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बड़वानी के ‘दशरथ मांझी’…150-फीट ऊंचा पहाड़ काटकर बना रहे रोड:नेता-अफसरों से सिर्फ वादे मिले तो गांववालों ने उठा लिए कुदाली, फावड़े

बिहार के ‘माउंटेन मैन’ दशरथ मांझी की कहानी तो आपने फिल्मों में देखी होगी, लेकिन मध्य प्रदेश के बड़वानी में यह कहानी आज हकीकत बन चुकी है। जिले के खेड़ी पलास फलियां गांव के लोगों ने नेताओं के झूठे वादों और अफसरों के चक्कर काटने से तंग आकर खुद ही 150 फीट ऊंचे पहाड़ को काटकर सड़क बनाना शुरू कर दिया है। करीब 250 से 300 की आबादी वाले इस गांव में भीषण गर्मी के बीच गांव का हर बच्चा, बूढ़ा और महिला अलग-अलग शिफ्ट में ‘दशरथ मांझी’ बनकर कुदाल-फावड़े चला रहा है। मुसीबत का रास्ता: क्यों उठाना पड़ा यह कदम? दरअसल, मेन रोड से गांव 3 किमी अंदर है। इसमें 1 किमी कच्ची पगडंडी है और 2 किमी का रास्ता खतरनाक पहाड़ से होकर गुजरता है। ग्रामीण जान जोखिम में डालकर ऊबड़-खाबड़ रास्तों से बाइक निकालते थे। बारिश के दिनों में गांव का संपर्क पूरी तरह कट जाता है, जिससे बच्चे स्कूल तक नहीं जा पाते। दैनिक भास्कर की टीम बड़वानी से करीब 40 किलोमीटर दूर सड़क बना रहे इन गांववालों से मिलने पहुंची। यहां पहुंचने के लिए कार को गांव से करीब 3 किलोमीटर दूर पार्क करना पड़ा। इ सके बाद पैदल चलकर पहाड़ी तक पहुंचे। यहां देखा कि करीब 35 से 40 महिला-पुरुष पांच फीट चौड़ी सड़क बनाने में जुटे हैं। गर्भवती को झोली में लटका कर ले जाना पड़ता है… गांव की रेवती बाई घूंघट की ओट से अपनी बारेली बोली में बताती हैं- सड़क नहीं होने की सबसे बड़ी कीमत यहां की महिलाओं और बीमारों को चुकाना पड़ती है, अगर गांव में कोई महिला गर्भवती हो या कोई बीमार पड़ जाए तो उसे कपड़े की झोली में डालकर ले जाना पड़ता है। रेवती बाई के मुताबिक, एक बीमार को उठाने में 8 मर्द लगते हैं और ढाई से तीन घंटे में पहाड़ी पार हो पाती है। खाद-बीज और अनाज भी सिर पर लादकर चढ़ना पड़ता है। अब हम थक चुके हैं, इसलिए खुद ही रास्ता बना रहे हैं। सरकार के भरोसे नहीं बैठे, खुद जुटाए एक लाख रुपए गांव के साब्जिया आदिवासी ने बताया- सालों तक जनसुनवाई और दफ्तरों के चक्कर काटने के बाद जब सिर्फ आश्वासन मिले तो हम सब गांववालों ने एक महीने पहले बैठक की। गांव के सक्षम परिवारों ने 10-10 हजार रुपए दिए। बाकी लोगों ने अपनी क्षमता के अनुसार मदद की। इस तरह 1 लाख रुपए का फंड जमा हुआ। 2 किलोमीटर की सड़क में से आधा काम ग्रामीणों ने खुद खोदकर कर लिया है। बाकी का काम अब इस चंदे के पैसे से जेसीबी मशीन बुलाकर कराया जाएगा। न जाने कितने चुनाव निकल गए, लेकिन सड़क नहीं बनी ग्रामीण साबा कहते हैं- हर चुनाव के समय नेताओं ने गांव तक सड़क बनवाने की बात कही। न जाने कितने चुनाव निकल गए, लेकिन सड़क नहीं बन पाई। बारिश के दिनों में गांव का संपर्क आसपास के क्षेत्रों से लगभग टूट जाता था, जिससे हर साल परेशानी होती है। बच्चों को कई बार कीचड़ और पानी से भरे रास्तों से होकर गुजरना पड़ता था। कच्ची हम बना रहे, पक्की सरकार बना दे गांववालों का कहना है- हमारा मकसद सिर्फ रास्ता बनाना नहीं, बल्कि सोए हुए सिस्टम को जगाना और सामूहिक ताकत की मिसाल देना है। हम बारिश से पहले किसी भी तरह रास्ता चालू करना चाहते हैं। फिलहाल, मिट्टी-पत्थर हटाकर कच्ची सड़क तो बना लेंगे, ताकि गाड़ियां आ-जा सकें। अब प्रशासन को थोड़ी भी शर्म आए तो वो इस पर पक्की सड़क बनवा दे। इस मामले में क्या बोले जिम्मेदार? मामले में जब बड़वानी कलेक्टर जयति सिंह से संपर्क करने की कोशिश की गई तो उन्होंने फोन रिसीव नहीं किया। ग्रामीण सड़क विकास प्राधिकरण (MPRRDA) के महाप्रबंधक अंकित अवस्थी ने बताया कि उबादगढ़ गांव वैसे तो सीसी रोड से जुड़ा है, लेकिन अंदरूनी कनेक्टिविटी के लिए इस मार्ग को मुख्यमंत्री मजरा-टोला सड़क योजना में शामिल किया गया है। इसका सर्वे हो चुका है और 100 से अधिक आबादी वाली बसाहटों को जल्द ही सड़क नेटवर्क से जोड़ा जाएगा। …………………… यह खबर भी पढ़ें ‘सांसद जी हेलिकॉप्टर भेजिए, प्रेग्नेंसी का नौवां महीना है’ सीधी जिले में अपने गांव की सड़क बनवाने के लिए मोर्चा खोलने वाली लीला साहू का एक और वीडियो सामने आया है। वीडियो में गर्भवती लीला कह रही हैं- 9वां महीना है, कल से हमें दर्द हो रहा है। सांसद जी, आप उठवाने की बात कर रहे थे, तो इसलिए प्लीज हमें उठवाने का कष्ट करें। आप हेलिकॉप्टर भेजिए। पढ़ें पूरी खबर

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