मध्य प्रदेश की राजनीति, नौकरशाही और अन्य घटनाओं पर चुटीली और खरी बात का वीडियो (VIDEO) देखने के लिए ऊपर क्लिक करें। इन खबरों को आप पढ़ भी सकते हैं। ‘बात खरी है’ मंगलवार से रविवार तक हर सुबह 6 बजे से दैनिक भास्कर एप पर मिलेगा। सीएम का इशारा, विधायक के बदले हाव-भाव
नीमच में सीएम डॉ. मोहन यादव के मंच पर पूर्व मंत्री और जावद विधायक ओमप्रकाश सकलेचा नाराज नजर आए। हुआ यूं कि सकलेचा मंच से भाषण दे रहे थे। समय की कमी को देखते हुए सीएम मोहन यादव ने उन्हें भाषण छोटा रखने का इशारा किया। सीएम का इशारा मिलते ही सकलेचा के हाव-भाव बदल गए। उन्होंने अपना भाषण बीच में ही समाप्त कर दिया। चेहरे पर नाराजगी साफ झलक रही थी। उन्होंने कागज समेटे और सीधे अपनी कुर्सी पर जाकर बैठ गए। यह पूरा वाकया मीडिया के कैमरों में कैद हो गया। अब सोशल मीडिया पर लोग इसे खूब शेयर कर रहे हैं। चुटकी लेते हुए कह रहे हैं कि मंच, माइक और सामने जनता हो तो नेता जी का भाषण भला कैसे रुके.. आखिरकार उनकी रफ्तार पर ब्रेक लगाने की जिम्मेदारी खुद सीएम को निभानी पड़ी। बड़े नेता नहीं मान रहे प्रधानमंत्री मोदी की बात
लगता है भाजपा के बड़े नेता ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पेट्रोल-डीजल बचाने की अपील भूल गए हैं। तभी तो सड़कों पर एक बार फिर नेताओं के लंबे-लंबे काफिले नजर आने लगे हैं। बैतूल में सीएम डॉ. मोहन यादव और गुना में केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया कई गाड़ियों के काफिले के साथ दिखे। वहीं, हाल ही में सीहोर के भैरूंदा दौरे पर केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान भी लंबे काफिले के साथ सड़क पर नजर आए। यह चर्चा इसलिए फिर शुरू हुई है, क्योंकि दो दिन पहले प्रधानमंत्री मोदी ने अपने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में पेट्रोल-डीजल बचाने की अपनी पुरानी अपील का जिक्र करते हुए सहयोग करने वाली जनता का आभार जताया था। खरी बात ये है कि प्रधानमंत्री की अपील पर जनता ने तो अमल किया, लेकिन उनके अपने ही नेताओं की गाड़ियों की कतारें कम होती नहीं दिख रहीं। शुरुआत में फोटो खिंचवाने तक तो अपील याद रही, लेकिन अब लगता है कि नेताओं के लिए उसकी ‘वैलिडिटी’ खत्म हो गई है। सीएम यादव के बाद खेत में उतरे जीतू पटवारी
मध्य प्रदेश की राजनीति में इन दिनों ‘तू डाल-डाल, मैं पात-पात’ वाली सियासी तस्वीर देखने को मिल रही है। बैतूल में पहले मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव किसानों के बीच पहुंचे और उनके साथ खेत में मक्का की बोवनी की। इसके अगले ही दिन कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी भी बैतूल के एक खेत में नजर आए। उन्होंने किसानों के साथ हल चलाकर खेती-किसानी से जुड़ाव का संदेश देने की कोशिश की। दोनों नेताओं के इस रोल पर सियासी चर्चाएं तेज हो गई हैं। लोग इसे किसानों के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने और खुद को बड़ा किसान हितैषी साबित करने की होड़ के रूप में देख रहे हैं। वैसे खेत में उतरकर दोनों नेताओं ने पसीना तो खूब बहाया, लेकिन इसका राजनीतिक फायदा किसे मिलेगा, यह अभी भविष्य के गर्भ में है। सबकी नजर 2028 के विधानसभा चुनाव पर रहेगी। तब पता चलेगा कि खेतों में बहाया गया यह पसीना किसके लिए वोटों की लहलहाती फसल बनकर सामने आता है। सिंधिया के कार्यक्रमों से दूर रहे भाजपा विधायक
क्या मध्य प्रदेश भाजपा में ‘मूल भाजपा’ और ‘महाराज भाजपा’ के बीच पटरी नहीं बैठ रही है? गुना की राजनीति में पिछले दिनों जो सीन बना, वो तो कुछ ऐसी ही कहानी बयां कर रहा है। दरअसल, केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया तीन दिन के गुना दौरे पर रहे। लेकिन गुना से भाजपा विधायक पन्नालाल शाक्य ने उनके कार्यक्रमों से दूरी बनाए रखी। एक कार्यक्रम में तो मंच पर सिंधिया के पास ही गुना विधायक पन्नालाल शाक्य के नाम की कुर्सी तक लगी थी, लेकिन वे कार्यक्रम में नहीं पहुंचे। इतना ही नहीं, सिंधिया की मौजूदगी में कलेक्ट्रेट में आयोजित दिशा समिति की सरकारी बैठक से भी विधायक पन्नालाल शाक्य गैरहाजिर रहे। विधायक की यह दूरी इसलिए भी चर्चा में है, क्योंकि हाल ही में उन्होंने सिंधिया के करीबी माने जाने वाले दो मंत्रियों पर सार्वजनिक रूप से निशाना साधा था। ऐसे में सिंधिया के महत्वपूर्ण दौरे से उनकी गैरमौजूदगी को महज संयोग नहीं माना जा रहा। अब लोग कह रहे हैं कि जब धुआं उठता दिख रहा है, तो कहीं न कहीं आग भी जरूर लगी होगी। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि यह सिर्फ संयोग था या इसके पीछे कोई बड़ा सियासी संदेश छिपा है। और अब अंदर की बात.. सरकारी कार्यक्रम पर भारी पड़ी मंत्री की भक्ति
एक राज्य मंत्री की भक्ति सरकारी कार्यक्रम पर भारी पड़ती नजर आई। दरअसल, मंत्री की ड्यूटी जल गंगा संवर्धन अभियान में लगाई गई थी। लेकिन उसी दिन उनके घर एक कथावाचक का आगमन प्रस्तावित है। बस यही वजह है कि उन्होंने सरकारी कार्यक्रम में जाने में असमर्थता जताई। साथ ही अपनी जगह किसी दूसरे जनप्रतिनिधि की ड्यूटी लगाने का अनुरोध किया है। अब लोग सवाल उठा रहे हैं कि जल गंगा संवर्धन जैसे महत्वपूर्ण कार्यक्रम और जनता की सेवा ज्यादा जरूरी है या किसी बाबा की भक्ति। इनपुट सहयोग – मनीष बागड़ी (जावद), बबलू किलोरिया (नीमच), इरशाद हिंदुस्तानी (बैतूल), आशीष रघुवंशी (गुना) ये भी पढ़ें –
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