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विंध्य हर्बल के प्रोडक्ट्स की रिपोर्ट सवालों के घेरे में:35% सैंपल फेल होने का दावा, साइंटिस्ट को सेवा से हटाने की सिफारिश

विंध्य हर्बल के प्रोडक्ट्स के सैंपल फेल होने और यहां चल रहे विवाद के कारण हर्बल प्रोडक्ट्स की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे हैं। इसके बाद यहां संविदा पर पदस्थ रहे साइंटिस्ट डॉ. दीपक द्विवेदी की सेवा समाप्ति की सिफारिश की गई है। द्विवेदी पर आरोप है कि टेस्ट रिपोर्ट में हेरफेर, गुणवत्ता जांच के मानकों में बदलाव, अधिकारियों के निर्देश नहीं मानने और काम में लापरवाही उनकी आदत में शामिल है। दूसरी ओर डॉ. द्विवेदी ने खुद को दिए नोटिस के जवाब में कहा है कि उन्होंने हमेशा नियमों के अनुसार काम किया और गुणवत्ता से समझौता करने से इनकार किया। उनका आरोप है कि मनमाफिक रिपोर्ट बनाने के लिए मंत्री स्टाफ की ओर से उन पर दबाव बनाया जा रहा था। लघु वनोपज प्रसंस्करण और अनुसंधान केंद्र के दस्तावेजों के मुताबिक पिछले तीन सालों में एमएफपी पार्क में तैयार किए गए उत्पादों के 32 से 35 प्रतिशत सैंपल शासकीय आयुष लैब, ग्वालियर में फेल पाए गए। प्रबंधन का दावा है कि जांच प्रक्रिया में गड़बड़ी और गलत मानकों के इस्तेमाल के कारण यह स्थिति बनी। वहीं डॉ. द्विवेदी का कहना है कि उन्होंने वैज्ञानिक नियमों के अनुसार काम किया और गुणवत्ता से जुड़े मुद्दे उठाने के कारण विवादों में घिर गए। तिल तेल की रिपोर्ट बनी विवाद की वजह डॉ. दीपक द्विवेदी के खिलाफ तैयार आरोप पत्र में तिल तेल की गुणवत्ता जांच रिपोर्ट को सबसे महत्वपूर्ण आधार माना गया है। दस्तावेजों के अनुसार तिल तेल के अलग-अलग बैचों की जांच रिपोर्ट की तुलना के दौरान अधिकारियों ने पाया कि पहले जिन मामलों में एक निश्चित मानक अपनाया जा रहा था, बाद की रिपोर्ट में अलग मानक इस्तेमाल किए गए। रिपोर्ट के अनुसार एक तिल तेल सैंपल की जांच में एसिड वैल्यू 4.2 दर्ज की गई थी और उसकी एक्सेप्टेंस लिमिट 6.0 रखी गई थी, जिसके आधार पर सैंपल पास माना गया। प्रबंधन का आरोप है कि पहले इसी तरह की जांच में अलग सीमा लागू की जाती थी। इसी अंतर को अधिकारियों ने रिपोर्ट में हेरफेर का आधार माना। वर्ष 2024 के अंत और 2025 की शुरुआत में इन रिपोर्टों की समीक्षा की गई, जिसके बाद अधिकारियों ने स्पष्टीकरण मांगा। एक ही सामग्री की जांच अलग-अलग तरीके से करने का आरोप संस्थान ने आरोप है कि कई मामलों में एक ही सामग्री की जांच अलग-अलग मानकों पर की गई। कभी रिपोर्ट पास हुई तो कभी फेल। अधिकारियों का कहना है कि कच्चे माल की जांच में बदलाव का असर सीधे तैयार उत्पादों की गुणवत्ता पर पड़ता है। आरोप पत्र में कहा गया है कि यदि गलत मानकों के आधार पर कच्चे माल को मंजूरी दी जाती है तो उससे तैयार उत्पाद बाद में गुणवत्ता जांच में फेल हो सकते हैं। इससे संस्था को आर्थिक नुकसान होने के साथ उसकी साख भी प्रभावित होती है। CEO की रिपोर्ट में गंभीर आरोप 24 जुलाई 2025 को लघु वनोपज प्रसंस्करण एवं अनुसंधान केंद्र की तत्कालीन CEO गीतांजलि जे. ने तत्कालीन प्रबंध संचालक को भेजे पत्र में परीक्षण प्रक्रिया में हेरफेर का उल्लेख किया था। रिपोर्ट में कहा गया कि औषधियों की जांच में उपयोग होने वाली एक्सेप्टेंस लिमिट, टेस्टिंग प्रोसीजर और टेस्ट पैरामीटर बदले गए। दस्तावेजों के आधार पर संबंधित कर्मचारी को सेवा से पृथक करने तक की अनुशंसा की गई थी। कम उपस्थिति भी पाई गई डॉ. दीपक द्विवेदी और प्रबंधन के बीच विवाद की शुरुआत वर्ष 2021 में ही हो गई थी। अगस्त 2021 में उपस्थिति रजिस्टर की जांच के दौरान अधिकारियों ने पाया कि कई कर्मचारियों के हस्ताक्षर नियमित रूप से दर्ज नहीं थे। जांच में यह भी सामने आया कि डॉ. दीपक द्विवेदी के पूरे महीने में केवल दो दिन के हस्ताक्षर दर्ज थे। इसके बाद 3 सितंबर 2021 को उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। इसके बाद प्रबंधन ने नोटिस में पूछा कि जब वे नियमित रूप से कार्यालय आ रहे थे तो उपस्थिति रजिस्टर में हस्ताक्षर क्यों नहीं किए गए। महिला वैज्ञानिक की शिकायत भी वजह विवाद केवल टेस्ट रिपोर्ट तक सीमित नहीं रहा। संस्थान में कार्यरत एक महिला वैज्ञानिक ने भी डॉ. द्विवेदी के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में आरोप लगाया गया कि वे काम में हस्तक्षेप करते हैं, अनावश्यक दबाव बनाते हैं और लैब का माहौल प्रभावित करते हैं। शिकायत में यह भी कहा गया कि उनके व्यवहार के कारण कर्मचारियों के बीच तनाव पैदा हुआ और कामकाज प्रभावित हुआ। प्रबंधन ने इस शिकायत को भी कार्रवाई का हिस्सा बनाया है। दीपक का नियमानुसार काम का दावा, मंत्री स्टाफ के नाम पर धमकाया डॉ. दीपक द्विवेदी ने अपने जवाब में अधिकांश आरोपों को खारिज किया है। उनका कहना है कि उन्होंने उपलब्ध वैज्ञानिक मानकों और नियमों के आधार पर परीक्षण किए। तिल तेल के मामले में उन्होंने एफएसएसएआई के नियमों का हवाला देते हुए कहा कि रिपोर्ट उसी आधार पर तैयार की गई थी। उन्होंने अपने जवाब में यह भी कहा कि कुछ रिपोर्ट बिना पूरी प्रक्रिया का पालन किए जारी की जा रही थीं और गुणवत्ता जांच व्यवस्था का सही तरीके से पालन नहीं हो रहा था। दावा है कि उन्होंने कई बार इस संबंध में आपत्तियां दर्ज कराई थीं। उन्होंने कहा कि उन्हें एक अज्ञात नंबर से फोन आया था। फोन करने वाले ने खुद को सहकारिता मंत्री के स्टाफ से जुड़ा व्यक्ति बताया और कुछ टेस्ट रिपोर्ट को विशेष तरीके से तैयार करने का दबाव बनाया। ऐसा नहीं करने पर नौकरी से हटाने जैसी बातें कही गईं। मुख्यालय भेजने के बाद तेज हुई कार्रवाई मार्च 2025 में डॉ. दीपक द्विवेदी को मुख्यालय भोपाल से संबद्ध कर दिया गया। इसके बाद उनके खिलाफ शिकायतों, नोटिसों और जवाबों को एकत्र कर आरोप पत्र तैयार किया गया।

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