कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश ने साल 2022 के खरगोन दंगा मामले में सत्र न्यायालय द्वारा सभी 11 मुस्लिम आरोपियों को बरी किए जाने के बाद मध्य प्रदेश सरकार की बुलडोजर कार्रवाई पर कड़े सवाल उठाए हैं। जयराम रमेश ने सोशल मीडिया पर लिखा कि अप्रैल 2022 में रामनवमी हिंसा के अगले ही दिन जिला प्रशासन ने पांच मुस्लिम बहुल इलाकों में 16 मकानों और 29 दुकानों को ध्वस्त कर दिया था। उन्होंने तत्कालीन गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा के उस बयान का जिक्र किया जिसमें उन्होंने कहा था कि जिस घर से पत्थर आए हैं, उस घर को ही पत्थरों का ढेर बनाएंगे। अदालत द्वारा बिना किसी विश्वसनीय साक्ष्य और गवाहों के सभी को निर्दोष करार दिए जाने के बाद जयराम रमेश ने इस कार्रवाई को कानून के शासन और संविधान का घोर अपमान बताया है। उन्होंने प्रभावित लोगों को उचित मुआवजा देने और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग की है। मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने भी जयराम रमेश की इस पोस्ट को अपने फेसबुक पेज पर साझा करते हुए इस मुद्दे का समर्थन किया है। खरगोन हिंसा की पृष्ठभूमि और घटनाक्रम अप्रैल 2022 में रामनवमी पर्व के अवसर पर मध्य प्रदेश के खरगोन शहर में जुलूस निकाला जा रहा था। इस दौरान डीजे बजाने और नारों को लेकर दो पक्षों के बीच कहासुनी शुरू हुई, जिसने देखते ही देखते हिंसक रूप ले लिया। इसके बाद शहर के कई हिस्सों में पथराव और उपद्रव फैल गया। हिंसा में 175 लोग बनाए गए थे आरोपी इस उपद्रव के दौरान शहर के कई इलाकों में दुकानों, मकानों और दर्जनों वाहनों को आग के हवाले कर दिया गया, जिससे करोड़ों रुपये की संपत्ति का नुकसान हुआ। घटना के बाद पुलिस प्रशासन ने तुरंत कार्रवाई करते हुए विभिन्न धाराओं में प्राथमिकियां दर्ज कीं और 175 से अधिक लोगों को नामजद आरोपी बनाया। प्रशासन ने दुकान-मकानों पर चलाया था बुलडोजर हिंसा भड़कने के 24 घंटे के भीतर जिला प्रशासन ने सख्त रुख अपनाते हुए बुलडोजर कार्रवाई शुरू कर दी। इसके तहत पांच मुस्लिम बहुल बस्तियों में स्थित 16 मकानों और 29 दुकानों को ढा दिया गया। तत्कालीन गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा ने इस कार्रवाई का सार्वजनिक रूप से समर्थन किया था। जमीयत उलेमा ने सुप्रीम कोर्ट में दायर की थी याचिका बिना किसी कानूनी नोटिस और तय प्रक्रिया के की गई इस तोड़फोड़ के खिलाफ अप्रैल 2022 में ही जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया था। याचिका में राज्य सरकारों द्वारा मनमाने ढंग से की जा रही बुलडोजर कार्रवाई पर रोक लगाने और इसे संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन घोषित करने की मांग की गई थी।
