्षित रखे जाएंगे और केवल अपात्र लोगों के संबंध में नियमानुसार कार्रवाई होगी। डीएफओ ने यह भी कहा कि यदि संबंधित ग्रामीण वास्तव में बरगी बांध के विस्थापित हैं और शासन के रिकॉर्ड में इसका उल्लेख है, तो ऐसे मामलों में नियमानुसार निर्णय लिया जाएगा। अभी पूरे प्रकरण की जांच जारी है। यह खबर भी पढ़ें… 15 साल में पहली बार जून में सूखने लगा बरगी जबलपुर में मानसून की देरी और जून में सामान्य से बेहद कम बारिश का असर अब जलाशयों पर साफ दिखाई देने लगा है। शहर की लाइफलाइन माने जाने वाले बरगी बांध का जलस्तर लगातार घट रहा है। परियट और खंदारी जलाशयों में भी पानी कम होने लगा है। बरगी बांध प्रबंधन के अनुसार बांध का जलस्तर प्रतिदिन करीब 5 सेंटीमीटर घट रहा है।यह खबर भी पढ़ें
———————————————– असंपादित कॉपी बरगी बांध बना तब अधिकारी गांव आए थे। उन्होंने कहा कि हम सबके लिए डैम बन रहा है, यहां से विस्थापित कर हम आपको अच्छी जगह बसाएंगे, खेती के लिए जमीन भी देंगे, पर अब 46 साल अब हमें बेघर किया जा रहा है। यहां घर बन गया है, जैसे-तैसे मजदूरी कर परिवार पाल रहे है, अब वन विभाग कह रहा है कि यह जमीन अतिक्रमण की है, 46 साल पहले याद नहीं आई, हम किसी भी कीमत में यहां से नहीं जाएगें, जबरजस्ती की देखना कि यही पर लटके मिलेगें…ये वो ग्रामीण है, जिन्हें कि बरगी बांध के निर्माण के दौरान 1980 में बरगी के पास से विस्थापित कर सगड़ा-छपनी गांव में बसाया गया था। करीब 100 से अधिक परिवार वाले गांव यादव नगर की जमीन को अब वन विभाग अपनी बताकर भगाने की तैयारी में है। शासन के इस आदेश का ग्रामीण खुलकर अब विरोध कर रहे है। 184 गांव हुए विस्थापित बरगी बांध की कुल लंबाई 5.4 किलोमीटर (5,357 मीटर) और ऊंचाई 69 मीटर है। नर्मदा नदी में बना प्रदेश का सबसे बड़े बरगी बांध को बनाने का काम 1970 में शुरु हुआ जो कि 15 साल में बनकर तैयार हुआ। डैम को बनाने के लिए सरकार ने करीब 184 गांवों को विस्थापित किया जो कि बाद में सिवनी,नरसिंहपुर,मंडला और जबलपुर में जाकर बस गए। शासन के निर्देश पर बकई,लखनपुर,देवरी,मूसाखुर्द,मिड़की,कठोतिया सहित करीब एक दर्जन गांव के ग्रामीण सगड़ा-छपनी गांव से लगी जमीन में आकर बस गए। विस्थापन के दौरान बरगी बांध प्रबंधन ने बही भी जारी की,जिसमें साफ लिखा हुआ था कि अपनी सुविधानुसार आसपास के चार जिलों में जाकर ग्रामीण रह सकते है। 46 साल पहले तीस परिवार बरगी से सकड़ा-छपनी ग्राम पंचायत में आकर बस गए। समय के साथ-साथ शासन की योजनाओं का लाभ मिला। प्रधानमंत्री आवास योजना से ग्रामीणों ने घर बनाए। गांव तक बिजली के खंभे, सड़क और पानी की व्यावस्था की गई। सब कुछ सामान्य चल रहा था। आचानक आ धमका वन विभाग करीब 1 साल पहले आचानक ही वन विभाग की टीम गांव पहुंची और ग्रामीणों के मकान,जमीन को अतिक्रमण बताते हुए जगह छोड़ने की चेतावनी दी। वन विभाग का कहना था कि 55 हेक्टेयर की जमीन जहां पर गांव के लोग भी बसे है, यह वन विभाग की। ग्रामीणों का कहना है कि बीते एक साल से शायद ही कोई दिन होगा जब वन विभाग के कर्मचारी गांव आकर मकान,जमीन खाली करने की धमकी ना देते हो। ऐसे में अब बीते एक साल से गांव में रहने वाले सैकड़ो परिवार खौफ में जीने को मजबूर है। हम विस्थापित है-कब्जाधारी नहीं ग्रामीण जगदीश यादव का कहना है कि 1980 के पहले लखनपुर गांव में रहते थे। बरगी डैम बनने के बाद आसपास के सैकड़ो गांव को डूब क्षेत्र का बता दिया, जिसके बाद पिता के साथ यहां आकर बस गए। बरगी बांध ने बही भी दी, अब वन विभाग कई सालों बाद यहां से भगाने की तैयारी कर रहा है, ऐसे में अब जाए तो कहां जाए। बांध के नाम पर मकान,जमीन सब ले लिया, और अब 46 साल बाद यह कहते हुए भगा रहे है कि जमीन वन विभाग की है। जगदीश का कहना है कि अगर हमारे घर टूटे तो उसी में हम लटके मिलेगें, हमारी मौत का जिम्मेदार शासन ही होगा। मजदूरी करें या घर बनाए ग्रामीणों का कहना था कि परिवार को लेकर कहां तक भागेगें। अब हम घर बनाए या मजदूरी कर परिवार पाले। सरकार ने घर बनाया है, तो कम से कम हमसे छाया तो ना छीने। एक साल से रोजाना वन विभाग आकर धमकी दे रहा है। जगदीश यादव का कहना है कि पंचायत ने ही हमें यहां पर बसाया था, उस समय की सरपंच ने पट्टा भी दिया। शासन की योजना से मकान भी बने, पर अब उसी मकान को वन विभाग तोड़ने की तैयारी कर रहा है। अगर यह जमीन फोरेस्ट विभाग की थी तो पहले ही बता देते, अब 40 साल बाद उन्हें याद आई है कि यह जमीन उनकी है। अगर यह जमीन वन विभाग की तो हमारी जमीन कहां है, जिसे कि बांध बनाने के समय हम से ली गई थी। मुआवजा को लेकर ग्रामीणों का कहना है कि दो-चार हजार रुपए दिए थे, और उसके अलावा कुछ नहीं मिला। मोदी जी के पैसों से यहां पर जो मकान बने है, वह क्या फारेस्ट विभाग देगा। वन विभाग की नहीं राजस्व की जमीन है ग्रामीण नारायण सिंह का कहना है कि जिस दौरान ग्रामीण यहां पर आकर बस रहे थे, उस समय यह आबादी वाली भूमि थी, जो को खसरे में आज भी दिख रही है। 2003 में वन विभाग ने इस जमीन को अपना बताया। नारायण सिंह ने बताया कि 67 हेक्टेयर राजस्व की जमीन थी, जिसमे से कि 55 हेक्टेयर जमीन राजस्व ने वन विभाग को दे दिया, जो कि बाकी कि 12 हेक्टेयर जमीन है, उस पर ही यह यादव नगर गांव बसा हुआ है। नारायण सिंह का कहना था कि मेरी 1 एकड़ जमीन पर भी वन विभाग ने कब्जा करते हुए वृक्षारोपण कर दिया। सीमांकन करवाया तो जमीन हमारी ही निकली, अब वन विभाग कह रहा है कि जमीन चाहिए तो केस लगाओ। 1995 में मिला था पट्टा ग्रामीण नारायण सिंह का कहना है कि 1995 में सगड़ा-छपनी गांव की सरपंच गीता साहू ने सभी ग्रामीणों को पट्टा दिया था, इसके अलावा सभी के पास में बरगी बांध प्रबंधन के द्रारा दी गई बही है, जो कि बताती है कि यह लोग विस्थापित है, पर अब वन विभाग ने तानाशाही रवैया अपनाते हुए सैकड़ों परिवार को बेदखल करने की तैयारी कर रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि वन विभाग सीमांकन करवा ले और जो हमारी 12 हेक्टेयर जमीन है, वह अलग निकाली जाए। उनका कहना है कि खसरा नंबर 472,473 और 474 अपने कब्जे में वन विभाग कर लिया है। हम लोग जहां रह रहे है, यह गोठान की भूमि है, जिस पर रह रहे है। लोहे की जाली से बांध दिए गांव को एक साल से लगातार वन विभाग की टीम गांव आ रही है। इस दौरान गांव के चारो और वन विभाग ने लोहे की जालिया और नाली खोदना शुरू कर दिया है। ग्रामीणो का कहना है कि वो दिन दूर नहीं जब हम चारों तरफ से घिर जाएंगे, और फिर गांव से बाहर निकलने का रास्ता भी नहीं बचेगा। ग्रामीण राकेश कुमार का कहना है कि आज भी गांव के बाहर मुनारे बने हुए है, जो कि बताते है कि यह जमीन राजस्व की है, पर वन विभाग ने अब तुगलकी फरमान जारी करते हुए खेती करने पर भी पाबंदी लगा दी है। राकेश का कहना है कि 1980 में दादा के साथ यहां आए थे। 2012 में आवास योजना के तहत मकान भी बने है। शासन के आदेश में आकर यहां बस गए थे, पर अब यहां से भगाने की तैयारी वन विभाग कर रहा है। वन भूमि के अतिक्रमण को जांच हो रही है डीएफओ पुनीत सोनकर का कहना है कि ग्रामीणों को बेदखल करने की बात अभी नहीं है, हम सिर्फ अपनी उस भूमि को चिन्हित कर रहे है , जो कि वन विभाग की है, यह देखा जा रहा है कि कहां-कहां पर अतिक्रमण है, उसे अभी चिन्हित किया जा रहा है। डीएफओ का कहना है कि राजस्व अधिकारी और कलेक्टर से चर्चा करने के बाद जायज व्यक्तियों को पात्रता का अधिकार दिया जाएगा और जो अपात्र होगें उन्हें हटाने की कार्रवाई की जाएगी। डीएफओ का कहना है कि सगड़ा-छपनी ग्राम पंचायत में बसे ग्रामीण अगर विस्थापित है, और शासन की और से कोई आदेश जारी हुआ होगा तो उसमें छेड़छाड़ नहीं किया जाएगा। शुरूआती दौर में अभी सिर्फ जांच की जा रही है।
राजस्व और वन विभाग मिलकर निकलेगा समाधान जिला पंचायत सीईओ अभिषेक गहलोत का कहना है कि मेरी जानकारी में अभी यह मामला आया है, अगर किन्ही परिवार को बरगी बांध से सालों पहले विस्थापित किया गया है, और अब उनको वन विभाग उस जगह से हटा रहा है, तो यह जांच की बात है। राजस्व और वन विभाग के अधिकारी संयुक्त रूप से बैठकर इसकी जांच करेंगे और जो वैधानिक कार्रवाई होगी वह की जाएगी।
जिला पंचायत सीईओ का कहना है कि 40 साल पहले अगर बरगी बांध से ग्रामीणों को यहां पर विस्थापित किया गया है तो फिर उन्हें हटाया नहीं जा सकता है फिर भी अगर वन विभाग की टीम उसे गांव की जमीन को अपना बता रही है तो यह दिखवाया जा रहा है ग्रामीणों को किसी भी तरह की परेशानी नहीं होने दी जाएगी। उन्होंने बताया कि ग्रामीणों के बाद अगर वह दस्तावेज होंगे तो यह भी एक आधार होगा।
