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दतिया में कुंवर साहब की जीत या अपनों की गद्दारी:आशुतोष का दर्द क्या बयां कर रहा; बगावती तेवर वाले कार्यकर्ताओं ने कैसे पलटा गेम?

दतिया विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस ने अपनी सीट बचा ली है। कांग्रेस उम्मीदवार घनश्याम सिंह ने भाजपा के आशुतोष तिवारी को 6,016 वोटों से हरा दिया। हार के बाद आशुतोष तिवारी ने कहा, ‘हार की समीक्षा करेंगे, जो लोग भाजपा को अपनी मां कहते हैं, उन्होंने धोखा दिया।’ आखिर भाजपा चुनाव कहां हार गई? क्या वजह सिर्फ टिकट बदलना थी, या संगठन और चुनावी रणनीति में भी कहीं चूक हुई; समझते हैं आज के एक्सप्लेनर में। सवाल 1: कांग्रेस जीती कैसे, आखिर भाजपा हारी कहां? जवाब- स्थानीय राजनीतिक समीकरण, उम्मीदवार का चयन, संगठन की रणनीति और वोटों का बिखराव इन सभी ने मिलकर दतिया चुनाव की दिशा तय की। इनमें पांच फैक्टर सबसे अहम रहे। 1. कांग्रेस पहले से जीती हुई सीट बचाने उतरी थी यह उपचुनाव भाजपा की सीट बचाने का नहीं, बल्कि कांग्रेस से सीट छीनने का चुनाव था। 2023 में कांग्रेस के राजेंद्र भारती ने भाजपा के दिग्गज नेता नरोत्तम मिश्रा को 7,742 वोटों से हराया था। राजनीतिक विश्लेषक अमिताभ तिवारी के मुताबिक, ऐसे उपचुनावों में आमतौर पर उसी पार्टी को बढ़त रहती है, जिसके पास पहले से सीट होती है। यानी कांग्रेस शुरुआत से ही अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में थी। 2. कांग्रेस ने सही समय पर सही उम्मीदवार उतारा कांग्रेस ने घनश्याम सिंह ‘कुंवर साहब’ को उम्मीदवार बनाया। स्थानीय स्तर पर लंबे समय से उन्हें टिकट देने की मांग उठती रही थी। पार्टी ने आखिरकार उसी चेहरे पर भरोसा जताया, जिसकी कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बीच स्वीकार्यता पहले से थी। 3. भाजपा टिकट बदलने के बाद असंतोष संभाल नहीं पाई स्थानीय वरिष्ठ पत्रकार रवि ठाकुर के मुताबिक, नरोत्तम मिश्रा के संगठन से जुड़े पदाधिकारी भले भाजपा के साथ रहे, लेकिन उनके कई समर्थक चुनाव में पहले जैसी सक्रियता नहीं दिखा सके। इसकी झलक नरोत्तम मिश्रा के बूथ नंबर-121 पर भी देखने को मिली, जहां कांग्रेस को भाजपा से ज्यादा वोट मिले। हालांकि सिर्फ एक बूथ से पूरे चुनाव का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता, लेकिन इसे स्थानीय असंतोष का संकेत माना जा रहा है। आशुतोष तिवारी का यह बयान- ‘जो लोग भाजपा को अपनी मां कहते हैं, उन्होंने धोखा दिया’ भी इस ओर इशारा करता है कि पार्टी के भीतर की नाराजगी पूरी तरह खत्म नहीं हुई थी। 4. कांग्रेस का ग्राउंड कैंपेन, भाजपा के स्टार प्रचारकों पर भारी पड़ा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी लगातार गांवों और वार्डों में बैठकें करते रहे। दूसरी ओर भाजपा ने कई बड़े नेताओं को प्रचार में उतारा, लेकिन स्थानीय स्तर पर उनका अपेक्षित असर नहीं दिखा। मुख्यमंत्री का रोड शो भी वह माहौल नहीं बना सका, जिसकी भाजपा को उम्मीद थी। 5. आजाद समाज पार्टी ने समीकरण बिगाड़ा आजाद समाज पार्टी के दामोदर यादव को 22,527 वोट मिले। शुरुआत में माना जा रहा था कि वे सिर्फ कांग्रेस के दलित वोटों में सेंध लगाएंगे, लेकिन नतीजों और स्थानीय आकलन ने अलग तस्वीर दिखाई। दामोदर यादव ने कांग्रेस के जाटव समाज के कुछ युवा वोट तो प्रभावित किए ही, साथ ही पाल-कुशवाहा जैसे समुदायों के कुछ वोट भाजपा से भी अपनी ओर खींचे। यानी उनकी मौजूदगी ने मुकाबले को एकतरफा वोट कटने के बजाय त्रिकोणीय बना दिया। रवि ठाकुर का आकलन है कि अगर आजाद समाज पार्टी की ओर से कोई दूसरा दलित चेहरा मैदान में होता और उसे इसी तरह का समर्थन मिलता, तो भाजपा के जीतने की संभावना और बढ़ सकती थी। यानी दामोदर यादव का उम्मीदवार होना दोनों दलों के पारंपरिक वोट बैंक का गणित बदलने वाला फैक्टर साबित हुआ। सवाल-2: क्या नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटना टर्निंग पॉइंट साबित हुआ? जवाबः नरोत्तम का टिकट कटना नहीं, बल्कि उसके बाद का क्राइसिस मैनेजमेंट सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। सवाल 3: क्या अब भाजपा टिकट देने की अपनी रणनीति बदलेगी? जवाब- दतिया का नतीजा सिर्फ एक सीट की हार नहीं, बल्कि टिकट वितरण की रणनीति पर भी सवाल खड़े करता है। सवाल 4: मोहन यादव और भाजपा प्रदेश नेतृत्व को क्या संदेश मिला? जवाब- दतिया उपचुनाव मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के नेतृत्व में लड़ा गया पहला बड़ा चुनाव था। ================================= मध्य प्रदेश एक्सप्लेनर की ये कड़ी भी पढ़ें क्या नरोत्तम के आंसू हार की वजह बनेंगे:टिकट काटकर क्या फंस गई है भाजपा 15 साल दतिया के विधायक रहे नरोत्तम मिश्रा टिकट कटने के बाद मंच पर भावुक नजर आए। इसके बाद गुरुवार को आशुतोष तिवारी की मौजूदगी में अपने कार्यकर्ताओं से कहा- लोग कहने लगे हैं कि आशुतोष ने टिकट काट दिया। उसकी क्षमता है टिकट काटने की? टिकट काटने वाले कोई और हैं। क्या नरोत्तम के आंसू आशुतोष को महंगे पड़ जाएंगे…पूरा एक्सप्लेनर पढें

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