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वंदे मातरम विवाद: कानून, आस्था और सम्मान के बीच सवाल:माफी के बावजूद पार्षदों पर 196(1) की कार्रवाई; कानूनविद् ने दिया सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला

नगर निगम के बजट सत्र के दौरान वंदे मातरम् के मुद्दे पर विवाद के बाद पुलिस ने पार्षद रुबीना खान और फौजिया शेख के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 196(1) के तहत केस दर्ज किया है। यह धारा धर्म, जाति या भाषा के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता बढ़ाने से संबंधित है, जिसमें दोष सिद्ध होने पर 3 से 5 वर्ष तक की सजा का प्रावधान है। मामले में दोनों पार्षदों का कहना था कि इस्लाम में वंदे मातरम् गाने की अनुमति नहीं है, इसलिए वे इसे नहीं गाएंगी और किसी को भी उन्हें बाध्य करने का अधिकार नहीं है। उनका तर्क था कि संविधान उन्हें धार्मिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आजादी प्रदान करता है। दोनों पार्षदों ने अपने बयान पर खेद जताते हुए स्पष्ट किया कि वे वंदे मातरम् का सम्मान करती हैं। हालांकि इस बीच उनके खिलाफ मामला दर्ज हो गया। शांतिपूर्ण असहमति अपराध नहीं मामले को लेकर सीनियर एडवोकेट नीरज सोनी (हाई कोर्ट) ने बताया कि बजट सत्र में भाजपा और कांग्रेस, दोनों दलों के जनप्रतिनिधि मौजूद थे और सभी को कानून की जानकारी है। यदि कोई व्यक्ति राष्ट्रगीत या राष्ट्रगान के दौरान शांतिपूर्वक खड़ा रहकर यह कहता है कि उसका धर्म इसकी अनुमति नहीं देता, तो इसे न तो कानून का अपमान माना जा सकता है और न ही राष्ट्रगीत का। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के चर्चित बीजू इमानुएल फैसले का हवाला देते हुए कहा स्पष्ट किया कि शांतिपूर्ण ढंग से असहमति जताना अपराध की श्रेणी में नहीं आता। यह निर्णय देशभर में सभी पर समान रूप से लागू होता है चाहे वह पुलिस हो, प्रशासन हो या न्याय पालिका। धारा 196(1) का प्रयोग सोच-समझकर हो एडवोकेट सोनी का कहना है कि धारा 196(1) का प्रयोग अत्यंत सावधानी से किया जाना चाहिए। उनके अनुसार यह मामला राजनीतिक प्रतीत होता है और ऐसे मामलों में प्राथमिकी दर्ज करने से पहले पूरी जानकारी की आवश्यकता है। किसी भी शहर और देश के विकास के लिए धार्मिक विवादों से अधिक आवश्यक है आपसी सौहार्द और समन्वय। मिलजुल कर व्यवस्थाएं चलाना ज्यादा महत्वपूर्ण है। ऐसे मामलों में संवेदनशीलता और कानूनी समझ दोनों जरूरी है। इस केस की स्थिति को लेकर उन्होंने कहा कि चूंकि दोनों पार्षदों ने तात्कालिक आवेश में जो कुछ कहा कि वह जरूर आक्रामक था। इसके डिजिटल इविडेंस (वीडियो बयान आदि) हैं और दोष सिद्ध होने पर 3 से 5 साल तक की सजा का प्रावधान है। चूंकि उनके बयान के बाद धर्म, जाति या भाषा के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता या वैमनस्य जैसी स्थिति निर्मित नहीं हुई। इसके साथ ही दोनों इसके लिए खेद जता कर सम्मान कर चुकी है, यह उन्हें राहत दे सकता है।

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