इंदौर के भागीरथपुरा में दिसंबर 2025 में दूषित पानी पीने से बड़ी संख्या में लोग बीमार हुए थे। 36 लोगों की जानें चली गईं। मामले की जांच के एक सदस्यीय जांच आयोग गठित किया था। जिसकी 110 पेजों की रिपोर्ट अब सामने आई है। जिसमें घटना को किसी एक अधिकारी की लापरवाही नहीं मानी है। रिपोर्ट के अनुसार दूषित पानी की घटना कई दशकों में अलग-अलग स्तरों पर हुई तकनीकी, प्रशासनिक और निगरानी संबंधी विफलताओं का सामूहिक परिणाम थी। रिपोर्ट में तत्काल कारण सीवरेज का दूषित पानी पेयजल पाइपलाइन में पहुंचना और मूल कारण सीवरेज नेटवर्क की गलत प्लानिंग व निर्माण को माना गया है। आयोग ने 1990-95 के दौरान सीवरेज प्रोजेक्ट और 1999-2004 के दौरान वाटर सप्लाई पाइपलाइन बिछाने वाले तत्कालीन अधिकारियों, इंजीनियरों और तकनीकी अमले की भूमिका पर जिम्मेदारी तय की है। इसके अलावा बाद के वर्षों में इन लाइनों की जांच, मेंटेनेंस, मॉनिटरिंग और खराब पाइपों को समय पर बदलने में नाकाम रहे नगर निगम के इंजीनियरिंग अमले को भी जिम्मेदार माना है। इन अफसरों को माना जिम्मेदार जांच रिपोर्ट में सुपरिंटेंडिंग इंजीनियर संजीव कुमार श्रीवास्तव की स्पष्ट जिम्मेदारी तय की है। तत्कालीन अतिरिक्त आयुक्त संदीप सोनी, तत्कालीन इंचार्ज असिस्टेंट इंजीनियर सरोज कुमार प्रजापति के अलावा प्रज्ञा तिवारी और नीति चौरसिया खरे को जिम्मेदार माना है। रिपोर्ट में यह भी कहा है कि टेंडर की अंतिम स्वीकृति की शक्ति तत्कालीन अतिरिक्त आयुक्त रोहित सिसोनिया के पास थी। उस अवधि की जिम्मेदारी उनकी भूमिका के अनुसार तय करने की बात आयोग ने कही है। सबसे पहले जानिए- हादसा हुआ कैसे? आयोग के अनुसार- भागीरथपुरा में कई स्थानों पर सीवरेज और पेयजल पाइपलाइन को निर्धारित तकनीकी मानकों के मुताबिक अलग-अलग दूरी पर नहीं रखा गया था। कुछ जगह दोनों पाइपलाइनें समानांतर या एक-दूसरे को क्रॉस करती मिलीं। इससे पाइपलाइन में लीकेज या खराबी होने पर सीवरेज का पानी पेयजल लाइन में जाने का खतरा पैदा हुआ। रिपोर्ट में कहा गया है कि तत्काल कारण सीवरेज का पानी पेयजल वितरण सिस्टम में पहुंचना था, जबकि इसका मूल कारण सीवरेज नेटवर्क की गलत प्लानिंग और निर्माण था। आयोग की नजर में जिम्मेदारी की मुख्य कड़ियां 1. 1990-95 का सीवरेज प्रोजेक्ट तत्कालीन इंदौर विकास प्राधिकरण/संबंधित एजेंसी के वे अधिकारी, इंजीनियर और तकनीकी अधिकारी जिम्मेदार माने गए, जिन्होंने सीवरेज प्रोजेक्ट की प्लानिंग, डिजाइन और निर्माण कराया। आयोग ने कहा कि सीवरेज पाइपलाइन बिछाने में CPHEEO मैनुअल के अनिवार्य इंजीनियरिंग मानकों का पालन नहीं हुआ। 2. 1999-2004 की वाटर सप्लाई पाइपलाइन इस अवधि में पेयजल पाइपलाइन बिछाने वाले जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में रखी गई है। पुरानी और कमजोर हो चुकी व्यवस्था को बाद में समय पर दुरुस्त नहीं किया गया। 3. नगर निगम का इंजीनियरिंग अमला आयोग ने कहा कि सिस्टम नगर निगम के नियंत्रण में आने के बाद उसकी जिम्मेदारी थी कि सीवरेज और पेयजल नेटवर्क की नियमित जांच, मेंटेनेंस, मॉनिटरिंग और जरूरत पड़ने पर पाइप बदलने का काम किया जाए। यह जिम्मेदारी प्रभावी तरीके से नहीं निभाई गई। सबसे स्पष्ट जिम्मेदारी: सुपरिंटेंडिंग इंजीनियर संजीव कुमार श्रीवास्तव आयोग ने संजीव कुमार श्रीवास्तव, सुपरिंटेंडिंग इंजीनियर की भूमिका पर विशेष टिप्पणी की है। रिपोर्ट के मुताबिक वे 2013 से 2026 तक लगातार वाटर सप्लाई विभाग में पदस्थ रहे और संबंधित क्षेत्र की जलापूर्ति व्यवस्था के वरिष्ठ तकनीकी अधिकारी थे। आयोग ने माना कि इतने लंबे कार्यकाल में उन्हें पाइपलाइन की स्थिति, लीकेज, खराब हिस्सों, संक्रमण के खतरे और जर्जर नेटवर्क की जानकारी होना चाहिए थी। इसके बावजूद पर्याप्त: निरीक्षण, प्रिवेंटिव मेंटेनेंस,पाइप बदलने, मॉनिटरिंग की व्यवस्था नहीं हुई। आयोग ने स्पष्ट कहा कि संजीव कुमार श्रीवास्तव को निगरानी, मॉनिटरिंग और प्रिवेंटिव मेंटेनेंस की विफलता की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं किया जा सकता। सरोज कुमार प्रजापति पर भी सीधी जिम्मेदारी इसके बावजूद उन्होंने यह जानकारी वरिष्ठ अधिकारियों तक नहीं पहुंचाई। आयोग ने इसे गंभीर कर्तव्य-चूक मानते हुए सरोज कुमार प्रजापति को मामले में prima facie जिम्मेदार माना है। टेंडर में देरी के लिए इनकी भूमिका भी जांच के घेरे में खराब पाइपलाइनों को बदलने के लिए टेंडर प्रक्रिया में भी बार-बार देरी, टेंडर निरस्तीकरण, री-टेंडरिंग और प्रशासनिक निष्क्रियता सामने आई। आयोग ने टेंडर शाखा की भूमिका पर विशेष रूप से कहा है कि प्रज्ञा तिवारी, असिस्टेंट ग्रेड-III और नीति चौरसिया खरे, सब-इंजीनियर को टेंडर फाइलों के प्रोसेसिंग में हुई देरी के लिए prima facie (प्रथम दृष्टया) जिम्मेदारी से मुक्त नहीं किया जा सकता। उनकी जिम्मेदारी उनके निर्धारित काम तक सीमित रहेगी और यह इस बात पर निर्भर करेगी कि फाइल किस स्तर पर कितने समय लंबित रही। इसके अलावा यदि फाइल अंतिम मंजूरी के लिए रोहित सिसोनिया के स्तर पर लंबित रही थी, तो उस अवधि की जिम्मेदारी उनकी भूमिका के अनुसार तय करने की बात आयोग ने कही है। यानी टेंडर देरी को आयोग ने महज कागजी देरी नहीं माना रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि टेंडर समय पर पूरा होकर खराब पाइपलाइन घटना से पहले बदल दी जाती तो दूषित पानी की घटना को रोका जा सकता था। इसलिए टेंडर में देरी को घटना में contributing factor माना गया है। 2019 की पानी जांच रिपोर्ट पर भी सवाल आयोग ने 8 फरवरी 2019 की मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट का भी उल्लेख किया है। इसमें इंदौर के 60 ट्यूबवेल/हैंडपंपों के पानी की जांच में पानी को निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं पाया गया था और क्लोरीनेशन के बाद ही उपयोग की सलाह दी गई थी। रिपोर्ट के मुताबिक उस समय नगर निगम आयुक्त आशीष सिंह और वाटर सप्लाई से जुड़े तत्कालीन अतिरिक्त आयुक्त संदीप सोनी के स्तर पर इस रिपोर्ट के बाद तत्काल प्रभावी सुधारात्मक एवं निवारक कदम उठाए जाने चाहिए थे। आयोग ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसे कदम उठाए जाने का पर्याप्त प्रमाण नहीं मिला। किसे मिली स्पष्ट क्लीन चिट? रिपोर्ट में तत्कालीन निगम कमिश्नर दिलीप कुमार यादव, पूर्व निगम कमिश्नर शिवम वर्मा, पूर्व निगम कमिश्नर प्रतिभा पाल और अपर आयुक्त अभिलाष मिश्रा को क्लिन चिट दे दी गई है। इन्हें जिम्मेदारी से मुक्त किया गया है। आयोग ने तीन महत्वपूर्ण बातें कहीं टेंडर की अंतिम मंजूरी का अधिकार उस समय निगमायुक्त के पास नहीं था। संबंधित टेंडर की अंतिम स्वीकृति की शक्ति तत्कालीन अतिरिक्त आयुक्त रोहित सिसोनिया के पास थी। दिलीप कुमार यादव ने 11 सितंबर 2025 को निगमायुक्त का पद संभाला और घटना की जानकारी मिलने के बाद आवश्यक प्रशासनिक एवं आपात कदम उठाए। आयोग ने साफ कहा कि दिलीप कुमार यादव पर टेंडर में देरी या दूषित पानी की घटना के लिए कोई प्रत्यक्ष प्रशासनिक या कानूनी जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती। खास बातें, जो रिपोर्ट को बनाती हैं महत्वपूर्ण 1. हादसा ‘अचानक’ नहीं था आयोग ने कहा कि यह घटना लंबे समय से विकसित हो रही तकनीकी और प्रशासनिक खामियों का परिणाम थी। 2. मूल समस्या पाइपलाइन का गलत डिजाइन/लेआउट सीवरेज और पेयजल पाइपलाइन के बीच निर्धारित दूरी और सुरक्षा मानकों का पालन नहीं किया गया था। 3. सिर्फ पुराने अफसरों पर जिम्मेदारी नहीं आयोग ने कहा कि पाइपलाइन भले दशकों पहले बिछी हो, लेकिन बाद में पदस्थ इंजीनियरों की जिम्मेदारी थी कि वे उसकी हालत की निगरानी करते और समय पर मरम्मत/रिप्लेसमेंट कराते। 4. 13 साल की लगातार पोस्टिंग पर सवाल संजीव कुमार श्रीवास्तव की 2013 से 2026 तक लगातार पोस्टिंग को आयोग ने विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना और कहा कि इतने लंबे समय में जर्जर व्यवस्था से अनजान रहना स्वीकार्य नहीं है। 5. सरोज प्रजापति ने कई खतरे स्वीकार किए लीकेज, दूषित पानी, बदबू, बैक्टीरिया, ड्रेनेज की नजदीकी और औद्योगिक अपशिष्ट की जानकारी होने के बावजूद वरिष्ठ अधिकारियों को रिपोर्ट नहीं करना आयोग के निष्कर्ष में महत्वपूर्ण है। 6. टेंडर में देरी ने खतरा बढ़ाया खराब पाइप बदलने की प्रक्रिया में देरी के कारण पहले से कमजोर नेटवर्क बना रहा और आयोग ने इसे घटना में योगदान देने वाला कारण माना। 7. आयोग ने घटना को पूरी तरह ‘प्रिवेंटेबल’ माना अंतिम टिप्पणी में आयोग ने कहा कि यह घटना रोकी जा सकती थी और कानून के शासन वाले संवैधानिक तंत्र में ऐसी विफलता के साथ जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। 8. भविष्य के लिए सख्त इंजीनियरिंग मानकों की सिफारिश आयोग ने कहा कि सीवरेज और पेयजल पाइपलाइन के बीच मानक दूरी, नियमित निरीक्षण, लीकेज टेस्टिंग, प्रिवेंटिव मेंटेनेंस और क्रॉस-कनेक्शन से सुरक्षा को अनिवार्य रूप से लागू किया जाना चाहिए।
