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राजसत्ता की देवी कहलाती हैं मां पीतांबरा:इंदिरा, वाजपेयी भी आते थे दर्शन करने; 1962 के युद्ध में 51 कुंडीय यज्ञ के बाद पीछे हटी थी चीनी सेना

दतिया की मां पीतांबरा पीठ की पहचान सिर्फ धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है। यहां साधना, शक्ति उपासना और राष्ट्ररक्षा से जुड़ी परंपराएं भी रही हैं। यही वजह है कि आम श्रद्धालुओं के साथ राजनीति और प्रशासन से जुड़ी हस्तियां भी यहां दर्शन के लिए पहुंचती रही हैं। पीठ का इतिहास दतिया के उस वनखंड से शुरू होता है, जहां प्राचीन वनखंडेश्वर महादेव मंदिर के पास स्वामीजी महाराज ने साधना की थी। पीठ से जुड़े विवरणों के मुताबिक, स्वामीजी महाराज 9 जुलाई 1929 को दतिया पहुंचे थे। कुछ समय दूसरे स्थानों पर रहने के बाद उन्होंने वनखंडेश्वर महादेव मंदिर परिसर को अपनी साधना स्थली बनाया। उस समय यह इलाका वनखंडी के नाम से जाना जाता था। यहां एक छोटा-सा कक्ष था, जिसमें रहकर उन्होंने तपस्या की। आगे चलकर यही स्थान पीतांबरा सिद्धपीठ के रूप में प्रसिद्ध हुआ। 1935 में हुई मां बगलामुखी की स्थापना स्वामीजी महाराज ने 23 मई 1935 को मां बगलामुखी के विग्रह की स्थापना कराई। मां बगलामुखी को दस महाविद्याओं में आठवीं महाविद्या माना जाता है। शाक्त परंपरा में उनकी उपासना शत्रुओं पर विजय, विरोधियों की बाधाओं से मुक्ति और संकटों से रक्षा की कामना से की जाती है। उनकी आराधना में शत्रु की वाणी और शक्ति को निष्प्रभावी करने का प्रतीकात्मक भाव भी जुड़ा है। इसी कारण उन्हें स्तंभन की देवी कहा जाता है। समय के साथ पीठ में मंत्र-जप, हवन और विशेष अनुष्ठानों की परंपरा विकसित हुई। यहां आने वाले श्रद्धालु अपनी आस्था के अनुसार पूजा-अर्चना करते हैं, जबकि साधक विशेष अनुष्ठानों के लिए भी पहुंचते हैं। इस वजह से राजसत्ता की देवी कहलाती हैं मां पीतांबरा मां बगलामुखी की उपासना से जुड़ी मान्यताओं के कारण पीतांबरा पीठ को राजसत्ता से भी जोड़कर देखा जाता है। मान्यता है कि मां की आराधना से विरोधियों पर विजय और कठिन परिस्थितियों में सफलता मिलती है। इसी विश्वास के चलते राजनीति से जुड़ी कई प्रमुख हस्तियां भी यहां दर्शन के लिए आती रही हैं। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी के साथ राजमाता विजयाराजे सिंधिया का नाम भी पीठ से जुड़ी प्रमुख हस्तियों में लिया जाता है। हालांकि, पीठ की आस्था केवल राजनीतिक और प्रशासनिक लोगों तक सीमित नहीं है। आम श्रद्धालु भी पारिवारिक परेशानियों, जीवन की बाधाओं और मनोकामनाओं की पूर्ति की प्रार्थना लेकर यहां पहुंचते हैं। पीठ के आचार्य विष्णुकांत मुड़िया के मुताबिक, मां पीतांबरा को केवल राजसत्ता देने वाली देवी मानना उनकी व्यापक धार्मिक मान्यता को सीमित करना है। उन्होंने कहा कि मां संपूर्ण ब्रह्मांड की अधिष्ठात्री जगदंबा हैं। वे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थ प्रदान करने वाली दयामयी मां हैं। उनके दरबार में राजनेता, अधिकारी, उद्योगपति, व्यापारी और ग्रामीण भक्त सभी समान भाव से आते हैं। 1962 के युद्ध के दौरान हुआ था 51 कुंडीय महायज्ञ पीतांबरा पीठ के इतिहास का चर्चित प्रसंग 1962 के भारत-चीन युद्ध से जुड़ा है। पीठ की परंपरा के अनुसार, युद्ध के दौरान देश की रक्षा की कामना से मां बगलामुखी की आराधना और विशेष राष्ट्ररक्षा अनुष्ठान कराया गया था। पीठ के ऐतिहासिक विवरणों में 19 दिसंबर 1962 को इस अनुष्ठान की महत्वपूर्ण तिथि बताया गया है। इस दौरान 51 कुंडीय महायज्ञ हुआ था, जिसे स्वामीजी महाराज की साधना और राष्ट्र के प्रति समर्पण से जोड़कर देखा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि यज्ञ की पूर्णाहुति के बाद चीन की सेना ने पीछे हटना शुरू कर दिया था। 1978 में स्थापित हुईं मां धूमावती पीठ में मां बगलामुखी के अलावा मां धूमावती की उपासना भी प्रमुख है। स्वामीजी महाराज ने 13 जून 1978 को मां धूमावती के विग्रह की स्थापना कराई थी। उन्हें दस महाविद्याओं में सातवीं महाविद्या माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं में उनकी उपासना वैराग्य और कठिन परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति से जुड़ी है। शनिवार को उनके दर्शन का विशेष महत्व माना जाता है। एक ही परिसर में मां बगलामुखी, मां धूमावती और वनखंडेश्वर महादेव के मंदिर होने से यहां शक्ति और शिव उपासना की परंपरा दिखाई देती है। श्रद्धालु देवी दर्शन के साथ महादेव की पूजा-अर्चना भी करते हैं। स्वामीजी महाराज की साधना से जुड़ी है पीठ की पहचान पीतांबरा पीठ में नवरात्र, गुरु पूर्णिमा और स्वामीजी महाराज से जुड़े स्मृति पर्व प्रमुख अवसर हैं। वसंत पंचमी पर शास्त्रीय संगीत समारोह की परंपरा का भी उल्लेख मिलता है। इन आयोजनों में धार्मिक साधना के साथ सांस्कृतिक परंपराओं को भी स्थान मिलता है। स्वामीजी महाराज का महानिर्वाण 3 जून 1979 को हुआ। उनके बाद भी पीठ में स्थापित देवी उपासना और अनुष्ठानों की परंपरा जारी रही। आज यह स्थान मां बगलामुखी की आराधना, मां धूमावती के दर्शन और प्राचीन वनखंडेश्वर महादेव मंदिर के कारण देशभर के श्रद्धालुओं के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।

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