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विजय शाह केस- सुप्रीम कोर्ट में पेश नहीं हुई रिपोर्ट:चार सप्ताह के भीतर अनुपालन रिपोर्ट पेश करने का दिया था आदेश

कर्नल सोफिया कुरैशी पर विवादित टिप्पणी के मामले में मध्य प्रदेश के मंत्री विजय शाह को लेकर राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बावजूद अनुपालन (कम्प्लाइंस) रिपोर्ट दाखिल नहीं की है। सुप्रीम कोर्ट ने 8 मई को सरकार से कहा था कि 19 जनवरी के आदेश का पालन कर चार सप्ताह के भीतर अनुपालन (कम्प्लाइंस) रिपोर्ट पेश करे। लेकिन 23 जुलाई को तैयार सुप्रीम कोर्ट की ऑफिस रिपोर्ट में साफ लिखा है कि 8 मई के आदेश के अनुपालन में अब तक कोई दस्तावेज दाखिल नहीं हुआ है। मामला शुक्रवार 24 जुलाई को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध हुआ था। यह मामला इसलिए भी अहम है क्योंकि पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की देरी पर बेहद सख्त रुख अपनाया था। कोर्ट ने “Enough is enough” कहते हुए सरकार को पुराने आदेश का पालन करने को कहा था। इससे पहले एसआईटी विजय शाह के खिलाफ जांच पूरी कर चुकी है और आगे अभियोजन के लिए सरकार की मंजूरी का मुद्दा लंबित है। पिछली सुनवाई में कहा था- अब बहुत हो गया 8 मई को चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच के सामने मामला आया था। राज्य सरकार द्वारा अभियोजन स्वीकृति पर फैसला नहीं लिए जाने पर कोर्ट ने नाराजगी जताई। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, “Enough is enough” यानी अब बहुत हो गया। कोर्ट ने सरकार से कहा कि 19 जनवरी के आदेश के पैरा 5 और 6 का पालन किया जाए। इसके लिए चार सप्ताह का समय दिया गया। यही निर्देश सुप्रीम कोर्ट की मौजूदा ऑफिस रिपोर्ट में भी दर्ज है। इसके मुताबिक 8 मई को कोर्ट ने आदेश दिया था कि राज्य सरकार चार सप्ताह में अनुपालन रिपोर्ट पेश करे और मामले को 24 जुलाई को फिर सूचीबद्ध किया जाए। सरकार का तर्क- शायद तारीफ करना चाहते थे, बोल कुछ और गए 8 मई की सुनवाई में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने विजय शाह के प्रति नरम रुख अपनाने का आग्रह किया था। उन्होंने कोर्ट में कहा था कि संभवतः विजय शाह कर्नल सोफिया कुरैशी की प्रशंसा करना चाहते थे, लेकिन अपनी बात ठीक तरह से व्यक्त नहीं कर पाए और कुछ और बोल गए। मेहता ने शाह के बयान को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए यह भी कहा था कि उन्होंने विवाद के बाद माफी मांगी थी। हालांकि कोर्ट इस तर्क से संतुष्ट नहीं हुआ। CJI बोले थे- दुर्भाग्यपूर्ण नहीं, ‘बेहद दुर्भाग्यपूर्ण’ सॉलिसिटर जनरल ने जब कहा कि विजय शाह ने जो कहा वह निश्चित रूप से दुर्भाग्यपूर्ण था, तब चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने इससे भी सख्त टिप्पणी की। कोर्ट ने इसे “most unfortunate” यानी बेहद दुर्भाग्यपूर्ण बताया और शाह में पश्चाताप की भावना नहीं दिखने की बात कही। इसके बाद बेंच ने विजय शाह और राज्य की ओर से इस मुद्दे पर आगे की दलील सुनने के बजाय सरकार को अपने पुराने आदेश का पालन करने के लिए कहा। विजय शाह ने माफी का दिया था हवाला, कोर्ट नहीं हुआ संतुष्ट विजय शाह की ओर से यह बात भी कोर्ट के सामने रखी गई थी कि उन्होंने अपने बयान के लिए माफी मांग ली है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे मामले को समाप्त करने का आधार नहीं माना। कोर्ट ने शाह की माफी वाली दलील स्वीकार करने से इनकार किया और राज्य को अभियोजन स्वीकृति के मुद्दे पर निर्णय लेने को कहा। यह पहला मौका नहीं था जब सुप्रीम कोर्ट शाह की माफी से असंतुष्ट दिखा। मामले के शुरुआती चरण में भी अदालत उनकी माफी को लेकर तीखी टिप्पणी कर चुकी थी। जनवरी में सरकार को मिले थे दो सप्ताह, मई में फिर चार सप्ताह 19 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट के सामने आया था कि एसआईटी अपनी जांच पूरी कर अंतिम रिपोर्ट दे चुकी है, लेकिन BNS की धारा 196 के तहत आगे की कार्रवाई के लिए जरूरी अभियोजन स्वीकृति का मामला राज्य सरकार के पास लंबित है। तब सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को इस पर उचित निर्णय लेने के लिए दो सप्ताह दिए थे। मई में मामला दोबारा आया तो फैसला नहीं हुआ था। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने फिर सख्ती दिखाते हुए पुराने निर्देशों का पालन करने और चार सप्ताह में अनुपालन रिपोर्ट देने का आदेश दिया। अब ऑफिस रिपोर्ट में खुलासा- एक भी अनुपालन दस्तावेज नहीं इस मामले में सबसे नया और महत्वपूर्ण तथ्य सुप्रीम कोर्ट की 23 जुलाई की ऑफिस रिपोर्ट में सामने आया है। इसमें साफ लिखा है कि 8 मई 2026 के आदेश के अनुपालन में अब तक कोई दस्तावेज दाखिल नहीं किया गया है। यानी सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को चार सप्ताह दिए थे, लेकिन करीब ढाई महीने बाद भी कोर्ट के रिकॉर्ड में अनुपालन दस्तावेज नहीं पहुंचा था। हालांकि, इसका अर्थ अपने आप यह नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को अवमानना का दोषी मान लिया है। ऑफिस रिपोर्ट केवल रिकॉर्ड की स्थिति बताती है। इस देरी पर न्यायिक रूप से क्या कार्रवाई होगी, यह बेंच के आदेश पर निर्भर करेगा। सरकार की ओर से नया वकील भी रिकॉर्ड पर ऑफिस रिपोर्ट में यह भी दर्ज है कि अधिवक्ता मृणाल गोपाल एल्कर ने दोनों मामलों में मध्य प्रदेश सरकार की ओर से Memo of Appearance दाखिल किया है। साथ ही शो-कॉज नोटिस की सर्विस पूरी हो चुकी है। इसी ऑफिस रिपोर्ट के साथ मामला 24 जुलाई को कोर्ट के सामने सूचीबद्ध किया गया है।

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