मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से करीब 380 किलोमीटर दूर है पन्ना जिला। यहां की पथरीली जमीन पर मिलने वाला हीरा लाइफ स्टाइल, बातचीत और उम्मीदों का हिस्सा है। सुबह होते ही कई लोग घरों से हीरे की तलाश में निकल पड़ते हैं। कई परिवार ऐसे भी हैं, जो पीढ़ियों से हीरों की खोज में जुटे हैं। वे कहते हैं, हम जमीन पर हर कुदाल इस उम्मीद से मारते हैं कि इसमें तो हीरा मिलेगा ही। ऐसे करते-करते वर्षों बीत जाते हैं। ये हीरा एक नशा है, जो जाने-अनजाने लोगों को यहां खींच लाता है। अब पन्ना में हीरा खदान का पैटर्न बदलने लगा है। लोग जहां पहले जिन खेतों में फसल उगाते थे, अब उसी में हीरे की खदान लगा रहे हैं। इसके चलते कृषि भूमि बंजर हो रही है। इस पैटर्न पर कृषि अधिकारियों ने चिंता जताई है। हीरा कार्यालय से मिली जानकारी के अनुसार इस साल 15 जुलाई 2026 तक करीब 300 लोगों ने खदानों के लिए नए पट्टे लिए हैं। इन पट्टों में से 125 पट्टे निजी और खेती की जमीन पर खदान शुरू करने के लिए गए हैं। 175 पट्टे शासकीय (सरकारी) भूमि पर खनन के लिए बनाए गए हैं। पढ़िए रिपोर्ट… पहले तीन तस्वीरें देखिए… अपने ही खेत में मिले ढाई करोड़ के हीरे जिला मुख्यालय से 10 किलोमीटर दूर है जरुआपुर गांव। यहां के सरपंच हैं प्रकाश मजूमदार। पांच साल पहले तक अपने खेत में काम करने के बाद मेहनत-मजदूरी करते थे। पैसों की जरूरत पढ़ने पर उधार मांगा करते थे। लेकिन, आज हालात बिल्कुल उलट हैं। गांव में आलीशान घर है। लोगों की जरूरत के हिसाब से रुपयों पैसों से मदद कर रहे हैं। वजह है- पन्ना की उथली खदानों में मिलने वाला हीरा। इन्हें अब तक ढाई करोड़ रुपए के करीब 15 हीरे मिल चुके हैं, इसलिए गांव वाले उनसे कई बार सेठ भी कह देते हैं। खास बात ये है कि प्रकाश मजूमदार ने खदान लगाने के लिए दूसरी जगह का पट्टा नहीं लिया, बल्कि अपने खेत में ही पार्टनर के साथ खदान शुरू की थी। सफलता को देखते हुए पन्ना में स्थानीय लोगों का हीरा तलाशने का तरीका ही बदलने लगा है। जिले के मनोर पंचायत के जरुआपुर समेत पटी, किटहा, अहिरगवां, बृजपुर और सरकोहा जैसे क्षेत्रों के किसान अब पारंपरिक फल-सब्जी उगाने के बजाय अपने ही खेतों में ‘हीरे की खेती’ कर रहे हैं, यानी वे अपनी जमीनों पर हीरे की निजी खदानें लगा रहे हैं। हालांकि, इस ‘चमकती दुनिया’ का दूसरा पहलू भी है। जहां कुछ किसानों की किस्मत पल भर में बदल गई। उन्हें दर्जनों हीरे मिल चुके हैं, वहीं कई किसान आज भी फटेहाल हैं। कर्ज में डूबते जा रहे हैं। 93 लाख का हीरा मिला, दो साल से नीलामी नहीं सरपंच प्रकाश मजूमदार कहते हैं कि कोरोना के बाद से 6 साथियों के साथ मिलकर एक एकड़ में फल-सब्जी की जगह हीरों की खदान चला रहे हैं। अब तक करीब 16, 14, 6, 7, 3 और 4 कैरेट समेत छोटे-बड़े मिलाकर ढाई करोड़ के 15 से हीरे मिल चुके हैं। मजूमदार को सबसे बड़ा हीरा 16.10 कैरेट का मिला था। 2024 में उसकी नीलामी के बाद 93 लाख रुपए मिले। उनके पार्टनर दिलीप मजूमदार कहते हैं- बड़ी सफलता साल 2023 में मिली, जब 8 कैरेट का हीरा मिला था। इन दोनों समेत अन्य पार्टनरों को मिले हीरों की बात करें, तो 2 हीरे 6.54 कैरेट एवं 4.90 कैरेट की नीलामी होना है। प्रकाश कहते हैं कि जो हीरे जमा किए गए हैं, उनकी दो साल से नीलामी नहीं हुई है। पहले बताया गया कि रूस-यूक्रेन का युद्ध, अब कह रहे हैं कि अमेरिका-ईरान युद्ध के चलते नीलामी नहीं हो पा रही। खदान में हीरा तलाशने लाखों रुपया खर्च हो जाता है। समय से पैसा नहीं मिलता, वर्षों इंतजार करना पड़ता है। जरूरत के समय भी पैसा न होने से हम लोग परिजन का इलाज तक नहीं करा पाते। प्रकाश कहते हैं- पार्टनर अभिलाष के पिता की तेरहवी है। कैंसर से उनकी मौत हो गई थी। उनके इलाज के लिए पैसों की जरूरत थी, लेकिन नीलामी न होने से आर्थिक स्थिति खराब हो चुकी थी। समय पर नीलामी हो जाती, तो अभिलाष अपने पिता का अच्छा इलाज करवा सकता था, लेकिन पैसों की तंगी के चलते अंततः पिता की मौत हो गई। हीरे की खदान जुआ है: चमक के पीछे का अंधेरा सरपंच प्रकाश मजूमदार कहते हैं- खेती में तय है कि फसल बिकने के बाद पैसा तो मिलेगा ही, लेकिन खेतों में हीरे की खदान लगाना जुआ खेलने जैसा है। किस्मत अच्छी हुई, तो हीरा मिल जाता है, नहीं तो पैसा और मेहनत दोनों ही मिट्टी में मिल जाते हैं। हीरे की इस ‘खेती’ में फायदा सिर्फ और सिर्फ किस्मत के भरोसे है। किसान गौतम मिस्त्री कहते हैं- अपने पार्टनर का खेत 20% की पार्टनरशिप पर लेकर खदान लगाई है। बाकी जगह पर खेती भी कर रहे हैं। उनके मुताबिक, यदि हीरा नहीं मिला, तो जमापूंजी बर्बाद हो जाएगी। गांव के कई ऐसे किसान भी हैं, जो खदान लगाए हैं, लेकिन आज तक एक भी हीरा नहीं मिला, जिसके कारण मजदूरों का पैसा भी जेब से देना पड़ रहा है। पिछले चार साल में किसे क्या मिला? हीरा खदान से बंजर हो रही जमीन कृषि विभाग के उपसंचालक ओपी तिवारी कहते हैं कि हीरा खदान के चलते कृषि भूमि बंजर हो रही है। खदान बंद होने के बाद किसान इसका सही उपयोग कर सकते हैं। खोदे गए गड्ढे में जल सरंचना तैयार कर सकते हैं। अगर गड्ढा बड़ा है, तो उसका उपयोग कंपोस्ट खाद (जैविक खाद के रूप में) कर सकते हैं। अगर उक्त गड्ढों का इस्तेमाल नहीं करते हैं, तो उतना हिस्सा बेकार हो जाता है। ये खबरें भी पढ़ें… 1. 250 रुपए के हीरा खदान के पट्टे ने बनाया अमीर हीरे की खदानों ने कई मजदूरों की किस्मत बदली है। ऐसी ही कहानी चुनुवाद आदिवासी के परिवार की है। 250 रुपए के पट्टे की खदान से उनकी जिंदगी बदल गई। अब परिवार पक्के मकान में रहता है। पहले दूसरों के खेतों में मजदूरी करने वाले चुनुवाद अब काम के ठेके ले रहे हैं। घर में ट्रैक्टर और जमीन भी है। पूरी खबर पढ़ें… कीमती हीरा मिला, लेकिन नहीं चमकी किस्मत क्या वाकई में हीरा मिलने के बाद पन्ना के लोगों की किस्मत चमक जाती है, इसी का पता करने दैनिक भास्कर की टीम पन्ना पहुंची। ऐसे 4 लोगों से मिली, जिन्हें पहले हीरा मिल चुका है। उनसे बातचीत कर समझ आया कि हीरा मिलने के बाद उनकी किस्मत चमकी नहीं बल्कि उन्हें कई परेशानियों का सामना करना पड़ा। पूरी खबर पढ़ें…
