घर की आर्थिक हालत ऐसी कि मां आज भी खेतों में मजदूरी करती हैं। पिता की आंखों की रोशनी पिछले दो साल से इतनी कमजोर हो चुकी है कि अब वे पहले की तरह काम नहीं कर पाते। परिवार की जिम्मेदारी भी है और खुद की पढ़ाई भी। ऐसे हालात में ज्यादातर युवा अपने भविष्य की चिंता करते हैं, लेकिन बड़वानी जिले के एक छोटे से गांव से आए छात्र अरुण बड़ोले ने अपने साथ हजारों छात्रों के भविष्य की लड़ाई लड़ने का फैसला किया। दिल्ली में नीट पेपर लीक के खिलाफ हुए आंदोलन के समर्थन में उन्होंने इंदौर में भी 26 दिनों तक आंदोलन किया। आंदोलन की शुरुआत करने वाले अरुण पढ़ाई के साथ ही ड्राइवरी का काम भी करते हैं। वे बड़वानी जिले की राजपुर तहसील के लिंबई गांव के रहने वाले हैं। पिछले छह वर्षों से इंदौर में किराए के कमरे में रहकर देवी अहिल्या विश्वविद्यालय (DAVV) से पढ़ाई कर रहे हैं। परिवार में तीन बहनें हैं। पिता मांगीलाल की आंखों से कम दिखाई देता है, जबकि मां प्रेमबाई आज भी खेतों में मजदूरी कर परिवार का पालन-पोषण कर रही हैं। चुप रहता तो खुद को माफ नहीं कर पाता अरुण बताते हैं कि जब उन्होंने देखा कि देशभर में छात्र नीट पेपर लीक के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक भी शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर आंदोलन कर रहे हैं, तब उन्होंने तय कर लिया कि वे भी पीछे नहीं हटेंगे। अरुण कहते हैं, “मैं खुद एक छात्र हूं। अगर आज अपने जैसे लाखों विद्यार्थियों के भविष्य के लिए आवाज नहीं उठाऊंगा, तो फिर पढ़ाई का क्या मतलब? गलत के खिलाफ खड़ा होना जरूरी था।” पहले 10 दिन सिर्फ चार साथी, फिर बढ़ता गया कारवां 30 जून को आंदोलन शुरू हुआ। शुरुआत में अरुण के साथ केवल यश, चंदू, लोकेश और अखिलेश जैसे कुछ साथी थे। पहले 10 से 12 दिनों तक आंदोलन में गिने-चुने छात्र ही धरने पर बैठे रहे। कई बार ऐसा भी हुआ कि धरना स्थल लगभग खाली नजर आया, लेकिन अरुण और उनके साथी डटे रहे। धीरे-धीरे छात्रों, सामाजिक संगठनों और शहर के लोगों का समर्थन मिलने लगा। देखते ही देखते आंदोलन ने गति पकड़ ली और 26 दिनों तक लगातार छात्रों की आवाज बुलंद होती रही। ड्राइवरी से चलता है खर्च, लेकिन संघर्ष से नहीं हटे कदम अरुण बताते हैं कि वे पढ़ाई के साथ ड्राइवरी का काम करते हैं, जिससे किराया और अन्य खर्च पूरे हो सकें। आर्थिक परेशानियां कभी आंदोलन के रास्ते में नहीं आईं। परिवार की जिम्मेदारियों के बीच भी उन्होंने आंदोलन को अपनी प्राथमिकता बनाए रखा। ‘छात्रों के साथ अन्याय होगा तो फिर मैदान में उतरेंगे’ आंदोलन खत्म होने के बाद भी अरुण का जोश कम नहीं हुआ है। उनका कहना है कि यह सिर्फ एक परीक्षा का मुद्दा नहीं, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र में पारदर्शिता की लड़ाई है। “अगर भविष्य में भी विद्यार्थियों के साथ किसी तरह का अन्याय होगा, तो हम फिर से आवाज उठाएंगे। छात्रों के अधिकारों की लड़ाई में हमेशा खड़े रहेंगे। आगे की रणनीति बनाएंगे कि इस दिशा में कैसे काम करना है।’ यह खबर भी पढ़ें… इंदौर में 26 दिन प्रदर्शन, रोज 1000 की भीड़ इंदौर के टंट्या भील चौराहे पर 30 जून से शुरू हुआ छात्र आंदोलन शनिवार को खत्म हो गया। केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की खबर आते ही यहां मौजूद एक हजार से अधिक स्टूडेंट्स में जश्न का माहौल बन गया। 26 दिन तक चला यह प्रदर्शन मध्य प्रदेश का सबसे लंबा छात्र आंदोलन रहा। दरअसल, दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे प्रदर्शन से प्रेरित होकर छात्र अरुण बड़ोले सबसे पहले टंट्या भील चौराहे पर पहुंचे और धरने पर बैठ गए। पूरी खबर यहां पढ़ें…
