मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने दुष्कर्म से गर्भवती हुई एक नाबालिग बालिका को गर्भपात की अनुमति दी है। अपने फैसले में कोर्ट ने कहा कि पीड़िता और उसकी मां को निचली कोर्ट से राहत न मिलने के कारण हाईकोर्ट की शरण लेनी पड़ी। यह चिंताजनक है। साथ ही निचली अदालतों को लेकर निर्देश भी दिए हैं। कहा है कि ऐसे मामलों में खुद विशेष पॉक्सो कोर्ट कानून और एसओपी का पालन करते हुए गर्भपात की अनुमति दे सकते हैं। इससे पीड़िताओं को अनावश्यक रूप से हाईकोर्ट तक न आना पड़ेगा। मामला रतलाम जिले का है। यहां जनवरी 2022 में 16 साल की नाबालिग से दुष्कर्म हुआ था। आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376 और 506 सहित बालकों को लैंगिक अपराधों से संरक्षण अधिनियम, 2012 (पॉक्सो अधिनियम) के तहत दर्ज किया गया। घटना के बाद बालिका गर्भवती हो गई थी। तब 13 मार्च 2022 को औद्योगिक थाना रतलाम में FIR दर्ज कराई गई। पीड़िता की मां ने विशेष पॉक्सो कोर्ट से गर्भपात की अनुमति मांगी थी लेकिन गर्भपात की अनुमति नहीं दी गई। पीड़िता के एडवोकेट नीरज सोनी ने बताया कि इस फैसले की खासियत यह है कि अब विचारण न्यायालय के सामने ऐसे मामले आते हैं तो वे MTP एक्ट के दायरे में और एसओपी का पालन करते हुए पंजीकृत डॉक्टर को गर्भपात कराने की अनुमति दे सकते हैं। पॉक्सो कोर्ट से मांगी थी गर्भपात की अनुमति विशेष पॉक्सो कोर्ट में पीड़िता की तरफ से तर्क दिए गए थे कि बालिका दुष्कर्म के कारण गर्भवती हुई है। अभी वह नाबालिग है। ऐसे में मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट 1971 (चिकित्सकीय गर्भ समापन अधिनियम, 1971, संशोधित नियम 2020 सहित) के प्रावधानों के तहत रजिस्टर्ड डॉक्टर्स को गर्भपात की अनुमति दी जानी चाहिए। हालांकि, निचली कोर्ट ने क्षेत्राधिकार में नहीं होने के चलते यह आवेदन निरस्त कर दिया। निचली अदालत के फैसले के खिलाफ पीड़िता की मां ने हाईकोर्ट की इंदौर बेंच में पुनरीक्षण याचिका दायर की। याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट नीरज सोनी ने याचिका में निचली कोर्ट आदेश को निरस्त करने के लिए कहा गया। साथ ही ऐसे मामलों में निचली अदालतों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने की भी मांग की गई थी। हाईकोर्ट ने दिया यह आदेश, SOP का पालन हो मामले में सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने 1 दिसंबर 2025 को आदेश दिया था। जिसमें हुए स्पष्ट किया कि यदि ऐसे मामले कोर्ट के सामने आते हैं तो वे चिकित्सकीय गर्भ समापन अधिनियम, 1971 और उसके संशोधित नियम 2020 (उपनियम 1, 2, 6 और 7) के तहत रजिस्टर्ड डॉक्टर्स को गर्भपात की अनुमति दे सकते हैं। कोर्ट ने निर्देश दिया कि निर्धारित मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) का पालन किया जाए और ‘स्वप्रेरणा से लिया गया प्रकरण बनाम मध्यप्रदेश राज्य एवं अन्य’ के पैरा 13 में दिए गए निर्देशों को ध्यान में रखा जाए। पीड़िता को झेलनी पड़ती है अतिरिक्त पीड़ा कोर्ट ने टिप्पणी की है कि दुष्कर्म पीड़िता और उसकी मां को निचली कोर्ट से राहत न मिलने के कारण हाईकोर्ट की शरण लेनी पड़ी, जो चिंताजनक है। गर्भपात की प्रक्रिया पहले से ही मानसिक और शारीरिक रूप से संवेदनशील होती है, ऐसे में बार-बार कोर्ट के चक्कर लगाने और खर्च वहन करने से पीड़िता को अतिरिक्त पीड़ा झेलनी पड़ती है। कोर्ट ने यह भी कहा कि विशेष पॉक्सो कोर्ट स्वयं कानून और एसओपी का पालन करते हुए ऐसे मामलों में गर्भपात की अनुमति दे सकते हैं, जिससे पीड़िताओं को अनावश्यक रूप से हाई कोर्ट तक न आना पड़े। खास बात यह रही कि कोर्ट ने कठिन परिस्थितियों के बावजूद न्याय की लड़ाई लड़ने के लिए पीड़िता की मां और उनके एडवोकेट नीरज सोनी की सराहना की। यह टिप्पणी भी की कि डॉक्टरों और निचली कोर्ट को ऐसे संवेदनशील मामलों को गंभीरता से लेते हुए कानून के अनुरूप समय पर अनुमति देनी चाहिए।
24 सप्ताह तक का गर्भ समाप्त करने की अनुमति दरअसल, गर्भावस्था के चिकित्सीय समापन (MTP) अधिनियम, 1971 के तहत नाबालिगों (18 वर्ष से कम आयु) के लिए गर्भावस्था समाप्त करने के लिए कानूनी अभिभावक की लिखित सहमति आवश्यक है। यदि गर्भावस्था नाबालिग के शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा करती है तो यह अधिनियम रजिस्टर्ड चिकित्सा चिकित्सकों द्वारा 20 सप्ताह तक गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति देता है। वहीं, 2021 के संशोधनों के तहत विशेष मामलों 24 सप्ताह तक गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति देता है। जिसमें नाबालिग भी शामिल हैं। फैसले में डॉक्टर की रिपोर्ट रही अहम मामले में मेडिकल बोर्ड के तहत रतलाम जिला अस्पताल की चिकित्सा समिति की रिपोर्ट आधार रही। समिति की अध्यक्ष रतलाम एमसीएच यूनिट की स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. ममता शर्मा हैं। रिपोर्ट के मुताबिक पीड़िता 14 सप्ताह की गर्भवती है और लड़की के कानूनी अभिभावक की सहमति से बिना किसी जोखिम के गर्भपात कराया जा सकता है। डॉक्टरों के मुताबिक अगर लड़की नाबालिक है तो स्वास्थ्य जोखिम है। पॉक्सो एक्ट का केस एक साल में पूरा करना जरूरी कानूनविदों के मुताबिक लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम के तहत मिलने वाले अतिरिक्त अधिकार में लिंग तटस्थ संरक्षण यह अधिनियम के तहत लड़का और लड़की दोनों को यौन अपराधों के शिकार के रूप में समान सुरक्षा प्रदान करता है। दूसरा गोपनीयता और पहचान की सुरक्षा बच्चे की पहचान को गोपनीय रखा जाता है। मीडिया, पुलिस या कोई अन्य व्यक्ति बच्चे का नाम, पता, स्कूल या फोटो उजागर नहीं कर सकता। खास यह कि बाल अनुकूल प्रक्रिया पुलिस को वर्दी के बजाय सादे कपड़ों में बच्चे का बयान लेना होता है और बयान घर पर या बच्चे की पसंद की जगह पर दर्ज किया जा सकता है। यह खबर भी पढ़ें… 6 साल की बच्ची से रेप, जंगल में रोती मिली रायसेन के गौहरगंज में 6 साल की बच्ची से दुष्कर्म का मामला सामने आया है। शनिवार को भीड़ ने जयपुर-जबलपुर नेशनल हाईवे पर जाम लगा दिया। जाम के कारण सैकड़ों गाड़ियां वहां फंस गई। लोगों ने आसपास की दुकानें भी बंद करा दी। पढ़ें पूरी खबर…
