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MP के 5 लाख संविदा-आउटसोर्स कर्मचारियों को राहत:हाईकोर्ट ने कहा- लाभ से वंचित रखना तर्कहीन; सरकार वर्गीकरण कर वेतन-लाभ दे

मध्यप्रदेश में करीब साढ़े 4 से 5 लाख संविदा और आउटसोर्स कर्मचारियों को बड़ी राहत मिली है। जबलपुर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिए हैं कि इन कर्मचारियों का वर्गीकरण कर उन्हें वेतन और सेवा संबंधी लाभ दिए जाएं। जस्टिस विशाल धगट की बेंच ने मंगलवार को सुनाए फैसले में कहा कि 10 साल से अधिक समय से सेवा दे रहे कर्मचारियों को 7 अक्टूबर 2016 की नीति का लाभ मिलना चाहिए, चाहे वे संविदा पर हों या आउटसोर्स व्यवस्था के तहत काम कर रहे हों। कोर्ट ने साफ कहा कि लंबे समय तक काम लेने के बाद कर्मचारियों को लाभ से वंचित रखना तर्कहीन है और उन्हें आर्थिक न्याय से दूर नहीं रखा जा सकता। अभी तक दैनिक वेतनभोगियों को मिल रहा था लाभ
अदालत ने यह भी माना कि 2016 की नीति संविधान के अनुच्छेद 38, 39 और 43 में बताए गए सामाजिक और आर्थिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप है। अब तक इस नीति का लाभ केवल दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों को दिया जा रहा था। इसमें उन्हें कुशल, अर्धकुशल और अकुशल श्रेणियों के आधार पर वेतन मिलता है, लेकिन हाईकोर्ट ने कहा कि इसी आधार पर संविदा और आउटसोर्स कर्मचारियों को भी शामिल किया जाए। 16 साल से सेवाएं दे रहे हैं संविदा कर्मचारी यह मामला 2009 में संविदा पर नियुक्त उन कर्मचारियों से जुड़ा है, जो करीब 16 साल से लगातार सेवाएं दे रहे हैं, लेकिन उन्हें स्थायी कर्मचारियों जैसे लाभ नहीं मिले। समानता के अधिकार का बताया उल्लंघन संविदा और आउटसोर्स कर्मचारियों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि वे स्थायी कर्मचारियों के बराबर काम करते हैं, फिर भी उन्हें कम वेतन दिया जाता है। यह संविधान से मिले समानता के अधिकार और सम्मान से जीवन जीने के अधिकार का उल्लंघन है। सरकार की दलील कोर्ट ने की खारिज सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने तर्क दिया कि 2016 की नीति संविदा और आउटसोर्स कर्मचारियों पर लागू नहीं होती, लेकिन कोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया और सरकार को निर्देश दिए कि कर्मचारियों का वर्गीकरण कर उन्हें वेतनमान और सेवा संबंधी लाभ सुनिश्चित किए जाएं।

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