सच्ची बात, बेधड़क। दैनिक भास्कर भोपाल संस्करण के 68 वर्ष पूरे होने पर हम 11 दिन तक हर सुबह भोपाल की नई कहानी, अनदेखे पहलू की एक विशेष श्रृंखला लेकर आए हैं। हम आपको भोपाल के सबसे बड़े बदलावों, शहर को जीवन देने वाली धरोहरों पर विशेषज्ञों के मंथन, पुराने दस्तावेजों और दुर्लभ अभिलेखों की पड़ताल से निकले अनकहे सच, तथ्यों पर आधारित एक्सक्लूसिव खुलासों और दुर्लभ तस्वीरों के संग्रह से रूबरू कराएंगे। पढ़िए आज की कहानी… इतिहास में बहुत कम शहर ऐसे हैं, जिन्होंने महीनों तक दुश्मनों की घेराबंदी झेली और फिर भी झुके नहीं। भोपाल की यह गाथा बताती है कि उसकी सबसे बड़ी ताकत उसके किले नहीं, उसके लोग थे। यह उस दौर की कहानी है, जब भोपाल अपने अस्तित्व की सबसे कठिन परीक्षा से गुजर रहा था। चारों ओर दुश्मन की सेनाओं का घेरा था, साधन सीमित थे और रियासत का बच पाना लगभग असंभव लग रहा था। लेकिन अगले नौ महीनों में भोपाल ने ऐसा इतिहास रचा, जो आज भी साहस और जन-एकता की मिसाल माना जाता है। नवंबर 1813 में ग्वालियर के शासक दौलतराव सिंधिया के सेनापति जीन बैप्टिस्ट और जसवंत राव भाव ने नागपुर के भोंसले की सेना के साथ मिलकर भोपाल को घेर लिया। हमलावर सेनाओं ने इस्लामनगर और इस्लामगढ़ में डेरे डाल दिए। संकट की इस घड़ी में भोपाल की रक्षा की कमान वजीर नवाब मोहम्मद खान ने संभाली। उन्होंने मुकाबला करने का फैसला किया और पूरे शहर का मनोबल बनाए रखा। धीरे-धीरे लड़ाई पूरे भोपाल की बन गई। कोई किले की दीवारें मजबूत कर रहा था, कोई रसद पहुंचा रहा था। कोई मोर्चे पर सैनिकों के साथ खड़ा था। जब दुश्मन शहर की दीवारें तोड़ने लगा, तो वजीर मोहम्मद खान के आह्वान पर कुलीन परिवारों की पर्दानशीन महिलाएं भी किले की बुर्जों पर पहुंच गईं। उन्होंने बारूद से भरे घड़ों में आग लगाकर दुश्मन पर बरसाना शुरू कर दिया। करीब नौ महीने तक घेराबंदी जारी रही। संख्या और संसाधनों में कहीं अधिक मजबूत होने के बावजूद हमलावर सेना भोपाल का हौसला नहीं तोड़ सकी। आखिरकार जुलाई 1814 में उसे घेराबंदी हटाकर लौटना पड़ा। आज जहां पर हमीदिया अस्पताल… वहां विशाल बुर्जों से घिरा था फतेहगढ़ किला फतेहगढ़ का यह किला मजबूत दीवारों और विशाल बुर्जों से घिरा था। सिंधिया सेना के आक्रमण के दौरान नवाव ने इसे मुख्य सुरक्षा केंद्र बनाया। भीषण तोपखानों के हमलों को झेलकर भी किला अजेय रहा। इसके परिसर में दोस्त मोहम्मद खान निर्मित एशिया की सबसे छोटी ढाई सीढ़ी की मस्जिद थी। आज यह ऐतिहासिक किला पूरी तरह से ‘हमीदिया अस्पताल’ और ‘गांधी मेडिकल कॉलेज’ का परिसर बन चुका है। आधुनिक बहुमंजिला चिकित्सा इमारतों के निर्माण के कारण किले का आंतरिक मूल ढांचा अब गायब हो चुका है। वीआईपी रोड से किले की बाहरी प्राचीरें दिखती हैं। ————
कल पार्ट-3 में पढ़िए एक नई कहानी
