महात्मा गांधी मेमोरियल (एमजीएम) मेडिकल कॉलेज और एमवाय अस्पताल में वर्षों तक पर्दे के पीछे रहकर खरीद-फरोख्त की पूरी व्यवस्था संभालने वाले फार्मासिस्ट राकेश गोरखे पर आखिरकार आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (ईओडब्ल्यू) का शिकंजा कस गया। बुधवार को हुई छापामार कार्रवाई में जो तथ्य सामने आए, उन्होंने केवल आय से अधिक संपत्ति के मामले को ही नहीं, बल्कि मेडिकल कॉलेज की खरीद प्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ईओडब्ल्यू की प्रारंभिक जांच के अनुसार राकेश गोरखे और उसके परिवार की वैध आय चेक पीरियड में 1.11 करोड़ रुपए रही, जबकि उसके द्वारा अर्जित संपत्तियों का मूल्य 2.13 करोड़ रुपए से अधिक पाया गया। यानी वैध आय की तुलना में करीब 108 प्रतिशत अधिक संपत्ति। जांच अभी जारी है और ईओडब्ल्यू को आशंका है कि यह आंकड़ा आगे और बढ़ सकता है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर एक फार्मासिस्ट ने इतना बड़ा आर्थिक साम्राज्य कैसे खड़ा किया? पड़ताल में सामने आता है कि यह कहानी केवल एक कर्मचारी की नहीं, बल्कि वर्षों तक मेडिकल कॉलेज की खरीद व्यवस्था में बढ़ते उसके प्रभाव, अधिकारियों से नजदीकियों और सिस्टम पर पकड़ की भी है। 2007 में सामान्य कर्मचारी… फिर खरीद व्यवस्था का सबसे प्रभावशाली चेहरा राकेश गोरखे की नियुक्ति वर्ष 2007 में एमवाय अस्पताल में हुई थी। शुरुआत में वह एक सामान्य कर्मचारी की तरह काम करता था। उस समय न तो उसका प्रशासन में कोई विशेष प्रभाव था और न ही वह किसी बड़े अधिकारी का करीबी माना जाता था। लेकिन वर्ष 2008 में उसने अपना अटैचमेंट एमजीएम मेडिकल कॉलेज की क्रय शाखा में करा लिया। यहीं से उसके करियर की दिशा बदलनी शुरू हुई। जानकारों के मुताबिक वर्ष 2012 के आसपास तत्कालीन डीन डॉ. पुष्पा वर्मा के कार्यकाल में गोरखे की सक्रियता तेजी से बढ़ी। दवाइयों, मेडिकल उपकरणों और अन्य खरीदी प्रक्रियाओं में उसकी भूमिका लगातार मजबूत होती गई। खास बात यह रही कि खरीद से जुड़े अधिकांश कामों में उसकी मौजूदगी रहती थी, लेकिन वह दस्तावेजों पर सीधे हस्ताक्षर करने से बचता था। इससे निर्णय प्रक्रिया में प्रभाव तो बना रहा, लेकिन जिम्मेदारी से दूरी भी बनी रही। डीन बदलते गए… लेकिन गोरखे की पकड़ और मजबूत होती गई एमजीएम मेडिकल कॉलेज में डीन बदलते रहे, लेकिन गोरखे की भूमिका कम होने के बजाय लगातार बढ़ती गई। डॉ. एम.के. राठौर और डॉ. शरद थोरा के कार्यकाल में भी वह खरीद व्यवस्था से जुड़ा रहा। सूत्रों के अनुसार इसी दौरान उसने ऐसा नेटवर्क तैयार कर लिया था, जिसमें दवाइयों और उपकरणों की खरीद प्रक्रिया बिना किसी बड़ी बाधा के संचालित होती रही। इसके बाद जब डॉ. ज्योति बिंदल डीन बनीं तो गोरखे कॉलेज की खरीद प्रणाली का प्रमुख संचालनकर्ता बन गया। अस्पतालों के विभिन्न विभागों में दवाइयों और मेडिकल उपकरणों की आपूर्ति, खरीद और समन्वय का बड़ा हिस्सा उसके हाथ में आ गया। इसी दौर में उसकी कई दवा कंपनियों और सप्लायरों से नजदीकियां भी बढ़ीं। पूर्व डीन डॉ. संजय दीक्षित के कार्यकाल में भी गोरखे को उनका बेहद करीबी कर्मचारी माना जाता रहा। कॉलेज परिसर में वह अक्सर डीन के साथ दिखाई देता था। यहां तक कि उसे नर्सिंग कॉलेज में पदस्थ किया गया, लेकिन उसकी सक्रियता एमजीएम मेडिकल कॉलेज में ही बनी रही। हालांकि बाद में जब डॉ. अरविंद घनघोरिया डीन बने तो गोरखे की प्रशासनिक पकड़ कमजोर पड़ने लगी और दोनों के बीच तालमेल नहीं बैठ सका। फार्मासिस्ट था, लेकिन पहचान डॉक्टरों के करीबी के रूप में बनी राकेश गोरखे का पद फार्मासिस्ट का था, लेकिन कॉलेज और एमवाय अस्पताल में उसकी पहचान केवल एक फार्मासिस्ट की नहीं रही। वरिष्ठ डॉक्टरों, प्रशासनिक अधिकारियों और खरीद प्रक्रिया से जुड़े कर्मचारियों के बीच उसकी मजबूत पकड़ बताई जाती रही। यही कारण था कि वर्षों तक वह मेडिकल कॉलेज की खरीद व्यवस्था का प्रभावशाली चेहरा बना रहा। थाईलैंड यात्रा भी जांच के दायरे में छापे के दौरान बरामद पासपोर्ट से पता चला कि गोरखे अक्टूबर 2023 में थाईलैंड गया था। ईओडब्ल्यू के अनुसार इस विदेशी यात्रा के लिए विभागीय अनुमति लेने का रिकॉर्ड नहीं मिला है। अब यात्रा पर हुए खर्च को भी उसकी कुल व्यय राशि में जोड़ा जाएगा। सर्च के दौरान संपत्तियों के दस्तावेज, बैंक पासबुक, रजिस्ट्री की प्रतियां, पासपोर्ट और 1.51 लाख रुपए नकद भी जब्त किए गए हैं। मारपीट के बाद बदला पूरा घटनाक्रम ईओडब्ल्यू जांच के समानांतर गोरखे एक अन्य विवाद के कारण भी सुर्खियों में आया। 27 जून 2025 को एमजीएम मेडिकल कॉलेज में डीन के निजी सहायक भावेश उपाध्याय के साथ उसका विवाद हुआ। आरोप है कि गोरखे ने बेल्ट से हमला कर दिया, जिससे उपाध्याय घायल हो गए और उनके सिर से खून बहने लगा। घटना डीन डॉ. अरविंद घनघोरिया के कार्यालय के बाहर हुई। इस मामले में संयोगितागंज थाने में प्रकरण दर्ज किया गया। इसके बाद 29 अक्टूबर 2025 को गोरखे को निलंबित कर मानसिक चिकित्सालय, बाणगंगा में पदस्थ किया गया। विभागीय सूत्रों के अनुसार वहां भी उसकी नियमित उपस्थिति नहीं रही। बाद में 10 दिसंबर 2025 को उसे आरोप पत्र जारी किया गया। इससे पहले 3 दिसंबर 2025 को उसके खिलाफ विभागीय जांच का आदेश भी जारी किया गया था। अंततः 6 अप्रैल 2026 को उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। पहले से भी विवादों में रहा नाम राकेश गोरखे का नाम इससे पहले भी एमजीएम मेडिकल कॉलेज में मशीनों के रखरखाव के नाम पर हुए कथित वित्तीय अनियमितताओं के मामले में सामने आ चुका है। वर्ष 2023 से जुड़े इस मामले में शिकायतकर्ताओं ने आरोप लगाया कि मशीनों के वार्षिक रखरखाव के नाम पर करोड़ों रुपए के भुगतान में गंभीर अनियमितताएं हुईं। शिकायत में तत्कालीन डीन डॉ. संजय दीक्षित, तत्कालीन प्रशासकीय अधिकारी (वित्त) दिव्या शर्मा, संदीप वसावा और राकेश गोरखे के बीच मिलीभगत के आरोप लगाए गए। शिकायत के अनुसार एचएलएल हाईट्स कंपनी को मशीनों के रखरखाव के लिए भुगतान किया गया, जबकि कई विभाग लगातार मशीनों में खराबी की शिकायत करते रहे और सुधार कार्य नहीं हुआ। बताया गया कि कॉलेज की आंतरिक जांच समिति ने भी कई आरोपों को सही पाया था। इस मामले की जांच भी ईओडब्ल्यू कर रही है। ये खबर भी पढ़ें… करोड़पति निकला एमवाय हॉस्पिटल का फार्मासिस्ट आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) इंदौर ने मंगलवार को एमवाय अस्पताल (MYH) में पदस्थ फार्मासिस्ट राकेश गोरखे के ठिकानों पर आय से अधिक संपत्ति के मामले में छापेमारी की। शुरुआती जांच में सामने आया कि आरोपी ने सरकारी दवाओं के स्टॉक में कथित गड़बड़ी कर आय से 108 प्रतिशत अधिक संपत्ति अर्जित की थी। जांच में बिना विभागीय अनुमति थाईलैंड यात्रा करने का भी खुलासा हुआ।पूरी खबर पढ़ें
