केंद्र के राष्ट्रीय सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन में मप्र के भीतर कागजी आंकड़ों और जमीनी हकीकत का बड़ा विरोधाभास सामने आया है। भास्कर पड़ताल में प्रदेश के 9 जिलों में रैंडमली 109 लोगों से सीधे इंटरव्यू और भौतिक सत्यापन में खुलासा हुआ है कि सरकारी रिकॉर्ड में बांटे जा चुके सिकल सेल जेनेटिक स्टेटस कार्ड्स में से ज्यादातर लोगों तक पहुंचे ही नहीं। पड़ताल में शामिल 81 लोगों (74%) ने ऑन-कैमरा व लिखित बयानों में स्पष्ट किया कि उन्हें कोई कार्ड नहीं मिला। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि 6 जिलों-ै श्योपुर, बैतूल, खंडवा, रतलाम, झाबुआ और आलीराजपुर में जिन 70 लोगों के इंटरव्यू लिए गए, उनमें से एक को भी कार्ड नहीं मिला। झाबुआ-आलीराजपुर में केंद्र सरकार के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, 16 मार्च 2026 तक 15.23 लाख लोगों की जांच कर 14.61 लाख जेनेटिक स्टेटस कार्ड बांटे जा चुके हैं। लेकिन हकीकत इसके उलट है। जब दोनों जिलों में बिना किसी पूर्व निर्धारित सूची के रैंडम तरीके से चुने गए 21 लोगों का आमने-सामने सत्यापन किया गया, तो एक भी व्यक्ति के पास कार्ड नहीं मिला। सबसे ज्यादा हैरानी… झाबुआ-आलीराजपुर में तो 2011 की कुल आबादी से भी ज्यादा कार्ड बांटने का कागजी दावा कर दिया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 1 जुलाई 2023 को शहडोल से ‘राष्ट्रीय सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन’ की शुरुआत की थी। इसका लक्ष्य 2025-26 तक प्रभावित क्षेत्रों के 0 से 40 वर्ष आयु वर्ग के 7 करोड़ लोगों की स्क्रीनिंग करना और 2047 तक इस बीमारी को खत्म करना है। लेकिन जमीनी हकीकत सरकारी दावों पर गंभीर सवाल खड़े करती है। क्यों जरूरी है यह कार्ड सिकल सेल एनीमिया आनुवंशिक बीमारी है। इसमें लाल रक्त कोशिकाएं गोल के बजाय हंसिया जैसी चपटी और सख्त हो जाती हैं। इससे नसों में खून की रुकावट, तेज दर्द, खून की कमी और अंगों को नुकसान। सिकल सेल जेनेटिक स्टेटस कार्ड तीन तरह के- 1. नीला: सामान्य (पूरी तरह स्वस्थ), 2. पीला: वाहक (बीमारी का जीन मौजूद), 3. लाल: पीड़ित शादी से पहले कार्ड मिलान अहम है। दो पीले कार्ड (वाहक) वालों की शादी होने पर बच्चे को बीमारी होने का 25% खतरा रहता है। यह कार्ड समय पर सही इलाज और आने वाली पीढ़ियों के बचाव में कारगर है। झाबुआ 2011 की जनगणना में 0 से 40 वर्ष की आबादी 8,25,391 थी। सरकारी कागजों में 8,55,094 लोगों की स्क्रीनिंग और 8,25,700 कार्ड बांटने का दावा है। यानी कागजों पर 2011 की कुल लक्षित आबादी से 309 अधिक कार्ड बांटे जा चुके हैं। भास्कर टीम ने झाबुआ में 10 लोगों के इंटरव्यू किए। 2 लोगों ने कार्ड के बारे में सुना था, 7 को जानकारी नहीं थी और 1 का जवाब अस्पष्ट था। इन 10 में से एक को भी कार्ड नहीं मिला। आलीराजपुर 2011 में इस आयु वर्ग की आबादी 5,86,964 थी, जबकि सरकारी रिकॉर्ड में 6,68,684 स्क्रीनिंग और 6,35,549 कार्ड वितरण दर्ज है। यहां कागजों में बांटे गए कार्ड आबादी से 48,585 अधिक हैं। टीम ने आलीराजपुर में 11 इंटरव्यू किए। 2 लोगों ने कहा कि उन्होंने नाम सुना है, 9 को कोई जानकारी नहीं थी। किसी को भी कार्ड जारी होने का मैसेज या सूचना नहीं मिली और न ही कोई कार्ड दिखा पाया। आदिवासियों के बीच काम करने वाले बोले- स्क्रीनिंग तक नहीं हुई, कार्ड तो दूर की बात सिकल सेल प्रोजेक्ट के तहत गांव-गांव जाकर 40 साल तक के लोगों की प्राथमिकता से जांच होनी थी। लेकिन स्वास्थ्य विभाग की घोर लापरवाही से आज भी सैकड़ों आदिवासी ग्रामीणों की स्क्रीनिंग ही नहीं हुई है। जब जांच ही नहीं हुई तो उन्हें कार्ड की जानकारी कैसे होगी? कार्ड केवल उन्हीं गंभीर मरीजों के पास हैं जो नियमित रूप से खून चढ़वाने अस्पताल पहुंचते हैं। अगर टीम घर-घर जाती तो सबको जानकारी भी होती और कार्ड भी बने होते। – नितेश अलावा, सामाजिक कार्यकर्ता, अलीराजपुर नौ जिलों में 109 लोगों की वेरिफिकेशन रिपोर्ट नौ जिलों-श्योपुर, बैतूल, धार, नर्मदापुरम, खंडवा, रतलाम, बड़वानी, झाबुआ और अलीराजपुर में कुल 109 लोगों से सीधे इंटरव्यू किए । इनमें 81 ने कार्ड न मिलने की पुष्टि की, 24 ने कार्ड मिलने की बात कही, जबकि 4 मामले अधूरे पाए गए। अगर ऐसा है तो हम तुरंत दिखवाएंगे, पता लगाएंगे कहां गैप है झाबुआ और अलीराजपुर तो हमारे पायलट प्रोजेक्ट्स हैं। दूसरे जिलों में फिर भी समझा जा सकता है, लेकिन झाबुआ और आलीराजपुर में तो प्रायोरिटी पर काम हुआ है। फिर भी अगर आपकी पड़ताल में कुछ और तथ्य सामने आए हैं तो हम इसे तुरंत दिखवाएंगे और पता लगाएंगे कि कहां गैप है।
– डॉ. रूबी खान, सिकल सेल प्रोग्राम ऑफिसर, मप्र
