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राज्योत्सव के दूसरे दिन लोक-जनजातीय नृत्यों की धूम:गोंड, बैगा, भील और सहरिया नृत्यों ने दिखाई प्रदेश की सांस्कृतिक विविधता

मध्य प्रदेश के 71वें स्थापना दिवस समारोह के दूसरे दिन सोमवार को लाल परेड ग्राउंड में लोक संस्कृति, जनजातीय परंपराओं और संगीत का संगम देखने को मिला। शाम को प्रदेश के अलग-अलग अंचलों के लोक एवं जनजातीय नृत्यों ने दर्शकों को आकर्षित किया। वहीं, भोपाल के कलाकारों के समूह ‘वॉयस ऑफ विंड’ की प्रस्तुति ‘अनुगूंज- द ब्रीदिंग फिएस्टा’ में 1955 से 2015 तक के हिंदी फिल्मी गीतों की धुनें वाद्ययंत्रों पर सुनाई दीं। बिना शब्दों के हार्मोनिका, मेलोडिका, बांसुरी और सैक्सोफोन से निकली धुनों ने श्रोताओं को पुराने दौर के गीतों और उनसे जुड़ी यादों तक पहुंचाया। तीन दिवसीय समारोह के दूसरे दिन लाल परेड ग्राउंड में प्रदर्शनियों, देशज व्यंजन मेले और कृषि आधारित सेमिनार के जरिए भी प्रदेश की उपलब्धियों और परंपराओं को सामने रखा गया। दिनभर परिसर में लोगों की आवाजाही रही। शाम को सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का सिलसिला शुरू हुआ, जिसमें मध्यप्रदेश के साथ हरियाणा, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के कलाकारों ने भी अपनी कला का प्रदर्शन किया। गोंड, बैगा, भील और सहरिया नृत्यों में दिखी जनजातीय संस्कृति लोक एवं जनजातीय नृत्यों की शुरुआत मध्यप्रदेश की पारंपरिक प्रस्तुतियों से हुई। डिंडोरी के कलाकारों ने गोंड करमा और बैगा करमा नृत्य पेश किए। इन प्रस्तुतियों में प्रकृति से जुड़ाव, सामूहिक जीवन और उत्सव की परंपरा दिखाई दी। इसके बाद गोंड गुदुमबाजा नृत्य में पारंपरिक वाद्ययंत्रों की थाप और कलाकारों की लयबद्ध गतियों ने दर्शकों का ध्यान खींचा। श्योपुर के कलाकारों ने सहरिया जनजाति का लहंगी नृत्य प्रस्तुत किया। धार के कलाकारों ने भील समुदाय के भगोरिया नृत्य के जरिए पश्चिमी मध्यप्रदेश की जनजातीय संस्कृति के उल्लासपूर्ण रंग दिखाए। इसके अलावा बुंदेलखंड की बधाई नृत्य परंपरा और हरदा के कलाकारों का डंडा नृत्य भी प्रस्तुत किया गया। डंडा नृत्य में कलाकारों का तालमेल और लयबद्ध पदचालन आकर्षण का केंद्र रहा। राजस्थान के सपेरा और छत्तीसगढ़ के पंथी नृत्य ने भी बांधा समां दूसरे राज्यों की प्रस्तुतियों में हरियाणा का घूमर, राजस्थान का सपेरा और छत्तीसगढ़ का पंथी नृत्य शामिल रहा। घूमर में कलाकारों की गोलाकार घूमती पदचाल और पारंपरिक वेशभूषा ने दर्शकों को आकर्षित किया। राजस्थान के कालबेलिया समुदाय से जुड़े सपेरा नृत्य में कलाकारों ने सर्प की गति से प्रेरित लचकदार मुद्राएं प्रस्तुत कीं। वहीं, छत्तीसगढ़ के पंथी नृत्य के जरिए सतनामी समाज की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपराओं की झलक दिखाई गई। वाद्ययंत्रों पर सुनाई दिए ‘रमैया वस्तावैया’ और ‘दम मारो दम’ शाम का दूसरा बड़ा आकर्षण ‘अनुगूँज- द ब्रीदिंग फिएस्टा’ रहा। वॉयस ऑफ विंड, भोपाल के कलाकारों ने हिंदी सिनेमा के सदाबहार गीतों को विंड इंस्ट्रूमेंट्स पर नए अंदाज में पेश किया। हार्मोनिका पर ‘रमैया वस्तावैया’, ‘मैं शायर तो नहीं’, ‘दम मारो दम’, ‘आओ हुजूर तुमको’, ‘याद आ रहा है तेरा प्यार’ और ‘डम डम डिगा डिगा’ जैसी धुनें सुनाई दीं। मेलोडिका पर ‘नीले नीले अंबर पर’ की प्रस्तुति हुई। बांसुरी पर ‘मोह मोह के धागे’ और ‘मय से मीना से ना’ की धुनों ने माहौल को मधुर बनाया। युवा कलाकार सिद्धि सोनी ने सैक्सोफोन पर ‘जाने जाँ ढूंढ़ता फिर रहा’ प्रस्तुत किया। कल्पना श्रीवास्तव ने हार्मोनिका और यूकुलेले पर अंग्रेजी गीत ‘ब्राउन गर्ल इन द रिंग’ की प्रस्तुति दी। कार्यक्रम का समापन समूह के कलाकारों की ‘जिंदगी एक सफर है सुहाना’ प्रस्तुति के साथ हुआ। वाद्ययंत्रों की इन प्रस्तुतियों में की-बोर्ड, ऑक्टापैड, लीड गिटार, बेस गिटार और हैंडसोनिक पर कलाकारों ने संगत दी। खास बात यह रही कि गीतों के बोल नहीं थे, लेकिन धुनों के जरिए श्रोता उन्हें आसानी से पहचानते रहे। आज मामे खान की गायिकी से सजेगी अंतिम शाम राज्योत्सव के तीसरे और अंतिम दिन मंगलवार को लाल परेड ग्राउंड में दोपहर 12 बजे से रात 8 बजे तक प्रदर्शनियां और देशज व्यंजन मेला आम लोगों के लिए खुला रहेगा। शाम 6:30 बजे से कृषि आधारित और पारंपरिक लोक-जनजातीय नृत्यों की प्रस्तुतियां होंगी। इसके बाद राजस्थान के जैसलमेर से आने वाले प्रसिद्ध लोक गायक मामे खान अपने साथियों के साथ प्रस्तुति देंगे। राजस्थानी लोक संगीत को देश और विदेश के मंचों तक पहुंचाने वाले मामे खान की गायिकी में रेगिस्तानी लोकजीवन, पारंपरिक सुरों और लोकगीतों की झलक देखने-सुनने को मिलेगी। उनके कार्यक्रम के साथ ही तीन दिवसीय 71वें स्थापना दिवस समारोह का समापन होगा।

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