छतरपुर जिले में खजुराहो के मंदिर सिर्फ पत्थर की इमारतें नहीं, बल्कि भारतीय स्थापत्य कला का वो शिखर हैं, जिसे दुनिया आज भी हैरत से देखती है। 9वीं से 11वीं शताब्दी के बीच चंदेल वंश के राजाओं ने इन मंदिरों का निर्माण कराया। अक्सर लोग खजुराहो को केवल उसकी ‘कामुक मूर्तियों’ के लिए जानते हैं, लेकिन इतिहासकार और रिसर्चर अनुराग शुक्ला का शोध अलग ही कहानी बयां करता है। उनके अनुसार, यहां की हर मूर्ति के पीछे गहरा वैज्ञानिक और आध्यात्मिक रहस्य छिपा है। 85 मंदिरों का शहर, अब बचे सिर्फ 25 रिसर्चर अनुराग शुक्ला बताते हैं कि खजुराहो के वैभव का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि किसी समय यहां इस तरह के 85 मंदिर हुआ करते थे, जिनमें से वक्त की मार झेलते हुए अब केवल 25 ही सुरक्षित बचे हैं। मंदिरों का निर्माण 9वीं सदी में राजा यशोवर्मन के काल में शुरू हुआ। धंगदेव के समय अपने वैभव के साथ चरम पर था। कश्मीर से श्रीलंका तक था साम्राज्य अनुराग शुक्ला कहते हैं- लक्ष्मण और विश्वनाथ मंदिर के शिलालेखों से पता चलता है कि चंदेल राजाओं का साम्राज्य कितना विस्तृत था। इन अभिलेखों में जिक्र है कि उन्होंने कश्मीर, मिथिला (बिहार), मालवा, कौशल, श्रीलंका और आंध्र प्रदेश तक राज किया था। यह प्रमाण है कि खजुराहो उस समय का एक बहुत बड़ा राजनीतिक और सांस्कृतिक केंद्र था, लेकिन दुर्भाग्य से भारतीय इतिहास की मुख्यधारा की किताबों में इन शक्तिशाली राजाओं को वह जगह नहीं मिली जिसके वे हकदार थे। खबर में आगे बढ़ने से पहले तस्वीरें देख लीजिए… प्रतिमाएं सनातन धर्म का मूल आधार खजुराहो की मूर्तियों को लेकर दुनिया भर में अलग-अलग धारणाएं हैं। रिसर्चर अनुराग शुक्ला इसके पीछे ‘आगम तंत्र’ का तर्क देते हैं। सनातन धर्म के चार पुरुषार्थों- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष में ‘काम’ को महत्वपूर्ण आधार माना गया है। वास्तु शास्त्र के अनुसार, जिस तरह एक घर स्त्रियों के श्रृंगार के बिना अधूरा है, उसी तरह मंदिर भी तब तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक उसमें जीवन के सभी रसों (श्रृंगार और काम) को स्थापित न किया जाए। मंदिर में छिपा है ‘कुंडलिनी जागरण’ का रहस्य इसका सबसे गहरा रहस्य ‘कुंडलिनी जागरण’ से जुड़ा है। कंदरिया महादेव मंदिर में एक प्रसिद्ध प्रतिमा है, जिसमें एक पुरुष शीर्षासन की मुद्रा में है और तीन स्त्रियां उसके साथ हैं। साधारण व्यक्ति इसे सहवास मानता है, लेकिन तंत्र विज्ञान में यह तीन स्त्रियां इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना नाड़ियों का प्रतीक हैं। शीर्षासन में पुरुष अपने मूलाधार चक्र से ऊर्जा को सहस्रार चक्र की ओर ले जा रहा है। यह प्रक्रिया चक्र जागरण का एक यंत्र है। प्राचीन समय में खजुराहो शिक्षा का केंद्र था, जहां कामसूत्र के माध्यम से काम शिक्षा और अर्थशास्त्र के माध्यम से जीवन जीने की कला सिखाई जाती थी। क्या शिलालेखों में दर्ज ‘चन्द्रदत्तेय’ ही चंद्रवर्मन हैं? खजुराहो की उत्पत्ति को लेकर ‘परमालरासो’ के अल्हखंड में एक रोचक कथा मिलती है। कहा जाता है कि बनारस के ज्योतिषी मनीराम की पुत्री हेमवती को देखकर चंद्रमा मोहित हो गए थे। चंद्रमा धरती पर आए और एक पूरे पाख (पक्ष) तक हेमवती के साथ रहे, जिससे चंद्रवर्मन का जन्म हुआ। मान्यता है कि चंद्रमा ने ही चंद्रवर्मन को पारसमणि दी और यहां यज्ञ कराकर मंदिरों का निर्माण शुरू कराया। हालांकि, अनुराग शुक्ला के शोध में एक नया मोड़ आता है। जब उन्होंने लक्ष्मण और विश्वनाथ मंदिर के प्राचीन शिलालेखों का अध्ययन किया, तो वहां ‘चंद्रवर्मन’ नाम का जिक्र नहीं मिलता। इसके बजाय वहां ‘चन्द्रदत्तेय’नाम का उल्लेख है। यह नाम एक ऋषि गोत्र से जुड़ा हुआ प्रतीत होता है, जो यह संकेत देता है कि शायद इतिहास को कहानियों के जरिए थोड़ा बदल दिया गया, जबकि वास्तविकता राजाओं के वंशानुगत गोत्र और उनकी ऋषि परंपरा से जुड़ी थी। खजुराहो के मंदिरों कभी नहीं हुआ हमला एक आम धारणा है कि खजुराहो के मंदिरों को विदेशी आक्रांताओं ने तोड़ा, लेकिन ऐतिहासिक तथ्य कुछ और ही इशारा करते हैं। अनुराग शुक्ला का कहना है कि महमूद गजनी का आक्रमण कालिंजर तक तो हुआ, लेकिन खजुराहो के मंदिरों पर बड़े इस्लामिक आक्रमण के ठोस प्रमाण नहीं मिलते। प्रसिद्ध यात्रियों अलबरूनी और इब्नबतूता ने यहां का भ्रमण किया, लेकिन उन्होंने किसी बड़े हमले का जिक्र नहीं किया। मंदिरों के क्षतिग्रस्त होने के तीन मुख्य कारण
